शनिवार, 1 अगस्त 2009

माँझी की गजल

किरचों भरा सारा का सारा गुलिस्तां हो जाएगा,
जब किसी शीशे पे पत्थर मेहरबां हो जाएगा।

बिजलियों का नाच तो देखूंगा मैं हर हाल में,
और क्या है खाक मेरा आशियां हो जाएगा।

क्या कशिश रह जाएगी जाने-वफा तू ही बता,
फैसला जो तेरे-मेरे दरम्यां हो जाएगा।

जो हथेली में है तेरी, सामने सबके उछाल,
इस तरह किस्मत का मेरी, इम्तिहां हो जाएगा।

तेज लहरें जब मुहब्बत से पुकारेंगी उसे,
शर्तिया साहिल से 'माँझीÓ बदगुमां हो जाएगा।


चेहरे के पन्ने से मन की सारी बातें बांच गया,
बड़ा पारखी था वो यारो एक नजर में जांच गया।

धुआं-धुआं सा रहता हूं मैं बेचैनी के साये में,
याद का पैकर आज लगाकर दिल में ऐसी आंच गया।

लहूलुहान हुए हैं तलवे लेकिन दोष मढूं किस पर,
सारा आलम राह में मेरी आज बिछाकर कांच गया।

कौन मुहब्बत की सौगातें बांटे मेरे आंगन में,
मेरा साया ही जब मुझसे करके तीन और पांच गया।

कैसा अदभुत दृश्य उपस्थित हुआ समन्दर में उस दम,
मस्ती में आकर लहरों पे 'माँझीÓ मार कुलांच गया।



वो जो मुझसे शराब मांगे है
जाने क्यों बेहिसाब मांगे है।

उनकी जिद भी अजीत है कितनी,
मेरी आँखों के ख्वाब मांगे है।

वक्त जालिम है कैसे चुपके से
मुझसे मेरा शबाब मांगे है

बारहा सोचकर वो जाने क्या,
आईनों से नकाब मांगे है।

कैसी बिगड़ी है अक्ल 'माँझीÓ की
प्यार मुझसे नवाब मांगे है।

देवेन्द्र माँझी
नई दिल्ली
9810793186

2 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

क्या कशिश रह जाएगी जाने-वफा तू ही बता,
फैसला जो तेरे-मेरे दरम्यां हो जाएगा।
bahut sundar !

‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल
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चाँद, बादल और शाम