बुधवार, 29 जुलाई 2009

चीन की चालबाजियां

अंतर्राष्टï्रीय मंच पर और कूटनीतिक स्तर पर भले ही कहा जाता हो कि भारत, चीन शत्रु नहीं वरन मित्र हैं, पर जमीनी हकीकत अलग ही दास्तां बयां करती है। भारत-चीन सीमा विवाद दशकों पुराना मसला है और आज भी कायम है। विदेश मंत्री स्तर पर कई बार बातें हो चुकी हैं लेकिन जमीनी हकीकत में किसी प्रकार की कोई तब्दीली नहीं आई है।
बताया जाता है कि भारतीय सीमा पर चीनी फौज की तादाद बढ़ती जा रही है। चीनी सेनाओं द्वारा बारूंदी सुरंगे और बंकरों का निर्माण किया जा रहा है। कई बार सुरक्षा एजेंसियों ने भी भारतीय प्रशासन को आगाह किया है कि अपनी सीमा को चाक-चौबंद रखा जाए कारण चीन की हरकत संदेहास्पद लग रही है। तिब्बत और अरूणाचल प्रदेश से सटे सीमाई इलाके तो हमेशा ही चीन की आंखों की किरकरी है। हाल ही में खबरें आईं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बातचीत में चीनी प्रधानमंत्री जिआबाओ ने दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को जटिल बताया था। जिआबाओ ने कहा कि सीमा विवाद के समाधान में समय लग सकता है और इसके लिए विश्वास, धैर्य और राजनीतिक इच्छा शक्ति की दरकार है। इसके चंद दिनों बाद ही जब भारतीय विदेशमंत्री एस।एम. कृष्णा ने चीन के विदेशमंत्री यांग जेइची से थाईलैंड के फुकेट द्वीप में पहली बार मुलाकात की तो जोर देते हुए कहा कि भारत और चीन शत्रु नहीं, बल्कि उभरते हुए एशिया में सहयोगी हैं। बकौल कृष्णा, 'भारत और चीन आर्थिक और व्यापार क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं लेकिन वे शत्रु नहीं हैं। भारत और चीन दोनों को विकास करने के लिए पर्याप्त स्थान है।Ó
भारतीय राजनयिकों द्वारा लाख कहे जाने के बाद भी चीन अरूणाचल प्रदेश पर भारत की स्थिति को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह सीमा निर्धारण के मसले पर अपनी शर्तो के अलावा कोई आपसी समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता किन गेंग ने कहा , 'ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए की गई भारत की टिप्पणी पर हमें खेद है। चीन और भारत ने कभी भी आधिकारिक तौर पर सीमा का निर्धारण नहीं किया है और भारत-चीन सीमा के पूर्वी हिस्से पर चीन का दृष्टिकोण स्पष्ट और संगत है।Ó इतना ही नहीं, भारत के उत्तरी छोर पर सिक्किम में फिंगर एरिया के नाम से जाने जाने वाले 2।1 वर्ग किलोमीटर के हिस्से पर चीन ने आपत्ति उठा कर नया मोर्चा खोल दिया है। इससे दोनो देशों के बीच सीमा विवाद पर तनाव की स्थिति और बदतर हो रही है। चीन ने नाथुला दर्रे से व्यापार खोल कर और बाद में सिक्किम को भारत के नक्शे में शामिल कर अपने आधिकारिक नक्शे में संशोधन करते हुए 1975 में सिक्किम के भारत में विलय को स्वीकार किया था। भारत-चीन सीमा विवाद के मामले में इसे सकारात्मक कदम माना गया था, हालांकि चीन सरकार ने सिक्किम को भारत का हिस्सा मानने के संबंध में कभी कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया। इससे पहले चीन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरूणाचल प्रदेश यात्रा और अपने भाषण में राज्य को भारत के उगते सूरज की भूमि कहने का विरोध किया था। यूं तो चीन अरूणाचल प्रदेश के समूचे भू-भाग पर बहुधा दावे करता रहा है, पर अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम में वास्तविक नियंत्रण रेखा के बारे में अक्सर दिए जा रहे कड़े बयान भारत के लिए चेतावनी की तरह हैं।
चीन का मत भारतीय अधिकारियों के नजरिए के सर्वथा विपरीत है। भारतीय अधिकारी पूरी अरूणाचल प्रदेश सीमा की तो बात ही क्या, तवांग के मुद्दे पर भी किसी तरह की बातचीत स्वीकार्य नहीं मानते। पूर्ववर्ती सरकार में अरूणाचल मामले पर विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के बयान का चीन सरकार के विरोध करने से यह तो स्पष्ट है कि सीमा विवाद को हल करने के सालों से प्रयत्न विफल हो गए हैं। वहीं किन ने कहा कि पूर्व और वर्तमान चीन सरकारों ने कभी भी 'गैर-कानूनीÓ मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं दी और यह बात भारत अच्छी तरह जानता है। चीन ने छठे दलाई लामा की जन्म स्थली बताते हुए तवांग पर दावा किया, पर बाद में पूरे अरूणाचल प्रदेश पर ही हक जतलाने लग। इसके अलावा, चीन अब भी जिद पर अड़ा है और हमारी 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर दावा जतलाते हुए अरूणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा मानने से इनकार कर रहा है। 4,057 किलोमीटर की पूरी चीन-भारत सीमा पर विवाद है। भारत और चीन ही ऐसा अभिज्ञात पड़ोसी हैं जिनके बीच परस्पर स्वीकार्य सीमा नहीं है।
अमूमन कहा जाता रहा है कि भारत को सबसे अधिक खतरा अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से है जो आए दिन आतंकी गतिविधियों से जुड़ा रहता है। लेकिन भारतीय सेना के आला अधिकारी इससे इत्तेफाक नहीं रखते। तभी तो भारत के वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ़ मार्शल फाली होमी मेजर कहते हैं कि भारत को पाकिस्तान के मुक़ाबले ज़्यादा ख़तरा चीन से है। उनके मुताबिक भारत चीन की लड़ाई की क्षमताओं के बारे में बहुत कम जानता है। चीन की सेना की संख्या पाकिस्तान से तीन गुना है। लेकिन एयर चीफ मार्शल के मुताबिक सिर्फ संख्या से उसकी कार्यप्रणाली और उसकी क्षमता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। होमी मेजर का कहना है कि चीन की वास्तविक क्षमताओं के बारे में, लड़ाई के हुनर के बारे में और उसकी सेना कितनी पेशेवर है, इस बारे में हम बहुत कम जानते हैं। चीन निश्चित रूप से ज़्यादा बड़ा ख़तरा है।
सच तो यह है कि शांतिपूर्ण वार्ता का दिखावा जारी है लेकिन सीमा विवाद जल्द हल होने के आसार नजर नहीं आते। सीमा पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का अतिक्रमण नए खतरे का आयाम जोड़ रहा है। सीमा पर पर्याप्त निवारक क्षमताओं के अभाव के अलावा भारत अभी सैन्य संचालन संबंधी तैयारियों और बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी चीन से काफी पीछे है। तिब्बत में चीन के सैन्य विस्तार पर लगाम लगाने में भारत असमर्थ रहा और अब उसने सीमा पर अपनी सैन्य क्षमताओं में सुधार किया है जिससे भारत के खिलाफ अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर सके। इतना ही नहीं, चीन ने सभी सीमांत इलाकों में सड़क, रेल मार्ग, हवाईअड्डे और जल विद्युत व भूतापीय स्टेशनों जैसी बुनियादी सुविधाओं पर निवेश बढ़ाया है। साथ ही वह पूर्व और पश्चिम के सैन्य बलों की तैनातगी क्षमताओं में भी तेजी से बढ़ोतरी कर रहा है। सीमा के आस-पास भारत की प्रहारक दूरी पर लगभग ढाई लाख सैनिक तैनात हैं। नए रेल व सड़क संपर्को और राजमार्गो ने किसी भी सेक्टर में सैन्य टुकडिय़ों की तुरंत पुनर्तैनातगी की चीन की क्षमताओं में तेजी से इजाफा हुआ है।

1 टिप्पणी:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

आपने इस लेख को लिखने में काफ़ी मेहनत की है फ़िर भी यह अखबार की एक ताजा खबर से प्रभावित है..इसलिये पढने वाले केवल शीर्षक देख कर ही आगे निकल लेंगें.. और आपकी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी.. आप कुछ ऐसा लिखने की कोशिश कीजिये जिसमें कुछ नयापन हो.. पाठक पढने को मजबूर हो जाये..

इसे आलोचना न समझियेगा.. सुझाव भर है .. हो सकता हैं मैं गलत भी सोच रहा हूं.