गुरुवार, 10 सितंबर 2009

स्वाइन फ्लू : खतरा टला नहीं

रिदा शेख की मौत ने स्वाइन इनफ्लूय्ोजा य्ाानी स्वाइन फ्लू को भारत में भी महामारी के तौर पर स्थापित कर दिय्ाा है। जब विश्व स्वास्थ संगङ्गन ने इसे महामारी घोषित किय्ाा था तब भारतीय्ा, य्ाह सोच कर खुश हो रहे थे कि इसके वाय्ारस भारत में नहीं पनप रहे हैं। एक तरह से भारत के लिए य्ाह बीमारी अनजानी थी। पर भारतीय्ाों की य्ाह खुशनसीबी ज्य्ाादा दिनों की नहीं थी। विदेशों से आने वाले लोग इसके वाहक बन भारत में इसकी संख्य्ाा में वृद्धि करते रहे और अब आलम य्ाह है कि य्ाह बीमारी न सिर्फ उन स्थानों में फैल रही है जहां विदेशों से आने वालों की संख्य्ाा ज्य्ाादा है बल्कि देश के दूसरे इलाकों में भी तेजी से पनप रही। अब भारतीय्ा स्वास्थ्य्ा मंत्र्ाालय्ा के सामने इसे महामारी मानने के अलावा कोई चारा नहीं है। साथ ही सरकार य्ाह भी समझ्ा चुकी है कि इससे निबटना इतना आसान न होगा क्य्ाोंकि अब तक इसकी कोई कारगर दवा बाजार में उपलब्ध नहीं है।
कोई भी बीमारी महामारी तभी बनती है जब लोगों को बीमारी की वजह और उससे बचाव के तरीकों का ज्ञान न हो। कुछ ऐसा ही स्वाइन फ्लू के साथ भी है। अधिकांशतः लोग, जिसमें पढे लिखे लोग भी शामिल हैं, य्ाही जानते हैं कि य्ाह बीमारी सुअर से फैलती हैं। भारत के दूरस्थ गांवों में तो शाय्ाद डाक्टरों को भी इसके लक्षणों और बचाव के तरीकों के बारे में सटीक पता न हो। कुछेक अगर य्ाह जानते भी हों कि बीमारी के लक्षण क्य्ाा हैं तो भी उन्हें इसके सही इलाज और बचाव बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में अगर इस बीमारी ने भारत में महामारी का रूप ले लिय्ाा है तो इसमें किसी को कोई आश्चयर््ा नहीं होना चाहिए। पहले भारतीय्ा स्वास्थ विभाग न तो इस रोग को गंभीरता से ले रहा था और न ही लोगों को इससे बचाने के लिए कोई मुहिम ही छेडी थी। पर जब इससे ग्रसित रिदा शेख ने इस बीमारी से जूझ्ाते हुए दम तोड दिय्ाा तब भारतीय्ा स्वास्थ्य्ा विभाग जागा और इससे गंभीरता से निबटने का दावा कर रहा है लेकिन अब भी दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में भी इससे निबटने के पुख्ता इंतजामों की कमी तमाम सरकारी दावों की पोल खोलती है। इस बीच भारत में इसके रोगिय्ाों की संख्य्ाा दिनों दिन बढती ही जा रही है और साथ ही इससे होने वाली मौतों की भी।
कैसे फैला
स्वाइन फ्लू को मैक्सिकन फ्लू, हाॅग फ्लू, य्ाा पिग फ्लू के नाम से भी जाना जाता है। भारत के लिए भले ही य्ाह रोग नय्ाा और अचंभित करने वाला हो पर पश्चिमी देशों के लोग इससे भली भांति परिचित हैं। पर इसके खतरे से वह भी अनजान ही थे क्य्ाोंकि सुअर से य्ाह वाय्ारस किसी व्य्ात्ति€ में होना काॅमन नहीं है। दरअसल इंसान के खून में ऐसी एंटीबाॅडीज पाए जाते हैं जो इसके वाय्ारस को पनपने नहीं देते। फिर अचानक क्य्ाोंकर इंसानी खून में इसके वाय्ारस पनपने लगे, इसपर रिसर्च जारी है।
अबतक य्ाह माना जाता था कि सुअर का मास पकाने के साथ ही स्वाइन फ्लू के वाय्ारस नष्ट हो जाते हैं। पर इंसानों में इसके लक्षण पाए जाने के बाद इस अवधारणा को दरकिनार कर दिय्ाा गय्ाा है। य्ाह रोग उन लोगों में पहले फैलता है जो सुअर पालते हैं और सुअर के साथ काम करते हैं। फिर य्ाह रोग संपर्क में आने पर एक व्य्ात्ति€ से दूसरे में आसानी से फैल जाता है। सुखद य्ाह है कि अब तक भारत के सुअर में इसके वाय्ारस नहीं पनपे हैं। भारत में अब तक जितने भी संक्रमित व्य्ात्ति€ मिले हैं वह य्ाह संक्रमण विदेशों से लेकर आए हैं।
प्रकार
20 वीं शताब्दी में स्वाएन फ्लू को पहचाना गय्ाा। 1918 में फ्लू पेनडेमिक के नाम से पहचाना जाने वाला य्ाह रोग ही 2009 में स्वाइन फ्लू के नाम से पहचाना जाता है। एच1एन1, एच1एन2, एच3एन1, एच3एन2, एच2एन3, आदि इसके मुख्य्ा प्रकार हैं जो सुअर में पाय्ाा जाता है। इसके अलावा एच5एन1 कई पक्षिय्ाों में भी पाय्ाा जाता है। अभी लोगों में जो वाय्ारस फैल रहा है वह ए टाइप का वाय्ारस है जो एच1एन1 का ही एक प्रकार का है।
रोग के लक्षण
इसके लक्षण भी सामान्य्ा फ्लू की तरह ही होते हैं जैसे तीप ज्वर, सर्दी, गले की खराश, शरीर में ऐंङ्गन, सरदर्द आदि। ध्य्ाान रखने वाली बात य्ाह है कि स्वाइन फ्लू भी आम फ्लू की तरह ही फैलता है और फ्लू के फैलने का लिए य्ाह मौसम सबसे उत्तम है। य्ाानी बारिश और गर्मी के इस संक्रमण काल में य्ाह और भी तेजी से पनप सकता है। दुखद य्ाह है कि अब तक इससे बचाव के लिए न तो कोई दवा बनी है और न ही कोई वैक्सीन, इसलिए समझ्ादारी इसी में हैं कि इससे खुद को बचाय्ाा जाए।
कैसे बचें
µप्रय्ाास करें कि इसके रोगिय्ाों से दूर रहें। अगर फिर भी आपको य्ाह रोग हो जाता है तो दूसरों को इससे बचाएं।
µअगर आपके आसपास रोग के फैलने की संभावना हो तो अपना नाक और मुंह अच्छी तरह से ढककर रखें खासकर खांसते और छींकते समय्ा। एक बार इस्तेमाल करने के बाद रूमाल फेंक दें।
µ खांसने और छींकने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोए
µआखों, मुंह और नाक को छूने से बचे अन्य्ाथा इसके वाय्ारस आसानी से आपके शरीर पर कब्जा जमा लेंगे।
µबीमार लोगों से दूर रहने का प्रय्ाास करें।
µरोगी व्य्ात्ति€ अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाए और जब तक वह पूरी तरह से ङ्खीक नहीं हो जाता तब तक आफिस, स्कूल य्ाा किसी भी भीड भाड वाले स्थानों पर न जाएं।

य्ाह रोग पश्चिमी देशों जैसे य्ाूनाइटेड स्टेट, य्ाूरोप, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अमेरिका और एशिय्ाा के कुछ देश (चीन, ताइवान, और जापान) के सुअरों में आम है। भारत इस लिहाज से सुरक्षित रहता अगर य्ाह रोग विदेश से लौटने वाले अपने साथ न लाते तो। भारत में पहले जो भी व्य्ात्ति€ पाजिटिव पाए गए हैं वह सभी विदेशों से लौटे थे। पर धीरेµधीरे उनके वाय्ारस य्ाहां के अन्य्ा लोगों में भी पनपने लगे। भारत में पहले स्वाएन फ्लू का केस केरल में मिला। एक 54 वर्षीय्ा डाक्टर और उसका 24 वर्षीय्ा पुत्र्ा जब ब्रिटेन से भारत लौटे तो अपने साथ स्वाइन फ्लू के वाय्ारस लेकर आए। इसी तरह दुबई से आने वाली एक महिला में भी स्वाइन फ्लू के वाय्ारस पाए गए हैं। आश्चयर््ा तब हुआ जब गुडगांव की एक 12 और एक 7 वर्षीय्ा बच्ची में भी इसके वाय्ारस पाए गए। कहना गलत न होगा कि इसके वाय्ारस किसी भी उम्र के लोगों में हो सकता है। अब तक इसके रोगी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, कोच्चि, गुडगांव, पुणे, हैदराबाद जैसे शहरों में पहचाने गए हैं। य्ाह वही शहर है जहां विदेशी जहाज ज्य्ाादा आते हैं। इनमें सबसे ज्य्ाादा केस पुणे में सामने आएं हैं।
अगर केन्द्रिय्ा स्वास्थ्य्ा विभाग के आकडों पर गौर करें तो अब तक भारत में इसके रोगिय्ाों की संख्य्ाा सैकडों में पहुंच चुकी है। जिस तेजी से य्ाह स्कूलों और कालेजों में फैल रहा है उसे देखकर तो य्ाही लगता है कि अगर जल्द ही इस पर काबू न पाय्ाा गय्ाा तो भारत के लिए इस महामारी से निबटना काफी मुश्किल होगा क्य्ाोंकि आजकल भारत की जैसी जलवाय्ाु है उसमें फ्लू के फैलने की संभावना दोगुनी हो जाती। उसपर भारत की विशाल जनसंख्य्ाा भी सोन पे सुहागे का काम करेगी। हालांकि इस बीमारी के वाय्ारस अब भी भारत में नहीं पनपे रहें हैं पर एक व्य्ात्ति€ से दूसरे में बडी ही तेजी से पनप रहे हैं। भले ही य्ाह रोग विदेशी धरती से आय्ाा है पर अगर य्ाह लगातार य्ाूं ही पनपता रहा तो भारत के लिए य्ाह भीषड महामारी का रूप अख्तिय्ाार कर सकती है। इसलिए इससे घबराने की बजाय्ा, जरूरत है जरा सी सावधानी बरतने की य्ाानी इस गंभीर बीमारी से डरने की बजाय्ा इससे बचने के उपाय्ा करना ज्य्ाादा लाजमी है क्य्ाोंकि इलाज से बचाव बेहतर है।


- नीलम शुक्ल देवांगन

1 टिप्पणी:

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

एहतिआत बरतें बस ही जुगाड़ है
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