मंगलवार, 14 जुलाई 2009

किसान सरकार साझेदारी क्यों?

अपनी बेबाकी के लिए ख्यात धूमिल ने कहा था,
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं ये तीसरा आदमी कौन है
मेरे देश की संसद मौन है।

यकीनन यह भारतीय लोकतांत्रक व्यवस्था की विडंबना है जिस किसान को अन्नदाता की संज्ञा से अभिहित किया जाता रहा है, वह आज अन्न के लिए मोहताज हो रहा है। कहीं वह अपने वजूद के लिए संघर्श कर रहा है तो कहीं तो समस्याओं के निराकरण नहीं होने पर आत्महत्या तक का कठोर फैसला करने को बाध्य है। जो लाखों लोगों के पेट के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रहा है, वह आज अपने हक के लिए सड़क से संसद तक धरना-प्रदर्षन करने को बाध्य है। वरना कोई तुक नहीं है कि विदर्भ के किसान आत्महत्या करें, बझेड़ा खुर्द के किसान पुलिसिया डंडे से अपना हाथ-पैर तुड़वाए, सिंगूर के लोग गोली खाएं और तो और राजधानी दिल्ली में कंझावला के किसानों को महीने भर से ज्यादा दिनों तक जिला उपायुक्त कार्यालय का घेराव करना। इस सबके बावजूद कोई विषेश बदलाव नहीं आया, लेकिन जनसंघर्श वाहिनी के जुझारू संघर्श से एक आषा किरण दिखाई देने लगी कि अब किसान-सरकार की साझेदारी की बात होने लगी।
यूं तो विश्व के गिने चुने देशों में जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है उसमें भारत एक है और पूरे विश्व में उदाहरण के रूप में भी जाना जाता है। हकीकत में जब इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंदर गहराई और ईमानदारी से झांकने के बाद जो सच्चाई सामने आती है उससे साफ लगता है कि यह व्यवस्था अधूरी है और इसको बदलना जरूरी है। अंग्रेज तो चले गए किंतु आजादी के छह दषक बीत जाने के बाद भी आजाद हिंदुस्तान की सरकारें अंग्रेजी नीतियों केा नहीं त्याग सकी है; यदि यह कहा जाए कि केवल चेहरा बदला है और षरीर व सोच वहीं है तो कोई अतिष्योक्ति नहीं होगी। अंग्रेजों के षासनकाल में भी किसानों से जमीने ली जाती थी और किसान के मनमाफिक मुआवजा नहीं मिलता था, कमोबेष वही स्थिति आज भी है। देश के किसानों की जमीन उनके द्वारा बनाए गए भू-अर्जन कानून के तहत हड़पने का सिलसिला आज भी जारी है। देश में क्या नहीं हो रहा होगा जब देश की राजधानी दिल्ली में भी किसान अपनी जमीन नहीं बचा पा रहे हैं अबतक .......गांवों की जमीन हड़पी जा चुकी है।1894 में बने इस कानून की आड़ में देश भर में किसानों की जमीन हड़पने का काम निंरतर जारी है और देश के विभिन्न भागों में किसान अपनी जमीन बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुतियां दे रहे हैं। अव्वल तो यह है कि जिस जगह आज राश्ट्रपति भवन और संसद भवन बना हुआ है, दिल्ली का वह रायसीना गांव आज कहीं चर्चा में नहीं है। इतिहास के पन्नों में समटकर रह गया है यह गांव। दिल्ली देहात के लोग बताते हैं कि अंग्रेजी सरकार ने 1900 ई में 99 साल के लीज पर रायसीना गांव की जमीन ली थी, जिस पर आज का राश्टपति भवन, संसद भवन, नाॅर्थ ब्लाॅक, साउथ ब्लाॅक बना हुआ है, जहां से पूरे देष के लिए नीति-निर्धारण होता है। लेकिन रायसीना गांव के मूल वाषिंदे लीज के 99 साल बीतने पर नया मुआवजा की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार का कोई नुमाईंदा उनकी ओर देखता तक नहीं है। इसी प्रकार का मामला चंद्रावल गांव के लोगों का भी है। जिस चंद्रावल गांव की जमीन पर आज दिल्ली विधानसभा बना हुआ है पूरा सिविल लाईंस बसा हुआ है, वहां के लोगबाग आज भी अपने हक के लिए अंतहीन लडाई लड रहे हैं। दिल्ली देहात के लोगों ने अपने हक के लिए दिल्ली ग्राम विकास पंचायत का भी गठन किया जो उनके हक की बात कर सके और सरकार के पास तक उनकी बातों तक पहुंचा सके; सालों आंदोलन की गई, लेकिन बाजारबाद की आंधी ने गांववालों की नहीं सुनी।
दरअसल, अंग्रेजों ने भारत में आवोहवा अन्य प्राकृतिक सुबिधाओं और अपनी सुरक्षा को ध्यान में रख कर अपने रहने और सुख भोगने के लिए इस देश के कई आबाद गांवों को गिरा कर अपने रहने के लिए कालोनियां और कस्बे सहित शहर भी विकसित किए। इसी अलिखित सिद्धांत पर भी सरकार काम कर रही है।अंग्रजों ने जमीन हथियाने के लिए 1894 बाकायदा एक कानून भी तैयार किया जिसका नाम तो जन हित दिया गया और उसमें प्रावधान किया गया कि जन हित के नाम पर किसी भी जमीन का अधिग्रहण किया जा सकता है।
इन हालातों में यह सोचना लाजिमी हो जाता है कि देश के दूर-दराज के राज्यों में क्या हो रहा होगा जब देश की राजधानी दिल्ली और दिल्ली के इर्द-गिर्द किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है। समय-समय पर केन्द्र के मंत्रियों के साथ विभिन्न जन आन्दोलनों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने भू-अर्जन कानून को रद्द करने और राष्ट्रीय पुनर्वास नीति को जन पक्षिय रूप में स्वीकार करने के लिए जब बैठकें की गई तो उन बैठकों के दौरान कृषि मंत्री शरद पंवार और ग्रामिण विकास मंत्री रघुवंस प्रसाद सिंह के समक्ष जन संघर्ष वाहिनी के संयोजक भूपेन्द्र सिंह रावत ने सवाल किया था कि सरकार का काम न तो जमीन हड़पने का है और नही कालोनाईजरी और प्रोपर्टी डीलरी करने का तो फिर सरकार क्यों किसानों की जमीन चंद रूपयों में हड़प कर लाखों रूपयों की दर से प्रति बर्ग मीटर जमीन बेचने का कारोबार कर रही है।
सरकार किसानों से औने-पौने दामों पर जमीन लेती है और फिर उसे बाजार भावों से बेचती है। इस कार्य के लिए उसने बकायदा विकास प्राधिकरण और हाउसिंग सोसाईआटी बना रखी है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण दिल्ली विकास प्राधिकरण, डी।एस.आई.डी.सी. और यूपी में गाजिया बाद विकास प्राधिकरण हो या नोएडा अथारिटी या हरियाणा का हुड्डा हो सभी ने किसानों की जमीन चंद रूपयों में हड़पकर लाखों रूपयों में बेचने के कारोबार में लीन हैं। सरकार के मुखिया जब अतिरिक्त लाभ कमाना चाहते हैं तो नोएडा घोटाले जैसे घोटाले सामने आते हैं।आजादी के लिए कुर्वानी देने वाले ज्यादातर लोगों के मन में था कि गोरों के जाने के बाद हमारे देश वासियों को रहने के लिए घर पहनने के लिए कपड़ा और खाने के लिए भोजन की व्यवस्था सहजता से उपलब्ध होगाी। उन्हेें क्या पता था कि उनकी सहादत के बाद का दृष्य इतना भयानक होगा। जिसमें ग्राम प्रधान देश के गांवो को उपेक्षित करके रखा जाएगा और ऐसे हालात बनाए जाएंगे कि गांवों के लोग रोजी रोठी के लिए गांवो से पलायन कर शहरों की तरफ जाने के लिए वाध्य किए जाएंगे जिनमेंसे ज्यादातर आबादी अमानवीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होगी। और ऐसे गांवों की तब तक सुध नहीं ली जाएगी जब तक उस गांव की जमीन से देश के किसी साधन संपन्न तबके का हित नहीं सधता। और जैसे ही सरकार को लगता है कि अमुक गांव की जमीन से अमुक राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कंपनी का हित होगा वह उस गांव के लोगों को उनकी जमीन से बेदखल करने में रति भर भी संकोच नहीं करती है।
अपने हित के लिए सरकारी एजेंसियां इस कदर अंधी हो जाती है अपने स्वार्थ के लिए किसानों की जान यानी उनकी जमीन की इनक ेलिए कोई अहमियत नहीं होती है; आज आजादी के 60 साल से ज्यादा हो चुके हैं और हमारे देश के किसानों के द्वारा तैयार फसल हो या उनकी पुस्तैनी जमीन दोनों को बेचते समय उसकी कीमत तय करने का अधिकार किसानों के पास नहीं है। जबकि दूसरी तरफ किसानों की फसलों से तैयार माल को बेचने की कीमत तय करने का अधिकार व्यापारियों को है। यहि नहीं देश की राजधानी दिल्ली के चैराहों पर भीख मांगने वाले भी अपना ठिकाना दूसरे भिखारी को तभी बेचता है जब वह उसके मुताविक कीमत अदा कर देता है। ऐसे मे सवाल यह पैदा होता है कि किसानों की हालात भिखारी से बदतर बनाकर रखने की चाल शासक वर्ग ने सोची समझी नीति के तहत कर रखी है या किसानों की बात करने वाले उनकी बात ईमान दारी से नहीं उठा पा रहे हैं? कल्पना की जा सकती है कि देश के दूरदराज के राज्यों में किसान, मजदूर और मछुआरों सहित दलितों और आदिवासियों के साथ सरकारें क्या सलूक कर रहीं होंगी जब देश की राजधानी दिल्ली में ही किसानों की जमीन जबरन हड़पने का धंघा सरकारें करती आ रही हैं और दिल्ली का पढालिखा ताकतबर किसान सड़क पर लड़ाई लड़ रहा है।दिल्ली में जमीन हड़पने का यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है सन् 2005 में सरकार ने जमीन हड़पने की इसी नीति के तहत दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी जिला कंझावला के 6 गांवों की जमीन हड़पनें कें लिए धारा-4 के नोटिस जारी किए और मार्च 2008 में इन गांवों की जमीन को अवार्ड कर दिया किसानों ने दिल्ली में जमीन बचाने की कल्पना भी नहीं की थी इस लिए किसान मुआवजा बढाने की मांग को लेकर 19 मार्च 2008 से जिला मुख्यालय के पास धरना दे कर बैठ गए किसानों की मांग के समर्थन में राजनीतिक पार्टियों के नेता और किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत भी पंहुचे और किसानों ने अप्रैल 2004 में विधान सभा पर प्रदर्शन भी किया लेकिन सरकार ने एक न सुनी।
किसानों ने तमाम राजनीतिक पार्टियों के दरवाजे पर अपनी फरयाद सुनाई किंतु किसी भी प्रकार की राहत जब किसानों को नहीं दी गई तब अंत में किसानों ने फैसला किया कि गैर राजनीतिक रूप में इस लड़ाई की अगुवाई करने के लिए जन संघर्ष वाहिनी का सहयोग लिया जाय। जन संघर्ष वाहिनी के साथ किसानों की पांच दौर की बैठक हुई और इस बीच में एक बार धरने पर जन संघर्ष वाहिनी के कार्याकर्ताओं ने सिरकत की किंतु किसानों ने पुनः अपनी लड़ाई का पुराना तरीका ही जारी रखा जिस कारण से जन संघर्ष वाहिनी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। तब किसानों ने दुबारा से जन संघर्ष वाहिनी के साथ चर्चा की और आग्रह किया कि किसानों के साथ की जा रही इस सरकारी लूट का विरोध कर किसानों को न्याय दिलाने के लिए जन संघर्ष वाहिनी अगुवाई करे। आजादी से पूर्व हो आजादी के बाद देश में नियोजन का जो तरीका अंग्रेजों ने अपना रखा था कमोवेस स्वतंत्रता के बाद भी सरकारों ने उसी ढर्रे को अपना कर रखा और उसी की प्रणिती है कि ग्राम प्रधान देश नगर प्रधान देश का स्वरूप धारण कर चुका है।के विकास में जो नियोजन का जो तरीका अपनाया उसके कारण एक ओर नगर और महानगरों को प्राथमिकताऐं दी गई और ग्राम प्रधान देश होने के बावजूद गांवों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। नियोजन के इस असंतुलित तरीके के कारण एक ओर गांवों में रोजगार के साधन सीमित ही रह पाये और नगर और महानगरों में रोजगार के साधन निरंतर इजाद होते रहे। जिस कारण से लोगों को गांवों से रोजगार के लिए शहरों की तरफ पलायन करने के लिए विवश होना पड़ रहा है। पलायन का यही एक मात्र कारण नहीं है बल्कि अच्छि शिक्षा, स्वासथ्य, मूलभूत सुविधाएं से वंचित गांवो के साधन संपन्न लोग भी नगर और महानगरों की तरफ निरंतर पलायन करने के लिए विवश हैं।
गांवों से शहरों की तरफ पलायन के कारण जंहा एक ओर शहरों का विस्तार हो रहा है वंही दूसरी ओर शहरों के इर्द-गिर्द आबाद गांवों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है। गांवो के अस्तित्व के साथ-2 इन गांवों के लोगों को उनकी पुस्तैनी जमीन से बेदखल कर जंहा एक ओर भूमिहीनों की संख्या में निरंतर सरकारी व गैर सरकारी डब्लपरों द्वारा बढाई जा रही है। वंही चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि जिस जमीन पर शहरों का विस्तार हो रहा है और उस जमीन पर बनने वाले औद्योगिक, आवासीय और व्यवसायिक कांपलेक्स के मालिक उन किसान परिवारों की बजाय अन्य लोग हैं। द्वारा देश के विकास में नियोजन के असंतुलित तरीके के कारण एक ओर नगर और महानगरों कआजादी से पूर्व हो या आजादी के बाद भी किसानों की कृषि योग्य जमीन हो या गौचर की जमीन या उस जमीन पर गांव आबाद हों यदि शासक वर्ग को उस जमीन पर कुछ करने का मन आ गया तो किसानों से वह जमीन निरंतर हड़पी जाती रही है। भले जमीन को हड़पने के इस खेल को अधिग्रहण का नाम ही क्यों न दिया गया हो और जिस नाम पर हड़पा जा रहा है उसको भी एक भला सा नाम दे दिया है ‘विकास’ ! लेकिन शासक वर्ग से आजतक किसी ने यह नहीं पूछा कि जिनके पुरखों की जमीन पर विकास के नाम पर दिल्ली, मुंबई, कलकता और मद्रास जैसे महानगर हों या कानपुर, चण्डीगढ जैसे तमाम नगर इनमे आबाद आवासीय, व्यवसायिक और औद्योगिक कांपलेक्स तैयार किए जा चुके हैं तो ऐसे कांपलेक्स के मालिक व्यापारी ही क्यों हैं किसान क्यों नहीं हैं ? जिस जमीन पर ये आबाद हैं उस जमीन पर खेती करने वाले खेतिहर मजदूरों की आजीविका कैसे चल रही है? आखिर देश सेवा करने वाले किसान और खेतिहर मजदूरों के साथ में ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों किया गया है ? और आज भी निंरतर जारी है। देश में कृषि भूमि पर शहर, उद्योग और सेज स्थापित करने के नाम पर

2 टिप्‍पणियां:

kapil ने कहा…

sahik kaha dost........

बेनामी ने कहा…

sachh mein vicharniye mudda hai.. sarkar ki yojanyon ka mokhoul urane ki liye achha hai kisan... kyon ?