शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

दलाईलामा और तवांग यात्रा

प्रकृति अनन्त शक्तियों का भण्डार है । वैज्ञानिकों ने वायुयान, रेडियो, विद्युत, वाष्प आदि के अनेक आश्चर्य जनक आविष्कार किये हैं और नित्यप्रति होते जा रहे हैं पर प्रकृति का शक्ति भण्डार अनन्त और अपार है कि धुरधंर वैज्ञानिक अब तक यही कह रहे हैं कि हमने उस महासागर में से अभी कुछ सीपें और घोघें ही ढूंढ पाये हैं । उस अनन्त तत्व के शक्ति परिमाणुओं की महान् शक्ति का उल्लेख करते हुए सर्वमान्य वैज्ञानिक डॉक्टर टामसन कहते हैं कि एक 'शक्ति-परिमाणुÓ (इलैक्ट्रान) की ताकत से लन्दन जैसे तीन नगरों को भस्म किया जा सकता है । ऐसे अरबों-खरबों परिमाणु एक एक इंच जगह में घूम रहे हैं फिर समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति की तुलना ही क्या हो सकती है । हमारी आत्मा भी इसी चेतन्य तत्व का अंश है हमारे शरीर में भी असंख्य इलैक्ट्रान व्याप्त हैं इसलिए मानवीय शरीर और आत्मा भी अनन्य शक्ति सम्पन्न है उसे हाड़-माँस का पुतला मात्र न समझना चाहिए । काल चक्र सदैव घूमता रहता है उसी के अनुसार संसार की अनन्त विद्याओं में से समय पाकर कोई लुप्त हो जाती है तो कोई प्रकाश में आती है । अब तक कितनी ही विद्यायें लुप्त और प्रकट हो चुकीं हैं और आगे कितनी लुप्त और प्रकट होने वाली हैं इसे हम नहीं जानते । आज जिस प्रकार भौतिक तत्वों के अन्वेषण से योरोप में नित्य नये वैज्ञानिक यंत्रों का आविष्कार हो रहा है उसी प्रकार अब से कुछ सहास्रब्दियों पूर्व भारत वर्ष में आध्यात्म विद्या और ब्रह्मविद्या का बोलवाला था । उस समय योग के ऐसे साधनों का आविष्कार हुआ था जिनके द्वारा नाना प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करके साधक लोग ईश्वर का साक्षात्कार करते थे और जीवन मुक्त हो जाते थे ।
इसी ईश्वीर साक्षात्कार से ओतप्रोत हैं दलाईलामा। चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो (6 जुलाई, 1935 - वर्तमान) तिब्बत के राष्टï्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई, 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले येओमान परिवार में हुआ था। दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन की कहा जाता है। वर्ष 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए। लेकिन आखिरकार वर्ष 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। इसके बाद से ही वह उत्तर भारत के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं जो केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं। 1963 में दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। इसके बाद परमपावन ने इसमें कई सुधार किए। हालांकि, मई 1990 में तक ही दलाई लामा द्वारा किए गए मूलभूत सुधारों को एक वास्तविक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जा सका। इस वर्ष अब तक परमपावन द्वारा नियुक्त होने वाले तिब्बती मंत्रिमंडल; काशग और दसवीं संसद को भंग कर दिया गया और नए चुनाव करवाए गए। निर्वासित ग्यारहवीं तिब्बती संसद के सदस्यों का चुनाव भारत व दुनिया के 33 देशों में रहने वाले तिब्बतियों के एक व्यक्ति एक मत के आधार पर हुआ। धर्मशाला में केंद्रीय निर्वासित तिब्बती संसद मे अध्यक्ष व उपाध्यक्ष सहित कुल 46 सदस्य हैं। 1992 में दलाई लामा ने यह घोषणा की कि जब तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा तो उसके बाद सबसे पहला लक्ष्य होगा कि एक अंतरिम सरकार की स्थापना करना जिसकी पहली प्राथमिकता यह होगी तिब्बत के लोकतांत्रिसंविधान के प्रारूप तैयार करने और उसे स्वीकार करने के लिए एक संविधान सभा का चुनाव करना। इसके बाद तिब्बती लोग अपनी सरकार का चुनाव करेंगे और परमपावन दलाई लामा अपनी सभी राजनीतिक शक्तियां नवनिर्वाचित अंतरिम राष्ट्रपति को सौंप देंगे। वर्ष 2001 में दलाई लामा के परामर्श पर तिब्बती संसद ने निर्वासित तिब्बती संविधान में संशोधन किया और तिब्बत के कार्यकारी प्रमुख के प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया। निर्वाचित कार्यकारी प्रमुख अपने कैबिनेट के सहयोगियों का नामांकन करता है और उनकी नियुक्ति के लिए संसद से स्वीकृति लेता है। पहले प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी प्रमुख ने सितम्बर 2001 में कार्यभार ग्रहण किया।
हर तिब्बती दलाई लामा के साथ गहरा व अकथनीय जुड़ाव रखता है। तिब्बतियों के लिए परमपावन समूचे तिब्बत के प्रतीक हैं: भूमि के सौंदर्य, उसकी नदियों व झीलों की पवित्रता, उसके आकाश की पुनीतता, उसके पर्वतों की दृढ़ता और उसके लोगों की ताकत का। तिब्बत की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने हेतु परमपावन दलाई लामा को वर्ष 1989 का नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। उन्होंने लगातार अहिंसा की नीति का समर्थन करना जारी रखा है, यहां तक कि अत्यधिक दमन की परिस्थिति में भी। शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना परमपावन दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिधांत है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं। परमपावन दलाई लामा ने 52 से अधिक देशों का दौरा किया है और कई प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और शासकों से मिले हैं। उन्होंने कई धर्म के प्रमुखों और कई प्रमुख वैज्ञानिकों से मुलाकात की है। परमपावन के शांति संदेश, अहिंसा, अंतर धार्मिक मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता के रूप में 1959 से अब तक उनको 60 मानद डॉक्टरेट, पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। परमपावन ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं। परमपावन अपने को एक साधारण बौध भिक्षु ही मानते हैं। दुनियाभर में अपनी यात्राओं और व्याख्यान के दौरान उनका साधारण व करूणामय स्वभाव उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को गहराई तक प्रभावित करता है। उनका संदेश है प्यार, करूणा और क्षमाशीलता।
गत दिनों अरुणाचल प्रदेश का तवांग इलाका तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के भव्य स्वागत को तैयार किया गया। तवांग यात्रा के दौरान उन्होंने कई धार्मिक समारोहों में शिरकत किया। चीन के ऐतराज के बावजूद भारत और विशेषकर अरूणाचल के लोगों ने दलाई लामा का जोरदार स्वागत कर किया। हर जगह लहराते तिरंगे और तिब्बती ध्वज चीन के जख्मों पर नमक छिड़कते रहे। बर्फ से अटे पहाड़ों के बीच 10 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित तवांग में जगह-जगह दलाई लामा की तस्वीरें और झंडे लगे रहे। 'भारत-तिब्बत संबंध जिंदाबादÓ के बैनरों से रास्ते अटे हुए रहे। कई लोगों का कहना है कि चीन को चिढ़ाने के लिए ही यहां तिरंगे लगाए गए हैं। स्थानीय लोगों में दलाई लामा की यात्रा को लेकर जबर्दस्त उत्साह है। इस बार सिक्यूरिटी ज्यादा कड़ी है। लेकिन सेना की मदद नहीं ली गई है।
दलाई लामा की फेवरिट डिश बनाने के लिए खानसामों को एक महीने से ट्रेनिंग दी गई। दलाई लामा को दिए जाने वाले गिफ्ट एक साल से इक_ा किए जा रहे थे। इनमें धार्मिक पुस्तकें, स्तूपों के नन्हे रेप्लिका, मूर्तियां और फूल आदि प्रमुख हैं। नेपाल और भूटान से भी सैकड़ों भक्त आए हुए हैं। ऐसा नहीं है कि इस बार दलाई लामा की पहली तवांग यात्रा हो। दलाई लामा पहले भी पांच बार तवांग आ चुके हैं। उनकी यात्रा से भारत का मेसिज स्पष्ट है कि तवांग हमारा अभिन्न हिस्सा है। यहां के लोग भी खुद को भारतीय मानते हैं। भारत दलाई लामा को सम्माननीय अतिथि का दर्जा देता है। चीन के विरोध के कारण दलाई लामा की यात्रा पर दुनिया भर की नजरें हैं। चीन ने मांग की थी कि भारत दलाई लामा को अरुणाचल दौरे की इजाजत न दे। लेकिन भारत ने स्पष्ट कह दिया कि हम दलाई लामा को कहीं भी आने-जाने से नहीं रोकेंगे। दलाई लामा की यात्रा की कवरेज के लिए विदेशी मीडिया को आने की इजाजत नहीं दी गई । कई विदेशी पत्रकारों के परमिट कैंसल कर दिए गए। तमाम विदेशी पत्रकारों की अजिर्यों पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। भारत का कहना है कि दलाई लामा की यात्रा के दौरान विदेशी पत्रकारों को जाने की इजाजत नहीं मिली।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बहसों से बेपरवाह तवांग विहार अपने आध्यात्मिक गुरू की अगवानी के लिए पलक पांवड़े बिछा रहा है। यहां 188 भिक्षुणियां दलाई लामा को भेंट किए जाने वाले पीतल के कटोरे को तैयार करने में लगी हुई हैं। तैयारियों का पर्यवेक्षण का रहे विहार के लामा लोपोंन ने बताया कि राज्य के विभिन्न विहारों से 775 भिक्षु और 188 भिक्षुणियां तवांग पहुंच रही हैं सभी दलाई लामा की बाधा रहित यात्ना के लिए प्रार्थनाएं कर रहे हैं।
दलाई लामा के तवांग आगमन पर विशेष समारोह कुसुग्तुग्तेन का आयोजन किया जाएगा। श्री लोपोन ने कहा कि पिछले साल दलाई लामा राजनीतिक कारणों से यहां नहीं आ सके थे। उन्होंने उम्मीद जतायी कि इस बार ऐसा नहीं होगा। काबिलेगौर है कि राज्य के मुख्यमंत्नी दोरजी खांडू तवांग क्षेत्न से हैं और उन्होंने निजी तौर पर तैयारियों की समीक्षा की । दलाई लामा की अगवानी में वह तवांग में वह स्वयं मौजूद रहे। लुमला क्षेत्न के पूर्व विधायक टी जी रिम्पोछे बोमडिला के विहार से आने वाले 256 भिक्षुओं के दल का नेतृत्व किया। दलाई लामा के सबसे बड़े अभियान के समर्थन में स्थानीय लोग सहायता रूवरूप धन और सोन-चांदी के सिक्के जमा कर रहे थे।
अरुणाचल प्रदेश का यह इलाका चीन बॉर्डर से सटा हुआ है। चीन यहां के कुछ इलाके पर अपना दावा जताता रहा है। लेकिन भारत इसका कड़ा विरोध करता है। तवांग मठ 300 साल पुरानी मॉनेस्ट्री है। दलाई लामा 1959 में ल्हासा से भागकर जब भारत आए थे, तब इसी मठ में ठहरे थे। भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध में चीनी फौजें अरुणाचल प्रदेश में काफी अंदर तक घुस आई थीं। चीन ने 1914 में खींची गई मैकमहन रेखा को कभी मान्यता नहीं दी और 90 हजार वर्ग किलोमीटर के इलाके पर अपना दावा करता रहा। इसमें से ज्यादातर इलाका अरुणाचल में आता है। भारत चीन पर कश्मीर में 8000 वर्ग किमी का इलाका कब्जाने का आरोप लगाता रहा है।
अपनी यात्रा के दौरान धार्मिक गुरु दलाई लामा ने चीन के उन दावों को ग़लत बताया है जिनमें कहा गया है कि वो एक अलगाववादी आंदोलन चला रहे हैं। दलाई लामा ने अपनी यात्रा को ग़ैर-राजनीतिक बताते हुए कहा, 'ये चीन के लिए आम बात है कि मैं कहीं भी जाऊं वो मेरे ख़िलाफ़ अभियान तेज़ कर देते है। Ó तवांग में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी यात्रा का उद्देश्य विश्व भाईचारा बढ़ाना है। तवांग में 400 साल पुराना तिब्बती बौद्ध मठ है और दलाई लामा यहां से जुड़े रहे हैं। वर्ष 1959 में जब तिब्बत में चीनियों के ख़िलाफ़ विद्रोह विफल हो गया था तब दलाई लामा अपने साथियों के साथ भारत की ओर भागे थे। उन्होंने पहला क़दम अरुणाचल में रखा और तवांग उनका पहला पड़ाव बना। दलाई लामा की एक झलक पाने के लिए लोग ट्रक पर लद कर और कई मील की पैदल यात्रा करके तवांग पहुँचे ताकि वे अपने धार्मिक गुरु की एक झलक पा सकें।
इस सबके बीच प्राकृतिक रूप से अपनी समृद्धता तथा चीन और भारत के रिश्तों की गर्माहट को लेकर चर्चा में रहने वाले तवांग के लोगों को इस बात को लेकर संशय है कि अपनी बढ़ती उम्र व व्यस्त कार्यक्रम के चलते फिर तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा दोबारा यहाँ आएँगे अथवा नहीं। उल्लेखनीय है कि तमाम विवादों के बीच तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा पिछले हफ्ते अरुणाचलप्रदेश के तवांग के दौर पर गए थे। ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित हो चुके लामा ताशी ने कहा कि वे इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हैं कि 74 वर्षीय दलाई लामा फिर कभी यहाँ आएँगे। ताशी ने कहा उनका अंतरराष्ट्रीय महत्व है और वे बहुत व्यस्त रहते हैं। कोई नहीं कह सकता कि उनके दोबारा दौरे को हर स्तर पर स्वीकार्यता मिल पाएगी या नहीं। स्थानीय लोगों को आशंका है कि बढ़ती उम्र और तवांग की दस हजार फुट की ऊँचाई उन्हें फिर कभी इस ठंडे स्थान पर आने देगी या नहीं। दलाई लामा के पिछले दो दौरों के प्रत्यक्षदर्शी रहे तोरजी खाण्डू ने कहा दलाई लामा वृद्ध होते जा रहे हैं। उनके हर दौरे पर पर पडऩे वाले राजनीतिक प्रभाव की वजह से शायद उनका यह दौरा अंतिम हो। दलाई लामा के दौरे पर 87 वर्षीय रेंपा सेरिंग का कहना है चीन शायद अगले दलाई लामा का राज्याभिषेक न होने दे। उनके प्रत्येक दौरे पर चीन आपत्ति जताता है और अरुणाचल के इस भाग को अपना बताने का दावा करता है। इसलिए वह पंद्रहवें दलाई लामा के राज्याभिषेक को रोकने की पूरी कोशिश करूँगा।
करीब पाँच सौ साल पुराने मठ के प्रमुख रिनपोछे ने कहा वे पूरी तरह से चुस्त-दुरुस्त हैं और उन्हें कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या भी नहीं है, इसलिए मुझे लगता है कि वे दोबारा जरूर यहाँ आएँगे। रिनपोछे ने कहा कि दलाई लामा को लोगों से मिलना बहुत पसंद है और रात के भोजन में चावल और सब्जी लेते हैं। उल्लेखनीय है कि दलाई लामा तवांग में चार दिनों तक रहे और वहाँ के लगभग हर इलाके का उन्होंने दौरा किया। इस दौरान वे अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से घूम रहे थे और उनका स्वागत करने के लिए इलाके के लोग सड़क के दोनों ओर रंग-बिरंगे झंडे लेकर कतारबद्ध नजर आए।

1 टिप्पणी:

Rajey Sha ने कहा…

काफी सूचनावधर्क पोस्‍ट है, धन्‍यवाद।