गुरुवार, 29 अगस्त 2013

कैसे लगे रोक?


बिहार में हिंसक आतंकी वारदात भले न हुई हो, लेकिन देशद्रोही तत्व यहां जाली नोटों का कारोबार तेजी से फैला रहे हैं। खासबात यह है कि इनमें बड़े नोटों मसलन हजार और पांच सौ रुपये के जाली नोटों का चलन बढ़ा है। पिछले करीब साढ़े पांच साल में सिर्फ पुलिस ने 69 लाख से अधिक के जाली नोट पकड़े हैं।
एक तरफ सीमा पर पाक गोलीबारी कर रहा है, तो इधर उसका आइएसआइ जाली नोट फैलाने में लगा है। पांच साल में लगभग 25 करोड़ के जाली नोट बिहार लाए गए। लगभग पांच करोड़ रुपये मूल्य के जाली भारतीय नोट हर साल बांग्लादेश से मालदा हो कर बिहार पहुंच रहे है। पिछले पांच वर्षो में एक करोड़ 21 लाख रुपये मूल्य केजाली नोट बरामद किए गए हैं, इसके साथ ही 356 तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। वर्ष 2013 में अब तक 25 लाख 40 हजार 440 रुपये मूल्य के जाली नोट बरामद किए गए हैं, वहीं 26 तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। बिहार में पहुंच रहे जाली नोटों में ज्यादातर हजार व पांच सौ रुपये के हैं। गौर करने योग्य यह है कि वर्ष 2008 से 2010 तक जाली नोटों का विस्तार मिला है। जब्त नोटों के आंकड़ों से भी इसकी पुष्टि हुई है। इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि इस दौरान पुलिस और अन्य एजेंसियों की सक्रियता बढ़ी हो, जिसके चलते उन्हें यह कामयाबी हासिल हुई। कहा जा रहा है कि नेपाल के रास्ते ये नोट बिहार पहुंच रहे हैं। इसके पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ माना जा रहा है। बिहार में इस धंधे से जुड़े करीब 500 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। नेपाल से सटे जिलों में लगने वाले पशु हाट-बाजार में जाली नोटों के चलन की बात सामने आई है। इसको रोकने के लिए सशस्त्र सीमा बल ने अपने पोस्टों पर जाली नोट पकड़ने वाली मशीन लगाई है। ऐसे हाट और मेलों में भी मशीनें का इस्तेमाल किया जा रहा है। नोटों की पहचान के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्य पुलिस को सीडी उपलब्ध कराई है। इस सीडी में डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से यह दिखाया गया है कि जाली नोटों की पहचान कैसे की जा सकती है। सभी जिलों के एसपी को यह सीडी भेजी गई है जिसका प्रदर्शन हाट-बाजार में आम लोगों के बीच किया जाना है। जिलों में एंटी फेक करेंसी सेल का भी गठन किया जा रहा है। नकली नोटों की जांच में एक और बात सामने आई है जिसमें यह कहा जा रहा है कि इसमें भी आॅरिजनल और डुप्लीकेट हैं। अधिकारियों के अनुसार आईएसआई द्वारा तैयार नोटों को उसके धंधेबाज ‘आईएसआई’ के नाम से ही जानते हैं। आईएसआई कोड का मतलब है ‘आॅरिजनल नकली नोट’। दूसरा है लोकल मेड। राज्य पुलिस मुख्यालय के आलाधिकारियों का मानना है कि जितने जाली नोट पकड़े जा रहे है, उसका पांच गुना कारोबार बिहार के रास्ते से हो रहा है( दूसरी ओर, भारत नेपाल सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किए गए आतंकी अब्दुल करीम टुंडा ने बिहार सहित देश भर में जाली भारतीय करेंसी की हो रही खपत को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। एनआइए सूत्रों के अनुसार टुंडा ने माना है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने लश्कर- ए- तैयबा के सहयोग से भारत में जाली करेंसी की खपत बढ़ाई है। इस काम में पंजाब मूल के लोग प्रारंभिक सहयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही नेपाल सीमा से जाली भारतीय करेंसी को भारत में पहुंचाया जा रहा है। एडीजी (मुख्यालय) रवींद्र कुमार के अनुसार, बांग्लादेश के रास्ते प बंगाल में जाली भारतीय करेंसी पहुंचती है। इसके बाद इसे बिहार में भेजा जाता है। हाल के पुलिस आॅपरेशनों में गिरफ्तार किए गए े तस्करों से हुई पूछताछ में इसकी पुष्टि हुई है। पुलिस सूत्रों की मानें, तो आतंकी टुंडा द्वारा जाली नोटों के दम पर बोधगया में बम ब्लास्ट को अंजाम दिए जाने की भी जांच की जा रही है। टुंडा अधिक पैसा देने का लालच दिखा कर युवकों को आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए प्रेरित करता रहा है। आर्थिक अपराध के मामलों की जांच की जिम्मेवारी इओयू को दी गई है। बताया जाता है कि बिहार पुलिस मालदा व पश्चि बंगाल की ओर से आ रहे जाली नोट के कंसाइनमेंट को अकेले दम पर रोक पाने में विफल साबित हो रही है। इस कारोबार में नोटों के कंसाइनमेंट लेकर चलने वालों में महिलाओं व राज्यों से पलायन कर जाने वाले मजदूरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जहां सूचनाएं मिल रही हैं, वहां ट्रैप कर लिया जा रहा है, लेकिन अधिकतर कंसाइनमेंट पुलिस को सूचना मिले बगैर आगे फारवर्ड हो जा रहे हैं। उत्तर बिहार में तो जाली नोट के कारोबारियों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि फारबिसगंज, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया सहित आस-पास के इलाकों के चट्टी- बाजारों में जाली नोट पहुंच चुके हैं। सीबीआई के आलाधिकारी भी मानते हैं कि उत्तर-पूर्वी बिहार के कोसी क्षेत्र में स्थित बैंकों में भी जाली नोट पहुंच चुके हैं। जाली नोट के कंसानइमेंट को पकड़ने में डीआरआई भी लगी हुई है। उत्तर बिहार में सीबीआई, डीआरआई व बिहार पुलिस की कार्रवाई के बाद जाली नोट के तस्करों में हड़कंप मचा हुआ है। बीते समय में डीआरआई ने 20 लाख के 1000 रुपये के नकली नोट मशरिकी चंपारण के पीपरा कोठी में दो दिसंबर को एक बस से बरामद किये थे। इसके साथ ही मग्रीबी बंगाल के मालदा के मोहनपुर रिहायसी अशरफुल आलम को गिरफ्तार किया गया था। एक दूसरी वारदात में पटना पुलिस और एसटीएफ ने जॉइंट कार्रवाई में पटना में 75000 रुपये के नकली नोट को बरामद किए थे। 13 दिसंबर को 10 लाख रुपये के जाली नोट के साथ 10 सेलफोन,10 पासपोर्ट और छह नेपाली सिम के साथ मशरिकी चंपारण के प्रमोद कुशवाहा को गिरफ्तार किया गया था। उसने कबूल किया था कि पाकिस्तान के रास्ते जाली नोट बिहार लाए गए थे।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

छोटे दल खेलेंगे बड़ा खेल

2013 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने है। जिसके लिए रणनीति बनाने में जहां कांग्रेस अपनी पूरी तैयारी में है वहीं भाजपा भी इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं इनपर भाजपा और कांग्रेस में लड़ाई होती रही है। बीते एक दशक में बसपा ने भी अपनी आमद दर्ज कराई है। इस बार के नगर निगम के चुनाव में जीत दर्जकर बसपा सबको चौका भी दिया है। लेकिऩ अब एक और दल उस मुकाबले में आ गई है वह आम आदमी की पार्टी। यानी तय है कि इस वर्ष मुकाबला चतुष्कोणीय है। कम से कम बनाने की तो कोशिश है। कांग्रेस और भाजपी की असली चिंता यही है कि आखिर कैसे बसपा और आप के प्रभाव को कम किया जा सके। जहां तक आंकड़ों की बात है तो दिल्ली में अनुसूचित जाति के 19 फीसदी, मुस्लिम 10 फीसदी, सिख 5 फीसदी, जाट 3 फीसदी और अन्य 14 फीसदी मतदाता हैं। इनमें से 50 लाक मतदाता बिहार-यूपी, झारखंड और उत्तराखंड के हैं। दरअसल, पूर्वांचल मतदाता ही इस बार कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है। ऐसा प्रतीत हो रहा है। जिसका ट्रेलर नगर निगम के चुनाव में देखा गया है। हालांकि, शीला दीक्षित अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है। शीला दीक्षित ने एक बार फिर अपा मैनेजमेंट संभाल लिया है। शीला दीक्षित के लिए इस बरा सबसे बड़ा मुद्दा है अनियमित कॉलनियों को नियमित करना। उन्होंने घोषणा तो कर दी हैं लेकिन अभी तक वे कुछ नहीं कर पाई है। दिल्ली सचिवालय में अभी मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्री इस काम को पूरा करने में साफ दिख जाएंगें। शीला दीक्षित दिल्ली वालों के सुहाने सफर के लिए ईस्टर्न वेर्स्टन कॉरिडोर, पानी की सप्लाई के लिए मुनक नहर, केरोसीन फ्री दिल्ली, अन्न श्री योजना, गरीब महिलाएं के बैंक खाते और विकलांगों जैसी योजनाओं का प्रचार कर रही हैं ताकि जनता के बीच अभी सकारात्मक छवि पहुंच सकें। हालांकि इस बार समीकरण में कुछ बदलाव जरूर आया है। जिस प्रकार अन्य प्रदेशों में छोटी पार्टी अहम रोल निभा रही है, उससे बार-बार यह कहा जा रहा है कि इस बार छोटी पार्टियां अपना बड़ा रोल अदा करेंगी। दरअसल दिल्ली में बसपा ही एकमात्र पार्टी है जो अहम भूमिका में है। दिल्ली में अन्य पार्टियों में जो चुनाव के समय सक्रियता दिखाती है वह आईएनएलडी, राजद, जदयू, पीस पार्टी, अपना दल, एनसीपी, अकाली दल है। इस बार आप पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी अहम भूमिका में रहेगी। दिल्ली में छोटे दलों की चर्चा के पहले दो पार्टियों की चर्चा आवश्यक है वह है आप पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी। प्रोग्रेसिव पार्टी के अध्यक्ष जगदीश मंमगई हैं। वे पार्षद रह चुके हैं। भाजपा में रहे हैं और दिल्ली की पूरी जानकारी रखते हैं। इनकी खास बात यह है कि इनकी पार्टी दिल्ली आधारित पार्टी है। जगदीश मंमगई अरविंद केजरीवाल की तरह मीडिया में छाए रहने और होहल्ला में विश्वास नहीं करते हैं। जगदी मंमगई के आदर्श कांशीराम हैं जिन्होंने अपना मजबूत आधार बनाया। अपने कार्यकर्ता बनाएं जिसके बदौलत अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बना ली और जो पार्टी आज देश में अहम भूमिका में है। ममंगई भी लगातार दिल्ली में घूमघूमकर अपना जनाधार मजबूत करने में लगे हैं। इनका फास मानना है कि जो कांग्रेस और भाजपा से दुखी है वह अपना विकल्प ढूंढेगा और वह विकल्प प्रोग्रेसिव पार्टी देगी। इस रूप में इन्हें सफलता मिलता साफ नजर आ रहा है क्योंकि कांग्रेस सत्ता में है तो इसे सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा जबकि शहरी मतदाता भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के छिछालेदर से अवगत हो गया है। इसलिए ये मतदाता प्रोग्रेसिव पार्टी की ओर आएंगें ही । जगदीश ममंगई का अरविदं केजरीवाल के बारे में कहना है कि वे भले ही दिल्ली में अपनी गतिविधि चला रहे हैं लेकिन इनके साथ और वे खुध बाहरी है, जिससे चुनाव में इनका प्रभाव नहीं पड़ेगा। अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी की पार्टी बनाकर सीधे मैदान में आ गए हैं। इन्हें मीडिया भी खूब तरजीह दिया। भाजपा के मंच पर चढकर इन्होंने उसे भी रूलाया तो कांग्रेस पर आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, लेकिन चुनाव में सबसे अहम बात होती है सामाजिक समीकरण की। वह इनके पास जीरो है। इनका अभियान व्यवहारिक नहीं दिखता है चुनाव के खातिर। केजरीवाल के वोटर वे होंगे, जिनके लिए वोट फैशन है। ऊंचे वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के मतदाता इनके प्रभाव में हैं जिन्हें ये प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यह तो तय है कि दिल्ली में आम भूमिका में नहीं होगी आप पार्टी। हां यह भी तय है कि भाजपा को ही इनके आने से नुकसान होगा। प्रोग्रेसिव पार्टी आप पार्टी में अंतर यही है कि प्रोग्रेसिव पार्टी प्रत्येक मुहल्ले और आर डब्ल्यूए में जाकर अपने जड़ मजबूत करने में लगी है सामाजिक समीकरण समझने में लगी है तो केजरीवाल सीधे मीडिया से मजबूत होना चाहते हैं। दिल्ली में जो नेशनल पार्टी यहां छोटी भूमिका में हैं लेकिन अहम है, वह है बसपा। दिल्ली में 12 सीटे सुरक्षित सीटें हैं पहले यह 13 हुआ करती थी जो परिसीमन के बाद 12 हो गई। बसपा ने पिछले विधानसभा में दो सीटें जीती भी थी। अभी इनमें 10 सीट कांग्रेस के पास है। बसपा इऩ सीटों पर अपना प्रभाव छोड़ देती है। इऩ सीटों में भाजपा कहीं भी मुकाबले में नहीं है। यहां भी मुकाबले में भाजता तभी आती है जब बसपा कांग्रेस का वोट काट दें तो इसका फायदा भाजपा को मिल जाता है। यहां सामाजिक समीकरण समझने की जरूरत है। बसपा को दिल्ली में जाटव का वोट तो मिलता है लेकिन बाल्मिकी का नहीं। यह वोट केवल और केवल कांग्रेस को जाता है। जबकि यही बाल्किमीकी उत्तर प्रदेश में बसपा को वोट देता है। दिल्ली में बाल्मिकी वोट यहां पुराने समय से कांग्रेस से जुडा है जिसे बसपा भी नहीं तोड़ पाई है। नंदनगरी जैसे इलाकों में सुरक्षित सीट पर वोट कांग्रेस को मिलता है जिसका कारण बताया जाता है कि यहां झुग्गी झोपड़ी से सीधे कांग्रेस इन्हें बसा दिया है जिससे इनके मकानों की कीमत आसमान पर है। इसलिए इन क्षेत्रों में बुर्जुग सौ फीसदी कांग्रेसी है। भले ही युवा कुछ इधर-उधर हो जाएं। 12 सीटें जो सुरक्षित हैं उसमें दूसरी पार्टी ज्यादा अहम रोल इसलिए नहीं निभा पाती है क्योंकि यहां अन्य समुदाय के लोगों में उत्साह नहीं है क्योंकि अल्टीमेटली सुरक्षित सीट ही है। इसलिए यहां जो एक बार मजबूत हो गया है वही रहेगा। यह भी तय है। दिल्ली में बसपा में टिकट लेने की होड़ इसलिए रहता है क्योंकि टिकट के साथ अपना वोट बैंक भी देती है। बसपो को दिल्ली में 9 से 10 फीसदी वोट पड़ जाती है। यह पार्टी तीसरे नंबर पर तीन बार से रही है चुनावों में। सीमापुरी, मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी, सुलतानपुरी, भलस्वा, जहांगीरपुरी, पटपड़गंज, देवली और अंबेडकरनगर जैसे इलाकों में बसपा का प्रभाव है। अब बात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी की। दिल्ली में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का मतलब है रामवीर सिंह विधुरी। जो बदरपुर का प्रतिनिधित्व करते हैं। दो सीटें हैं इस पार्टी के पास एक बदरपुर तो दूसरा हरकेशनगर से। इनका दिल्ली में और कहीं जनाधार नहीं है। जो भी उम्मीदवार जीतकर इस पार्टी से आते हैं वह अपने बूते हीं। उन्हें पार्टी का चिह्न जरूर मिल जाता है जबकि पार्टी को नेशनल पार्टी बनने में सहायता इसके अलावे इनकी भूमिका नग्णय है। विधुरी इस पार्टी का अपने आवश्यकतानुसार उपयोग करते हैं। छोटी पार्टी में एक दल है राजद। जिसके सुप्रीमो लालू प्रसाद हैं। राजद ने पिछले विधानसभा में ओखला से एक सीट जीता है। राजग की साख बिहार में होने की वजह से ऐसा प्रतीत होता है कि उसे दिल्ली में बिहार वासियों का वोट बैंक मिलेगा। लेकिन यह तय है दोनों दिग्गज पार्टियां भाजपा औऱ कांग्रेस भी अपने-अपने उम्मीदवार ऐसे तय करते हैं जहां इनकी संख्या ज्यादा है वहां उम्मीदवार भी बिहार और यूपी के लोगों को देते हैं जिससे राजद जैसे दलों की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। हां यह तय है कि राजद के कुछ समर्थक जरूर दिल्ली में हैं जो इनकी साख को मजबूत करने में लगे हैं लेकिन यह आसान नहीं दिखता। राजद की तरह जदयू भी अपनी उम्मीदवार दिल्ली में खड़ा करती है। जदयू के जो उम्मीदवार रहते हैं उसे ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार का समर्थन मिलेगा। लेकिन नीतीश राजनीति की बारिकियों को समझते हैं और दिल्ली में प्रचार के लिए नहीं आते। शरद यादव का तो खुद जनाधार कहीं नहीं है तो दिल्ली में कहां से मतदाताओँ को रिझा पाएंगे। इंडियन नेशनल लोकदल बाहरी दिल्ली नजफगढ़ इलाके में अपना वजूद एक सीट तक ही सीमित रखा है। दिल्ली के अंदर इनका प्रभाव न के बराबर है। हां इतना तय है कि नजफगढ़ इलाके में इनका प्रभाव चलता रहेगा जहां से अभी भरत सिंह विधायक हैं। आईएनएलडी अन्य इलाकों में विस्तार की भी योजना नहीं है। लेकिन छोटी पार्टी की लिस्ट में तो है ही। आउटर दिल्ली में लोकदल का प्रभाव भी रहा है वह चौधरी चरण सिंह की वजह से लेकिन फिलहाल किसी रोल में नजर नहीं आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश की दो और पार्टी है जो दिल्ली में अपना जगह तलाश रही है वह अपना दल और पीस पार्टी। अपना दल को भी तक कोई खास अहमियत यहां नहीं मिलने जा रहा है क्योंकि यहां जाति आधारित चुनाव न हो कर समुदाय आधारित चुनाव होते हैं। जबकि पीस पार्टी मुसलमानों की पार्टी कही जाती है इसमें वैसे मुसलमान टिकट के लिए आ जाते हैं जिन्हें कांग्रेस या भाजपा ने टिकट नहीं दिया हो। ताकि वे अपने बलबूते जीत दर्ज करा सकें। इनकी भूमिका भी यहीं तक है। जहां तक सपा की बात है तो इस बार सपा अपने उत्तर प्रदेश के जीत को दिल्ली में भुनाना चाह रही है। लेकिन उसे लगता है कि उसका प्रभाव यहां ज्यादा नहीं है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तीसरा मोर्चा पर काम कर रहे हैं उनका मानना है कि अगर इसी तर्ज पर दिल्ली में काम किया जाए तो दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा का वर्चस्व तोड़ा जा सकता है। बहरहाल, छोटी पार्टी चुनाव के पहले तक तो लगता है कि अहम भूमिका में रहती है लेकिन चुनाव के समय में दिल्ली जैसे इलाकों में अहम भूमिका में नहीं होती है क्योंकि वोटों का समीकरण कुछ इस प्रकार है। दिल्ली के समीकरण को समझें तो 37 फीसदी वोट कांग्रेस के पास हैं, 32 फीसदी वोट भाजपा के पास। उस 37 फीसदी वोट में कोई सेंध लगता है तो भाजपी की सरकार बन जाएंगी। यानी बाकी बचे 30 फीसदी वोट पर अन्य छोटे दल अपने पक्ष में कर लेते तो कुछ अहम भूमिका में आ सकते हैं जो कि लगता नहीं है।

नाम नहीं, आइडिया कहिए जनाब

इतिहास ने कई प्रभावशाली नेता देखे हैं, जिन्?होंने देश की जनता को आगे बढ़ाने में सकारात्?मक भूमिका अदा की। आपदा के समय उन्?होंने देश को संकट से उबारा। ऐसी ही एक आंधी गुजरात से उठी है, जिसने दिल्?ली में बैठे कई लोगों के होश उड़ा दिये हैं। उस आंधी का नाम है नरेंद्र मोदी। जब भ्रष्?टाचार की बात आती है तो आपको नरेंद्र मोदी की छवि पर एक भी दाग नहीं मिलेगा। यही कारण है कि मोदी हर मंच पर बेबाक बोलते हैं। यदि आप विकीलीक्?स के द्वारा किये गये खुलासों में देखें तो भारत में तमाम नेताओं की छवि को धूमिल करने के लिये हजारों प्रयास किये गये हैं। उनमें 100 से अधिक प्रयास तो सिर्फ मोदी की छवि को धूमिल करने के लिये हैं। कहते हैं अच्?छी राजनीति अच्?छी अर्थव्?यवस्?था नहीं होती, अच्?छी अर्थव्?यवस्?था अच्?छी राजनीति नहीं होती। यही कारण है कि एक राजनीतिक पार्टी का मकसद साम दाम दंड भेद किसी भी प्रकार से चुनाव जीतना होता है। आर्थिक मंदी के चलते कई बार राजनीतिक इच्?छाशक्ति भी समाप्?त हो जाती है। राजनीति में आने वाले लोगों में किसे राजस्?व की चिंता रहती है। ऐसे बहुत कम ही मिलेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी हैं, जिनके अंदर आर्थिक मामलों में कुशाग्रता हासिल है। आप ही देख लीजिये देश में कौन सा नेता है उनके अलावा जिसने फूड सिक्?योरिटी बिल का विरोध किया है। यह वो व्?यक्ति है, जिसने हमेशा जमीनी स्?तर पर सोचा और काम किया साथ ही अपनी गवर्नेंस से लोगों को चौंका दिया है। कांग्रेस से एकदम अलग हट कर देखें तो मोदी की ख्?याति का सिर्फ एक कारण है गुजरात में उनका प्रदर्शन। उनके नेतृत्?व में गुजरात का लोहा कई बड़े अर्थशास्?त्री मानते हैं। न्?यूज मैगजीन इक्?नॉमिस्?ट ने लिखा, "गुजरात में जिस तरह कई काम चल रहे हैं, वैसे भारत में बहुत कम दिखाई पड़ता है।" भारत की 5 फीसदी जनसंख्?या को समेटे हुए इस गुजरात में 16 फीसदी औद्योगिक आउटपुट और 22 फीसदी निर्यात होता है। पिछले दस साल में यहां की विकास दर दोगुनी हो गई है। कृषि विकास दर 10 फीसदी है, जबकि भारत 3 फीसदी पर अटका हुआ है। मोदी ने अपने शाासन में यहां के इंफ्रास्?ट्रक्?चर को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिजली की निरंतर सप्?लाई उद्योगों को बल देती है। नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन फिर भी जहां वो जाते हैं जनता उनकी ओर खिंची चली आती है। हाल ही में हैदराबाद की रैली ही ले लीजिये। कांग्रेस जहां तेलंगाना पर राजनीति कर रही है और तेलंगाना व सीमांध्रा के लोग एक दूसरे को मारने-काटने पर उतारु हैं, वहीं मोदी ने दोनों से अपील की कि हिंसा बंद करके एक साथ मिलकर शांतिपूर्वक राज्?य का बंटवारा करें। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस का मुद्दई बनने में कामयाब हो गये हैं। अभी तक भले ही कांग्रेस उनके बारे में कहती रही हो कि वे मोदी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं और मोदी उनके लिए कोई चुनौती नहीं हैं लेकिन जहां एक ओर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मोदी नाम की माला जपी तो कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह और केन्द्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मोदी कांग्रेस से बड़ा खतरा भाजपा के लिए हैं। बिहार में जदयू भाजपा गठजोड़ के टूटने के बाद कांग्रेस के तीनों दिग्गजों ने नरेन्द्र मोदी पर अलग अलग मौकों पर राजनीतिक हमला बोलते हुए जो कुछ कहा उससे एक बात तो साफ हो गई कांग्रेस के लिए मोदी मुद्दई नंबर एक हो गये हैं। और राजनीतिक रूप से नरेन्द्र मोदी की मंशा भी यही थी, इसीलिए अपने भाषणों में नरेन्द्र मोदी केन्द्र की कांग्रेस सरकार पर तीखे हमले करने से कभी पीछे नहीं रहते हैं। ऐसे में बरबस ही सवाल उठता है कि क्या मोदी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखकर कोई अपराध कर रहे हैं? क्या मोदी पीएम पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं रखते? क्या मोदी राष्ट्र और विकास विरोधी हैं? क्या मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश और जनता का कोई बड़ा नुकसान होने वाला है? ऐसे तमाम सवाल है जिनका सीधा जबाव देने की बजाय विपक्ष मोदी को व्यक्तिगत तौर पर कीचड़ उछालने, गोदरा कांड ओर फर्जी हत्याओं का आरोप उन पर लगाता है। पिछले कई सालों से सुरक्षा और जांच एजेसिंया मोदी के खिलाफ इन घटनाओं में शामिल होने के पर्याप्त और पुख्ता सुबूत ढूंढ नहीं पाई हैं। इन स्थितियों में विपक्ष का विरोध ऊपरी तौर पर दुष्प्रचार और दुर्भावना से ओत-प्रोत दिखता है। और जहां तक पार्टी के भीतर मोदी के विरोध की बात है तो स्वाभाविक तौर पर पीएम बनने की इच्छा पार्टी के कई दूसरे नेता भी पाले बैठे हैं फिर अगर मोदी पीएम पद के लिए प्रयासरत हैं तो इसमें बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं है।

तो खत्म होगा राज्यपाल का पद?

हाल ही में राज्यपाल के पद के राजनीतिक दुरुपयोग की लोकसभा में जमकर बवाल मचा। इसकी आलोचना करते हुए विभिन्न दलों के नेताओं ने इस पद को औपनिवेशक काल की विरासत बताया और इस संवैधानिक पद को समाप्त किए जाने की पुरजोर मांग की। जनता दल यू , तृणमूल कांग्रेस , समाजवादी पार्टी , राजद और बीजू जनता दल समेत अधिकतर दलों के सदस्यों की राय थी कि देश की आर्थिक हालत को देखते हुए राज्यपाल का पद आर्थिक ढांचे पर एक बोझ है और बदलते परिदृश्यों में इस पद की व्यावहारिकता की समीक्षा किए जाने की जरूरत है। इन दलों के नेताओं ने ‘राज्यपाल (उपलब्धियां, भत्ते और विशेषाधिकार) संशोधन विधेयक’ पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए राज्यपाल पद की कड़ी आलोचना की और राजभवनों को ‘सफेद हाथी’ करार दिया। राज्यपाल पद को बनाए रखने की स्थिति में अधिकतर दलों के सदस्यों ने संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशविरे के अनुसार ही राज्यपाल की नियुक्ति किए जाने संबंधी 1988 में गठित सरकारिया आयोग की सिफारिशों का अनुपालन किए जाने की पुरजोर मांग की। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए भाजपा के कीर्ति आजाद ने राज्यपाल के पद को राजनीति से परे रखे जाने, नियुक्ति में पारदर्शिता बरते जाने और इस संबंध में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा गठित सरकारिया आयोग की सिफारिशों का अनुपालन किए जाने पर जोर दिया। कीर्ति आजाद ने कहा कि सरकारिया आयोग समेत केंद्र राज्यों के संबंधों पर तीन आयोग और दो समितियां गठित की जा चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद राज्यपाल का पद दिनोंदिन विवादास्पद होता जा रहा है। उन्होंने दागदार व्यक्तियों को इस संवैधानिक पद पर नियुक्ति नहीं किए जाने का प्रावधान करने की भी मांग की। यदि हाल के वर्षों में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि के राज्यपालों की भूमिका पर पड़ताल की जाए, तो कहने में कोई संकोच नहीं होता कई बार राज्यपाल केंद्र सरकार नहीं बल्कि केंद्र में सत्तासीन दल के एजेंट विशेष के रूप में कार्य करते हैं। ऐसे में सवाल तो बनता ही है कि ऐसे सियासी दांवपेच के बीच राज्यपालों की भूमिका क्या होनी चाहिए? इस पर बहस तेज हो गयी है। हालांकि राज्यपालों की बयानबाजी और उनकी भूमिका को लेकर यह कोई पहली मर्तबा सवाल नहीं उठा है। गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल द्वारा लोकायुक्त के पद पर न्यायमूर्ति आरए मेहता की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठा था। मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक गया था। कर्नाटक में भी राज्य मंत्रिपरिषद से सलाह-मशविरा किए बगैर ही लोकायुक्त की नियुक्ति की गई। सच यह है कि कांग्रेस पार्टी जब भी सत्ता में रही है राज्यपालों का दुरुपयोग की है। साढ़े छह दशक का इतिहास बताता है कि वह गैरकांग्रेसी सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए राजभवन की ताकत का इस्तेमाल की है। वह संघ-राज्य संबंधों का बिल्कुल ख्याल नहीं रखती है। आज भी जिन राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें हैं वहां राज्यपालों की सक्रियता ज्यादा देखी जाती है।