शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

शुक्ला जी की कविता

प्रियतम कौन ?

पावन अतीत का सौरभ,
भ्रम रश्मि निशा का आँचल,
उन्मुक्त शिखा की लौ पर,
मानो डाले गंगाजल,
है हृदय चुराता कौन?
मेरा प्रियतम है कौन?
यह दीपक सब विपदा सह,
उन्मुक्त ज्योति में तन्मय,
जय कीर्ति ध्वजा फहराते,
गति-रति में हो जाते लय,
उत्साह दिलाता कौन?
मेरा प्रियतम है कौन ?
मुझ नेत्रहीन को देकर,
आँखो का भोला सपना
है थकित गात मान हारा,
दे कंठ-माल भी अपना,
है मुझे फँसाता कौन?
मेरा प्रियतम है कौन?


दरस दिखा जाना

फूटे जो अंकुर बन
कोयल सा सुमधुर बदन,
पल्लव से डाल हिले
छितराये बादल सुन
दीपक का बुझ जाना।
आ दर्शन दे जाना।।

हिमगिरी से हिम गल-गल
वर्षा से मरू दल-दल,
झरने की करतल कल
सरिता का बह-बह जल,
सागर में मिल जाना।
आ दर्शन दे जाना।।

बाल वधू सा मन
चंचल कोमल चितवन
अधरों पर टिकी हुई
नौका नाविक के बिन,
मैं जानूं जग जाना।
आ दर्शन दे जाना।।

अश्रु बँूद मन का मोती
सबका सुख-दुख धोती,
विपदा जब जब रोती
करूण बीज वह बोती,
करूणा बरसा जाना।
आ दर्शन दे जाना।।

रात अमावस वाली
कर जाती अँधियारी,
पी-पी रटता चातक
कोयल मधु स्वर वाली,
मधुऋतु तुम आ जाना।
आ दर्शन दे जाना।।

पलकों में छिप जाती
अधरों पर मुसकाती
तितली सी इठलाती
कलियों सी शरमाती
सरसों का लहराना।
आ दर्शन दे जाना।।


~
सुरेश चंद्र शुक्ला
ओस्लो, नार्वे

1 टिप्पणी:

‘नज़र’ ने कहा…

अत्यंत सुन्दर रचनाएँ