सोमवार, 23 दिसंबर 2013

सबको साथ लाएंगे लवली?




विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस में जान फूंकने की जिम्मेदारी अरविंदर सिंह लवली को सौंपी गई है। अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि वह सभी गुटों को एक साथ लाएंगे और आम लोगों को पार्टी से जोड़कर इसे धरातल पर मजबूती प्रदान करेंगे। उन्होंने कहा कि वह खासकर युवाओं और महिलाओं को पार्टी से जोड़ेंगे। दिल्ली कांग्रेस का प्रमुख नियुक्त करने के तुरंत बाद 46 वर्षीय लवली ने कहा कि वह जिम्मेदारी मिलने से खुश हैं और आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी को मजबूत बनाने के एकमात्र उद्देश्य से काम करेंगे। गौर करने योग्य यह भी है कि रामबाबू शर्मा को अपवाद मान लिया जाए, तो पिछले डेढ़ दशक में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष की भूमिका लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बाद ही शुरू होती थी। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए पूर्व मंत्री व पार्टी विधायक अरविंदर सिंह लवली के पास खुलकर खेलने का पूरा मौका है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लवली पर जिस तरह से पार्टी आलाकमान ने भरोसा जिताया है, उस पर वह खरा उतर पाएंगे?
दरअसल, अरविंदर सिंह लवली को दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष जे.पी.अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यह जिम्मेदारी दी गई है। अरविंदर सिंह लवली 1990 में वह दिल्ली प्रदेश यूथ कांग्रेस के महासचिव चुने गए। बाद में उन्हें एनएसयूआई का महासचिव बना दिया। 1996 तक वह इस पद पर रहे। 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर वह सबसे कम उम्र के विधायक बने। सन 2000 में उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया। 2003 में वह मंत्री बने। वह गांधीनगर विधानसभा से जीतते रहे हैं। सूबे के पुराने कांग्रेसियों का मानना है कि लवली ताकतवर प्रदेश अध्यक्ष साबित होंगे। एक तो उनके काम करने की शैली आक्रामक है, दूसरी बात यह है कि उन पर कोई दबाव नहीं होगा। उनका कहना है कि साढ़े छह साल तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे जयप्रकाश अग्रवाल के संबंध शुरुआती दिनों में शीला दीक्षित से ठीक-ठाक थे, लेकिन बाद में दोनों के बीच तल्खी बढ़ी, जिसका असर संगठन व सरकार के संबंधों पर दिखा। पार्टी नेताओं का कहना है कि स्वर्गीय रामबाबू शर्मा वर्ष 2006 में जब प्रदेश अध्यक्ष बने, तब भी दीक्षित व शर्मा के बीच बेहद तीखे संबंध रहे। लेकिन बड़ी बात यह थी कि पार्टी लगातार चुनावी जीत दर्ज कर रही थी और दीक्षित पार्टी का चेहरा बनी हुई थीं। राजधानी में कांग्रेस का असली चेहरा उन्हें ही माना जाता रहा है, लेकिन इस हार ने समीकरणों को बहुत हद तक बदल दिया है।
अध्यक्ष बनने के बाद अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि दीक्षित व अग्रवाल सहित सभी बड़े नेताओं के आशीर्वाद से ही वह पार्टी के संगठन को मजबूत करने का काम करेंगे। हालांकि, यह सबको पता है कि यदि क कांग्रेस को आगे आने वाले चुनावों में मजबूती देनी है, तो यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से लवली को ही निभानी है। लवली का कहना है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता से झूठे वायदे किए हैं और उसके झूठ की पोल खोलने के लिए हमने 'आप' को समर्थन दिया है। आम आदमी पार्टी सरकार बनाए या न बनाए, इस मुद्दे पर एसएमएस, आॅनलाइन और घर-घर जाकर सर्वे करा रही है। आप के इस सर्वे पर भी लवली सवाल उठाने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि किसे पता है, एसएमएस में क्या जवाब आ रहे हैं? लवली ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी पर सियासी हमले तेज किए हैं, उससे साफ है कि कांग्रेस के वोट बैंक पर कब्जा जमा लेने वाली पार्टी उनके निशाने पर रहेगी। आप नेता कुमार विश्वास ने कहा कि कांग्रेस एक धोखेबाज पार्टी है। उनका आशय यह था कि कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक की सरकारों को पहले समर्थन दिया और फिर बाद में समर्थन वापस लेकर उनकी सरकारें गिरा दीं।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मिली हार में आम आदमी पार्टी (आप) की भूमिका बहुत बड़ी है। दूसरी भूमिका गुटबाजी की थी। टिकट बंटवारे में पूरी तरह अराजकता थी। यह चुनाव नतीजों से भी साफ पता चलता है। जिन डेढ़ दर्जन विधायकों के टिकट काटने की मांग हो रही थी, उनमें से ज्यादातर को 25 फीसद से कम वोट मिले हैं। इतना ही नहीं गैर विधायक वाली सीट पर जहां मनमानी से टिकट बांटे गए उनमें ज्यादातर को तो 20 फीसद से कम वोट मिले हैं। ऐसी सीटों के कांग्रेस कार्यकत्तार्ओं को फिर से संगठित करना नए प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली के लिए आसान न होगा। काफी समय से कांग्रेस में कार्यकर्ता बनाने का काम हुआ ही नहीं। पहले दिन से पार्टी में आने वाले नेता चुनाव लड़ने की जुगत में लग जाते हैं। बताते हैं कि जो नए विधायक और नेता चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में आए थे उनको टिकट देने की मनाही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से हुई थी बावजूद इसके उनको पार्टी में लाने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से हस्तक्षेप करवाकर टिकट दिलवाया। उनमें ज्यादातर चुनाव हार गए क्योंकि कांग्रेस के ही दूसरे दावेदारों के समर्थक उन्हें हरवाने में लग गए। इस तरह के कई नेता तो मतदान के दिन खुलेआम जीतने वाली आप के उम्मीदवारों को वोट दिलवाते दिखे। कांग्रेस को सबसे कम वोट नजफगढ़ सीट पर महज 7.05 फीसद मिला। यह वह सीट है जहां एक बार कांग्रेस का विधायक जीता था और हर वार कांग्रेस मुख्य मुकाबले में रहती थी। इसी तरह विधायकों वाली सीट में सबसे कम वोट नरेला में 18.77 मिला।  18 उन सीटों पर कांग्रेस को 20 से 25 फीसद के बीच वोट मिले हैं, इनमें से ज्यादातर पिछली बार कांग्रेस के पास थीं और कांग्रेस नेतृत्व पर उम्मीदवार बदलने का दबाव ज्यादा था और दिल्ली कांग्रेस की चुनाव समिति की बैठक में भी उन्हें बदलने की मांग उठाई गई थी। लेकिन सभी विधायकों को फिर से टिकट देने की जिद में वे सारे विधायक टिकट पा गए। उनमें ज्यादातर चुनाव हार गए। इन सीटों में भी भाजपा के प्रभाव वाली ग्रेटर कैलाश, शकूर बस्ती, कृष्णा नगर, तिलक नगर, द्वारका, हरि नगर भी हैं। लेकिन महरौली, त्रिनगर, वजीरपुर, माडल टाउन, कोंडली, पटपड़गंज, पटेल नगर, राजेंद्र नगर, राम कृष्ण पुरम, आंबेडकर नगर, बदरपुर और देवली में कांग्रेस के विधायक थे। आप का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्गीय कॉलोनियों और गरीब बस्तियों में हुआ। यह पहला चुनाव है कि कांग्रेस को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 में से केवल एक सीट ही मिल पाई और कभी भी चुनाव न हारने का रिकार्ड बनाने वाले चौधरी प्रेम सिंह और दिल्ली सरकार के मंत्री राज कुमार चौहान चुनाव हार गए। इन नतीजों से अगर कांग्रेस ने सबक न लिया और हवा में उड़ने और केवल पैसे और समीकरण के बूते चुनाव जीतने का भ्रम पाले रखा तो आगे और सफाया भी हो सकता है क्योंकि माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकों को इसका अंदाजा न था कि आप भाजपा को पराजित कर सकती है। चुनाव नतीजों से तो यह भी जानकारी मिली कि ह्यआपह्ण के चुनाव चिन्ह झाडू से मिलते जुलते टार्च के निशान पर कई सीटों पर काफी वोट आने से आप की सीटें कम रह गईं।

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