सोमवार, 29 जून 2009

माओवादियों के चपेट में समलैंगिक


इंसानी जिंदगी के बदलते तौर-तरीकों को वक्त के साथ-साथ समाज और कानून में मान्यता मिल जाती है , लेकिन सेक्सुअल पसंद में आ रहे बदलावों पर कई देशों का कानून और समाज दोनों ही चुप हैं। आखिर क्यूं ? होमोसेक्शुऐलिटी एक ऐसा मुद्दा है , जिसके बारे में बात करना अमूमन पसंद नहीं किया जाता। इंसानी फितरत है कि अगर किसी चीज पर रोक लगाई जाए , तो वह उसके खिलाफ जाने की कोशिश करता है। इसी का नतीजा है कि नेपाल में अक्सर गे और लेस्बियन जोड़ों के घरों से भाग जाने के केस सामने आते हैं। कई बार तो समाज की प्रताडऩा से बचने के लिए वे लोग आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। इसके बावजूद अभी तक सरकार द्वारा इस बारे में कोई पहल सामने नहीं आई है। गत वर्षों में नेपाल नरेश ज्ञानेन्द्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली सरकार और नयी बहुदलीय सरकार की नाराजगी झेलने के बाद अब नेपाल का समलैंगिक समुदाय माओवादियों के हत्थे चढ़ गया है। जब माओवादी सत्ता पर काबिज थे तो उन्होंने समाज को साफ-सुथरा बनाने के नाम पर समलैंगिकों के खिलाफ सख्ती बरतनी शुरू कर दी, जो आज भी बदस्तूर जारी है। सत्ता में आने से पहले भले ही पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के साथ समझौते के बाद जब माओवादियों के लिए बेरोकटोक घूमना आसान हो गया ,वे अपने लिए नयी भूमिका तलाशने लगे । समाज को प्रदूषित करने वालों की खबर लेने लगे। जो पहले जनता की नजरों में अपराधी तो वे अपनी छवि सुधारने की जुगत में समाज को स्वच्छ रखने का ठेका लेने लगे। जब से माओवादियों का सरकार से समझौता हुआ और उन पर से आतंकवादी होने का ठप्पा हटा , उन्होंने समाज के कथित प्रदूषकों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया । उनके इस अभियान की गाज पोर्नोग्राफिक फिल्मों का धंधा करने वालों से लेकर समलैंगिकों सभी पर गिरी है। जब नेपाल नरेश के प्रत्यक्ष शासन के खिलाफ माओवादियों और राजनीतिक पार्टियों ने झंडा बुलंद किया था, तब काठमांडु के समलैंगिकों ने भी इसमें उनका साथ दिया था। तब उन्हें यह भरोसा था कि व्यवस्था बदलने के साथ ही उनके भी दिन फिर जाएंगे, लेकिन सत्ता के करीब आते ही माओवादियों ने उनके खिलाफ अभियान तेज कर दिया है।

हालात इस कदर हो गए कि माओवादियों ने नेपाल के तमाम मकान मालिकों को चेताया दिया कि वे महिला और पुरुष समलैंगिकों को अपने घरों में रहने की इजाजत नहीं दें। जो भी मकान मालिक इन तत्वों को अपना मकान किराए पर देगा, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस नए फरमान के बाद समलैंगिक समुदाय के लोगों ने काठमांडु घाटी में पूर्व माओवादी कमांडर सागर से मुलाकात की और उनसे यह अभियान रोकने की अपील की। बकौल सागर, 'हम समाज के किसी भी वर्ग के खिलाफ नहीं हैं। हम ऐसे लोगों के खिलाफ हैं जो अपनी गलत हरकतों से समाज को प्रदूषित कर रहे हैं।Ó बताया जाता है कि समलैंगिकों के अधिकारों की लड़ाई लडऩे वाले ब्लू डायमंड सोसायटी के अधिकारियों ने पिछले महीने एक वरिष्ठ माओवादी नेता देब गुरुंग से मुलाकात की थी। कहा जाता है कि माओवादी नेता ने इन्हें स्पष्ट बताया कि देश में समलैंगिकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

दूसरी तरफ कुछ ऐसी खबरें भी आ रही है कि माओवादियों में समलैंगिक प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बेशक यह माओवादियों के कमांडरों के लिए चिंता की बात है। नेपाल में समलैंगिकों के लिए काम करने वाली संस्था ब्लू डायमण्ड सोसायटी ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि माओवादी विद्रोहियों में 'होमोसेक्सुअलÓ होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। दूसरी ओर वरिष्ठ माओवादी इसलिए चिंतित हैं कि उन्हें लगता है कि समलैंगिक होना पूंजीवाद की देन है। यह खबरें उस वक्त आनी शुरू हुई जब माओवादियों और सरकार के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था। इसके तहत माओवादियों के हथियार जमा करा लिए गए और उन्हें कई शिविरों में रखा गया जिसकी निगरानी नेपाल सरकार, संयुक्त राष्ट्र और माओवादी साझा तौर पर कर रहे थे।

अमूमन पड़ोसी मुल्क भारत के अधिकत्तर क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम नेपाल को प्रभावित करता रहा है। ऐसे में नेपाली समाज का एक तबका का मानना है कि अभी तक हमारे समाज में इस सेक्सुअल कल्चर को लेकर एक रहस्यमय माहौल रहा है। इस कल्चर में किशोर-किशोरी के बीच संबंध, समलैंगिकता जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन मुद्दों में खुली बाचतीत करने के लिए हमारा समाज कभी तैयार नहीं हुआ। जब भारत में कुछ दिन पूर्व बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा होमोसेक्शुऐलिटी के मुद्दे कहा गया कि वक्त के साथ सामाजिक ढांचे में काफी बदलाव आ गया है , जिससे लोगों की सेक्सुअल पसंद चेंज हो गई है। इसे अननैचरल नहीं माना जाना चाहिए। अब वह वक्त आ गया है , जब करीब एक सेंचुरी पहले बने कानूनों पर दोबारा से विचार किए जाने की जरूरत है। गौरतलब है कि फिलहाल भारत में धारा 377 का उल्लंघन करने पर 10 साल की सजा का प्रावधान है।

दरअसल, नेपाल का समाज रुढि़वादी और धार्मिक है जहां सार्वजनिक तौर पर समलैंगिक पुरुष और महिलाएं नहीं दिखते हैं। समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ब्लू डायमंड सोसाइटी का कहना है कि समलैंगिक होने का आरोप लगा कर लोगों को पीटे जाने की ख़बरें बढ़ रही हैं। हाल ही में मानवाधिकार पर आयोजित कार्यशाला में माओवादी महिला संघ की प्रमुख ने समलैंगिकता को 'अप्राकृतिकÓ और 'समाज में गंदगी फैलाना वालाÓ बताया। एक अन्य माओवादी नेता का कहना था कि समलैंगिकता पूंजीवाद की देन है और यह समाजवादी समाजों में नहीं पाया जाता। नेपाल में कम ही ऐसे नेता हैं जो इस विषय पर बात करते हैं। नेपाल के क़ानून में अप्राकृतिक संबंधों पर पाबंदी है लेकिन इसके दायरे में क्या क्या आता है, इसकी व्याख्या नहीं की गई है। और तो और, माओवादियों का अपना 'लीगल कोडÓ भी इस विषय पर चुप्प है। ऐसे में ब्लू डायमंड सोसाइटी ने मांग की है कि जब अगले साल नेपाल का संविधान बनेगा तब उसमें समलैंगिकों के अधिकारों को भी शामिल करना चाहिए जैसा की दक्षिण अफ्रीका में हुआ है। बेशक, डेनमार्क , फ्रांस , जर्मनी , इटली , रूस और यूनाइटेड किंगडम समेत यूरोप के ज्यादातर देशों में होमोसेक्शुऐलिटी के खिलाफ कोई कानून नहीं है। स्पेन , बेल्जियम , नीदरलैंड , साउथ अफ्रीका , कनाडा और हाल ही में नॉर्वे समेत दुनिया के 6 देश गे मैरिज को मान्यता भी दे चुके हैं। मगर नेपाल के समलैंगिक आज भी अपने वजूद के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

1 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

क्यों जरूरत है, समलैंगिकता की? क्या स्त्री-पुरुष एक दूसरे के लिए इतने असहनीय हो चुके हैं।