सोमवार, 23 दिसंबर 2013

सबको साथ लाएंगे लवली?




विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस में जान फूंकने की जिम्मेदारी अरविंदर सिंह लवली को सौंपी गई है। अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि वह सभी गुटों को एक साथ लाएंगे और आम लोगों को पार्टी से जोड़कर इसे धरातल पर मजबूती प्रदान करेंगे। उन्होंने कहा कि वह खासकर युवाओं और महिलाओं को पार्टी से जोड़ेंगे। दिल्ली कांग्रेस का प्रमुख नियुक्त करने के तुरंत बाद 46 वर्षीय लवली ने कहा कि वह जिम्मेदारी मिलने से खुश हैं और आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी को मजबूत बनाने के एकमात्र उद्देश्य से काम करेंगे। गौर करने योग्य यह भी है कि रामबाबू शर्मा को अपवाद मान लिया जाए, तो पिछले डेढ़ दशक में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष की भूमिका लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बाद ही शुरू होती थी। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के बाद प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए पूर्व मंत्री व पार्टी विधायक अरविंदर सिंह लवली के पास खुलकर खेलने का पूरा मौका है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लवली पर जिस तरह से पार्टी आलाकमान ने भरोसा जिताया है, उस पर वह खरा उतर पाएंगे?
दरअसल, अरविंदर सिंह लवली को दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष जे.पी.अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यह जिम्मेदारी दी गई है। अरविंदर सिंह लवली 1990 में वह दिल्ली प्रदेश यूथ कांग्रेस के महासचिव चुने गए। बाद में उन्हें एनएसयूआई का महासचिव बना दिया। 1996 तक वह इस पद पर रहे। 1998 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर वह सबसे कम उम्र के विधायक बने। सन 2000 में उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाया गया। 2003 में वह मंत्री बने। वह गांधीनगर विधानसभा से जीतते रहे हैं। सूबे के पुराने कांग्रेसियों का मानना है कि लवली ताकतवर प्रदेश अध्यक्ष साबित होंगे। एक तो उनके काम करने की शैली आक्रामक है, दूसरी बात यह है कि उन पर कोई दबाव नहीं होगा। उनका कहना है कि साढ़े छह साल तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे जयप्रकाश अग्रवाल के संबंध शुरुआती दिनों में शीला दीक्षित से ठीक-ठाक थे, लेकिन बाद में दोनों के बीच तल्खी बढ़ी, जिसका असर संगठन व सरकार के संबंधों पर दिखा। पार्टी नेताओं का कहना है कि स्वर्गीय रामबाबू शर्मा वर्ष 2006 में जब प्रदेश अध्यक्ष बने, तब भी दीक्षित व शर्मा के बीच बेहद तीखे संबंध रहे। लेकिन बड़ी बात यह थी कि पार्टी लगातार चुनावी जीत दर्ज कर रही थी और दीक्षित पार्टी का चेहरा बनी हुई थीं। राजधानी में कांग्रेस का असली चेहरा उन्हें ही माना जाता रहा है, लेकिन इस हार ने समीकरणों को बहुत हद तक बदल दिया है।
अध्यक्ष बनने के बाद अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि दीक्षित व अग्रवाल सहित सभी बड़े नेताओं के आशीर्वाद से ही वह पार्टी के संगठन को मजबूत करने का काम करेंगे। हालांकि, यह सबको पता है कि यदि क कांग्रेस को आगे आने वाले चुनावों में मजबूती देनी है, तो यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से लवली को ही निभानी है। लवली का कहना है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता से झूठे वायदे किए हैं और उसके झूठ की पोल खोलने के लिए हमने 'आप' को समर्थन दिया है। आम आदमी पार्टी सरकार बनाए या न बनाए, इस मुद्दे पर एसएमएस, आॅनलाइन और घर-घर जाकर सर्वे करा रही है। आप के इस सर्वे पर भी लवली सवाल उठाने से नहीं चूके। उन्होंने कहा कि किसे पता है, एसएमएस में क्या जवाब आ रहे हैं? लवली ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी पर सियासी हमले तेज किए हैं, उससे साफ है कि कांग्रेस के वोट बैंक पर कब्जा जमा लेने वाली पार्टी उनके निशाने पर रहेगी। आप नेता कुमार विश्वास ने कहा कि कांग्रेस एक धोखेबाज पार्टी है। उनका आशय यह था कि कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक की सरकारों को पहले समर्थन दिया और फिर बाद में समर्थन वापस लेकर उनकी सरकारें गिरा दीं।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मिली हार में आम आदमी पार्टी (आप) की भूमिका बहुत बड़ी है। दूसरी भूमिका गुटबाजी की थी। टिकट बंटवारे में पूरी तरह अराजकता थी। यह चुनाव नतीजों से भी साफ पता चलता है। जिन डेढ़ दर्जन विधायकों के टिकट काटने की मांग हो रही थी, उनमें से ज्यादातर को 25 फीसद से कम वोट मिले हैं। इतना ही नहीं गैर विधायक वाली सीट पर जहां मनमानी से टिकट बांटे गए उनमें ज्यादातर को तो 20 फीसद से कम वोट मिले हैं। ऐसी सीटों के कांग्रेस कार्यकत्तार्ओं को फिर से संगठित करना नए प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली के लिए आसान न होगा। काफी समय से कांग्रेस में कार्यकर्ता बनाने का काम हुआ ही नहीं। पहले दिन से पार्टी में आने वाले नेता चुनाव लड़ने की जुगत में लग जाते हैं। बताते हैं कि जो नए विधायक और नेता चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में आए थे उनको टिकट देने की मनाही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की ओर से हुई थी बावजूद इसके उनको पार्टी में लाने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से हस्तक्षेप करवाकर टिकट दिलवाया। उनमें ज्यादातर चुनाव हार गए क्योंकि कांग्रेस के ही दूसरे दावेदारों के समर्थक उन्हें हरवाने में लग गए। इस तरह के कई नेता तो मतदान के दिन खुलेआम जीतने वाली आप के उम्मीदवारों को वोट दिलवाते दिखे। कांग्रेस को सबसे कम वोट नजफगढ़ सीट पर महज 7.05 फीसद मिला। यह वह सीट है जहां एक बार कांग्रेस का विधायक जीता था और हर वार कांग्रेस मुख्य मुकाबले में रहती थी। इसी तरह विधायकों वाली सीट में सबसे कम वोट नरेला में 18.77 मिला।  18 उन सीटों पर कांग्रेस को 20 से 25 फीसद के बीच वोट मिले हैं, इनमें से ज्यादातर पिछली बार कांग्रेस के पास थीं और कांग्रेस नेतृत्व पर उम्मीदवार बदलने का दबाव ज्यादा था और दिल्ली कांग्रेस की चुनाव समिति की बैठक में भी उन्हें बदलने की मांग उठाई गई थी। लेकिन सभी विधायकों को फिर से टिकट देने की जिद में वे सारे विधायक टिकट पा गए। उनमें ज्यादातर चुनाव हार गए। इन सीटों में भी भाजपा के प्रभाव वाली ग्रेटर कैलाश, शकूर बस्ती, कृष्णा नगर, तिलक नगर, द्वारका, हरि नगर भी हैं। लेकिन महरौली, त्रिनगर, वजीरपुर, माडल टाउन, कोंडली, पटपड़गंज, पटेल नगर, राजेंद्र नगर, राम कृष्ण पुरम, आंबेडकर नगर, बदरपुर और देवली में कांग्रेस के विधायक थे। आप का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्गीय कॉलोनियों और गरीब बस्तियों में हुआ। यह पहला चुनाव है कि कांग्रेस को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 12 में से केवल एक सीट ही मिल पाई और कभी भी चुनाव न हारने का रिकार्ड बनाने वाले चौधरी प्रेम सिंह और दिल्ली सरकार के मंत्री राज कुमार चौहान चुनाव हार गए। इन नतीजों से अगर कांग्रेस ने सबक न लिया और हवा में उड़ने और केवल पैसे और समीकरण के बूते चुनाव जीतने का भ्रम पाले रखा तो आगे और सफाया भी हो सकता है क्योंकि माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकों को इसका अंदाजा न था कि आप भाजपा को पराजित कर सकती है। चुनाव नतीजों से तो यह भी जानकारी मिली कि ह्यआपह्ण के चुनाव चिन्ह झाडू से मिलते जुलते टार्च के निशान पर कई सीटों पर काफी वोट आने से आप की सीटें कम रह गईं।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

क्यों बताई आडवाणी की अहमियत?


यदि यह कहा जाए कि भारतीय जनता पार्टी और लालकृष्ण आडवाणी एक-दूसरे के अनुपूरक हैं, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भले ही पार्टी के सबसे सदार चेहरा के रूप में सर्वविदित हों, लेकिन वह आडवाणी की मेहनत रही कि भाजपा ने केंद्र में सत्तारोहण किया। लोकतांत्रिक राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। न तो भाव और न ही सिद्धांत। इस लिहाजा से यह कहा जाए कि भाजपा ने कभी आडवाणी को हाशिए पर लाने की पुरजोर कोशिश की और फिर अचानक से संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सरेआम सबको भाजपा के ‘महारथी’ लालकृष्ण आडवाणी की अहमियत बताई, तो यह अनायास नहीं है। जो लोग भाजपा में आडवाणी को बीते जमाने की बात मान चुके हैं, उन्हें कहीं दोबारा ना सोचना पड़ा। 17 दिसंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक के प्रमुख मोहन भागवत ने कुछ ऐसे ही संकेत दिए।
दरअसल, देश की  राजधानी नई दिल्ली में मौका था लालकृष्ण आडवाणी की तीन पुस्तकों के विमोचन का। भागवत बोलने के लिए खड़े हुए, तो आडवाणी की जिंदगी और सोच पर तो रोशनी डाली ही, आडवाणी को पार्टी में ही रहकर काम जारी रखने की नसीहत दे डाली।  उन्होंने आडवाणी को सलाह दी कि वे पार्टी से खुद को दूर न करें, वरना पार्टी बर्बाद हो सकती है। भागवत ने यह बात आडवाणी को एक कहानी के जरिए समझाई। वे नई दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी की किताब दृष्टिकोण के विमोचन के मौके पर समारोह को संबोधित कर रहे थे। मोहन भागवत ने इस अवसर पर एक कहानी सुनाई, जिसके मुताबिक एक गांव में एक महिला गलती से हवन कुंड में थूक देती है, लेकिन हवन कुंड की पवित्रता उसके थूक को सोने में तब्दील कर देती है। महिला का पति उस महिला को ये बात किसी को न बताने की नसीहत देता है, लेकिन महिला ये बात सहेलियों को बता देती है और पूरे गांव में यह बात फैल जाती है। धीरे-धीरे उस गांव में सारे लोग अमीर होते जाते हैं, लेकिन महिला और उसक पति गरीब ही रहते हैं। उन्हें ताने मिलते हैं, जिससे परेशान होकर दोनों गांव छोड़ देते हैं, लेकिन जैसे ही वे गांव से बाहर निकलते हैं, गांव में आग लग जाती है। तब महिला का पति उससे कहता है कि पूरे गांव के हर परिवार में पाप होता था (हवनकुंड में थूकने का) और सबको सोना मिलता था। लेकिन हमारी वजह से गांव बचा हुआ था, क्योंकि हम यह नहीं करते थे। हमारे बाहर निकलते ही गांव बर्बाद हो गया। भागवत ने इसके बाद आडवाणी की ओर मुखातिब होकर कहा कि आडवाणी जी राजनीति में हैं। कैसे रहना...वहां रहना और उन्हीं लोगों में रहना ताकि गांव को आग न लगे। भागवत ने अंत में यह भी कहा कि जो भी आपको जीवन में मिलेगा, उसका हमेशा खुशी भरा मतलब खोजना चाहिए।
सियासी हलकों में बीते कुछ समय से कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने पर लालकृष्ण आडवाणी नाराज हैं और वे कई बार इसे खुलकर जाहिर भी कर चुके हैं। कहा गया कि भाजपा में समय-समय पर युग परिवर्तन होते रहे हैं। एक था अटल युग, फिर आया आडवाणी युग और अब नमो (नरेंद्र मोदी) युग। अटल युग को अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्थक किया और देश के प्रधानमंत्री बने। उनके प्रधानमंत्री बनने में किसकी क्या भूमिका रही यह एक अलग बहस का विषय है। एनडीए की सरकार 2004 में सत्ता से बाहर हुई और इसके साथ ही अटल युग खात्म हो गया। फिर आया आडवाणी युग। 2009 का आम चुनाव आडवाणी के नेतृत्व में लड़ा गया। भाजपा की तरफ से आडवाणी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनाए गए थे, लेकिन किस्मत ने आडवाणी का साथ नहीं दिया और भाजपा नीत एनडीए सत्ता के जादुई आंकड़े को नहीं छू सकी। फिर भी पार्टी में आडवाणी की अहमियत बनी रही और उनकी अंतिम इच्छा यही थी कि भाजपा 2014 का चुनाव भी उनकी लीडरशिप में लड़े। लेकिन यह हो न सका। इसमें भी दो राय नहीं कि जब-जब नरेंद्र मोदी के ऊपर संकट के बादल गहराए, आडवाणी ने उनकी नैय्या पार लगाई। लेकिन आज उसी नरेंद्र मोदी ने उनके प्रभुत्व को चुनौती दे दी और आडवाणी के पीएम इन वेटिंग की कुर्सी को हथिया लिया। उसके बाद तमाम मंचों से कहा जाने लगा कि भाजपा में आडवाणी युग खत्म हो गया और मोदी युग का शुभारंभ। यहां यह भी याद रखना होगा कि वर्ष 2005 में दिए अपने एक साक्षात्कार में संघ प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने वृद्ध हो चले अटल और आडवाणी से मुक्त भाजपा की बात की थी, जिसके लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी।
गौर करने योग्य यह भी है कि भाजपा में संघ के आशीर्वाद से हुई मोदी की ‘ताजपोशी’ के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर आडवाणी ने दिल्ली में संघ प्रमुख से भी मुलाकात की थी। उस समय मोहन भागवत से न उन्हें कोई आश्वासन मिला, न संघ की तरफ से भाजपा के मामलों को देख रहे प्रचारकों को बदलने की उनकी बात मानी गई। इसके निहितार्थ के रूप में कहा जाने लगा कि भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की सियासत पर कई दशकों से हावी रही वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी अब अतीत के विवरण तक सिमट जाएगी। स्वास्थ्य के चलते वाजपेयी तो पहले से ही रिटायर्ड हैं, अब आडवाणी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएंगे, भले वह पूरी तरह स्वस्थ हों। इसमें दो राय नहीं कि मोदी को आधिकारिक चेहरा बनाते वक्त संघ के शीर्षस्थ नेतृत्व ने किसी भी किस्म की असहमति न झेलने की उनकी प्रवृत्ति- जिसके चलते गुजरात में संघ-भाजपा के तमाम वरिष्ठ लोग हाशिये पर चले गए, जैसे तमाम पहलुओं पर सोचा होगा। उन्हें इस बात का भी गुुमान रहा होगा कि मोदी के चलते राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पुराने साथी छिटक सकते हैं और नए साथियों के जुड़ने में दिक्कत आ सकती है।
सच तो यह भी है कि अगर कांग्रेस में प्रधानमंत्री बनने के लिए सोनिया गांधी का आशीर्वाद चाहिए, तो भाजपा में संघ परिवार का। संघ परिवार आडवाणी को त्याग चुका है। आडवाणी इस बात को भूल गए कि अटल बिहारी वाजपेयी में तमाम गुणों के साथ एक गुण और था। यह गुण उन्हें उतर भारत से लेकर मध्य भारत और पूर्व भारत तक मजबूत करता था। ये गुण उन्हें जन्मजात मिला था। वह ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। इस जाति की मजबूती आडवाणी जी अभी तक महसूस नहीं कर पा रहे हैं। अगर इस जाति की अहमियत को वे अभी भी समझना चाहते है तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के ब्राहमण सम्मेलनों को गौर से देखे, लेकिन आडवाणी के साथ  ब्राहमण तो क्या होंगे उनके अपने ही नहीं है। आज अडानी से लेकर अंबानी तक नरेंद्र मोदी के साथ हो गए है। आडवाणी भाजपा संस्कृति में पले बढ़े जरूर है। लेकिन वे वो नेता है जो सत्ता प्राप्त करने के लिए हर तरह के खेल करते है। अगर उन्होंने सत्ता प्राप्त करने के लिए रथयात्रा का नेतृत्व किया तो भारत विभाजन के जिम्मेदार मोह्ममद अली जिन्ना को सेक्यूलर भी बता दिया। यानि की सत्ता प्राप्त करने के लिए आडवाणी ने हर खेल को खेला। इसके बावजूद उन्हें पीएम की कुर्सी नहीं मिली। 2009 में एक बार पार्टी ने उन्हें दाव पर लगाया लेकिन पार्टी पहले से भी ज्यादा नुकसान में रही। सीटें कम हो गई। यानि की जनता के बीच उनकी लोकप्रियता वो नहीं थी जो  अटल बिहारी वाजपेयी की थी
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसी मोहन भागवत को सार्वजनिक रूप से लालकृष्ण आडवाणी की अहमियत बताने की जरूरत आन पड़ी? सच तो यही है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी को तो भाजपा नेताओं ने मना जरूर लिया, लेकिन भाजपा से आडवाणी भी भाजपा से और राजनीति से दूरी की बात करने लगे। संघ आज भी भाजपा के लौह पुरुष की अहमियत को समझता है।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

हम देश को बंटने नहीं देंगे



रांची की जेल से जमानत पर रिहा हुए राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव ने बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि हम देश को बंटने नहीं देंगे। सत्ता में आने की कोशिश कर रही सांप्रदायिक ताकतों को हम सत्ता से दूर रखेंगे। रांची के बिरसा मुंडा जेल से लालू यादव जमानत पर रिहा हो गए। रिहा होने के बाद लालू यादव ने कहा कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था। ऐसा नहीं है कि आज हमारा बेल हुआ है, इसलिए मैं ऐसा कह रहा हूं बल्कि शुरू से ही मुझे और मेरे परिवार को न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा था।
चारा घोटाला मामले में 5 साल की सजा मिलने के बाद वो यहां बंद थे। गौरतलब है कि 30 सितंबर को विशेष सीबीआई अदालत ने लालू को दोषी करार दिया था। लालू को चारा घोटाले के चार दूसरे मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने 13 दिसंबर को लालू प्रसाद को चारा घोटाला मामले में राहत देते हुए जमानत पर छोड़ने का आदेश दिया था। अदालत ने हालांकि छह वर्षो तक उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया है। चारा घोटाला के इस मामले के 44 आरोपियों में से 37 को पहले ही जमानत मिल चुकी है और छह अन्य की अर्जी निचली अदालत में विचाराधीन है।  लालू प्रसाद को रांची स्थित केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अदालत ने चारा घोटाला मामले में पांच वर्ष कैद की सजा सुनाई है। उन पर 25 लाख रुपये का जुर्माना भी किया गया है। निचली अदालत ने उनके अलावा बिहार के एक और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और 42 अन्य को चाइबासा कोषागार से 37.7 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के मामले में सजा दी है। यह मामला अविभाजित बिहार का है और निकासी मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में की गई थी।
तमाम विवाद और आरोप के बीच आरजेडी प्रमुख लालू यादव इस देश का वो चेहरा भी हैं जो सालों पुरानी व्यवस्था को कुचलकर आगे बढ़ता है। जो हमारे देश के ताकतवर सिस्टम को आंखें दिखाकर आगे बढ़ा। गोपालगंज के बेहद ही गरीब परिवार में पैदा हुए लालू सिर्फ अपने दम पर बिहार के मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के रेल मंत्री भी बने।
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव राजनीति में एक ऐसा नाम जिसे कुछ सियासत का मसखरा कहते हैं। लेकिन बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो उन्हें गरीबों का नेता मानता है। भोली सूरत, आंखों में दुश्मनों को धूल चटाने की जजबा, जुबान ऐसी कि विरोधी कि बोलती बंद हो जाए। लेकिन अब हो सकता है कि बिहार ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति से भी एक बड़ा चेहरा शायद हमेशा के लिए पर्दे के पीछे चला जाए।
गोपालगंज जिले के फुलवरियां गांव में 11 जून 1948 को पैदा हुए लालू ने राजनीति की शुरुआत पटना के बीएन कॉलेज से की थी। तब लालू 1970 में पटना यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन के महासचिव चुने गए थे। इसके बाद छात्र आंदोलन के दौरान लालू की सियासत में दिलचस्पी और बढ़ती गई। माहौल को भांपने में माहिर लालू ने राम मनोहर लोहिया और इमरजेंसी के नायक जय प्रकाश नारायण का समर्थक बनकर पिछड़ी जातियों में अपनी छवि बनानी शुरू कर दी। नतीजा ये कि महज 29 साल की उम्र में 1977 में वो पहली बार संसद पहुंच गए। अपनी जन सभाओं में लालू 1974 की संपुर्ण क्रांति का नारा दोहराते रहे। लोगों को सपने दिखाते रहे। जनता की नब्ज पकड़ते हुए लालू ने 90 के दशक में मंडल कमीशन की लहर पर सवार होकर बिहार की सत्ता पर कब्जा कर लिया।
सुरेंद्र किशोर (पत्रकार) का कहना है कि बिहार में लालू यादव को जितना समर्थन मिला था शायद उतना समर्थन राजनीति में अभी तक किसी को नही मिला होगा ना मिलेगा। राजनीतिक विशलेष्क शैवाल गुप्ता ने बताया कि लालू को उस वक्त अति पिछड़े और बाकी लोगों का काफी वोट मिला था।
लेकिन सत्ता में रहते हुए लालू अपने मकसद से भटक गए। पहले से ही पिछड़ा बिहार अब और बर्बाद होने लगा। घोटाले, अपराध लालू की सरकार का दूसरा नाम बन गए। 1997 में लालू यादव पर चारा घोटाले का आरोप लगा। साल 2000 में आय से ज्यादा संपत्ति का आरोप लगा। इन आरोपों के बीच जब लालू ने जेल जाते वक्त सत्ता राबड़ी को सौंपी तो भी कई सवाल उठे। लेकिन लालू ने कभी उसकी परवाह नहीं की। राज्य में विकास पर ब्रेक लगा और तरक्की सिर्फ लूट, हत्या के मामलों में अपहरण उद्योग की हुई। नतीजा ये कि 2005 में बिहार की जनता ने लालू को सत्ता से बाहर कर दिया। हालांकि इस बीच 2004 से 2009 तक लालू ने रेल मंत्रालय की कमान संभाली। विदेश तक में नाम कमाया। लेकिन अब उनका करिश्मा फीका पड़ता जा रहा है।

राहुल के नाम पर मुहर?

पांच राज्यों में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में करारी हार से सदमे में आई कांग्रेस अब पीएम उम्मीदवार के नाम पर और ज्यादा सस्पेंस नहीं बनाना चाहती और जल्दी से जल्दी पार्टी कैंडिडेट का नाम सामने लाना चाहती है। क्या मिशन 2014 में कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी पीएम कैंडिडेट होंगे? सवाल इसलिए क्योंकि अगले साल जनवरी में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की एक अहम बैठक होने जा रही है और ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद कांग्रेस के पीएम प्रत्याशी की तस्वीर साफ हो जाएगी। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के ज्यादातर नेता राहुल गांधी के नाम पर एकमत हैं और वे चाहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके राहुल गांधी का नाम आगे कर देना चाहिए। अगले साल 17 जनवरी को बैठक होने वाली है और उम्मीद जताई जा रही है कि बैठक में राहुल के नाम पर मुहर लगा दी जाएगी।
एआईसीसी का कामकाज देखने वाले महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने आज बताया कि यह बैठक दिल्ली में होगी। एक साल पहले ‘गुलाबी नगरी’ जयपुर में हुई एआईसीसी की बैठक में राहुल गांधी को कांग्रेस उपाध्यक्ष बनाया गया था। चार राज्यों में पार्टी की शर्मनाक पराजय के बाद देश भर के कांग्रेस के पदाधिकारी पहली बार 17 जनवरी को एक जगह जमा होंगे। पार्टी के अंदर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मांग भी जोर पकड़ चुकी है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि इस जयपुर में हुई बैठक की तर्ज पर ही इस बैठक में राहुल को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए। यह बैठक ऐसे समय में बुलायी जा रही है जब कांग्रेस को नरेन्द्र मोदी के उभार और संप्रग के सिकुड़ने से उपजे हालात का सामना करना पड़ रहा है। एआईसीसी की पिछली बैठक चिंतन शिविर के साथ इस साल जनवरी में जयपुर में हुई थी जिसमें राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था। एआईसीसी की बैठक की घोषणा ऐसे समय में की गई है जब एक ही दिन पहले द्रमुक के नेता एम करूणानिधि ने अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करने का ऐलान किया है। द्रमुक ने कुछ ही महीने पहले कांग्रेस नेतृत्व वाले संप्रग गठबंधन से नाता तोड़ा था। संप्रग गठबंधन के दूसरे सबसे बड़े घटक तृणमूल कांग्रेस ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे पर पिछले साल ही गठबंधन को अलविदा कह दिया था। इसके अलावा बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाला झारखंड विकास मोर्चा और एआईएमआईएम भी संप्रग से अलग हो चुका है। दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनवों में मिली भारी पराजय के बाद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इन चुनाव परिणामों पर गहरे आत्ममंथन किये जाने की बात की थी।
क्या मिशन 2014 में नरेन्द्र मोदी का मुकाबला राहुल गांधी से होगा। कयास तो ऐसे ही लग रहे हैं कि अगले आम चुनाव में मोदी की टक्कर राहुल से होगी। बीजेपी काफी पहले ही मोदी को अपना पीएम कैंडिडेट घोषित कर चुकी है लेकिन कांग्रेस ने इस बाबत अभी तक अपना पत्ता नहीं खोला है। हालांकि शुरू से ही ये कयास लग रहे थे कि कांग्रेस की ओर से ये जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंपी जा सकती है लेकिन अब बात काफी जोर शोर से उठने लगी है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के भीतर इस बात का दबाव बढ़ता जा रही है कि राहुल को ही पार्टी की ओर से पीएम पद का प्रत्याशी घोषित किया जाए। कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी के नाम पर चर्चा जोर पकड़ती जा रही है लेकिन फिलहाल पार्टी के नेता इस बारे में साफ साफ कुछ भी कहने से बच रहे हैं। उधऱ कांग्रेस नेता विरेन्द्र सिंह ने संकेत दिए हैं कि 17 जनवरी को पीएम पद के उम्मीदवार के लिए राहुल  गांधी के नाम का एलान किया जा सकता है।

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

सभ्यता का सबसे बड़ा धोखा

भारत जैसे देश में एड्स की बीमारी का बड़ा कारण है झिझक, जबकि इस बीमारी से बचने का सबसे आसान रास्ता है एहतियात। यहां तो लोग कंडोम खरीदने में भी शर्म महसूस करते हैं। अभी तक इस बीमारी का कोई प्रामाणिक इलाज सामने नहीं आया है, ऐसे में यह जरूरी है कि लोग सावधानी बरतें... 

20वीं सदी के अंतिम दशक को प्रसिद्घ इतिहासकार एरिक हाब्सबाम ने विश्वव्यापी संकट का दशक कहा था। इस दशक में मानव-समाज के सामने जो संकट आए, उनमें से एक एड्स के दुनिया-भर में फैलने की भयावह आशंका और चिंता का संकट ही था। जैसे इस दशक के अन्य अनेक संकटों का जनक अमेरिका रहा है, वैसे ही एड्स की खतरनाक खबर भी अमेरिका ही में पैदा हुई और फिर सारी दुनिया में फै लाई गई। इतिहास के पन्नों को टटोला जाए, तो पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशकों में अमेरिकी समाज में युवा समुदाय नशीले पदार्थों के सेवन और अनेक प्रकार के मुक्त यौन-व्यवहारों का शिकार था, जिसके परिणामस्वरूप वहां अनेक प्रकार की बीमारियां फै ल रही थीं, उससे अमेरिकी समाज और सरकार में गहरी चिंता पैदा हुई, लेकिन अमेरिकी समाज यह कैसे स्वीकार करता कि यह एक बीमार समाज है और उस समाज में फैलने वाली बीमारी की दवा की खोज किसी अन्य देश के वैज्ञानिक करें। सो, आनन-फानन में अमेरिका ने डॉक्टर गैलो नाम के एक वैज्ञानिक के  झूठे दावे के आधार पर एडस नामक की बीमारी और उसकी खोज का दावा किया और फिर बड़े पैमाने पर सारी दुनिया में उसका प्रचार-प्रसार हुआ। यह कहने की जरूरत नहीं कि अमेरिकी मानसिकता तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों और समाजों को असभ्य, गंदा और बीमार मानती है। एड्स संबंधी अमेरिकी प्रचार-प्रसार के पीछे भी वही मानसिकता दिखाई पड़ती है, साथ ही इसका हौआ खड़ा करके कंडोम के लिए एक विस्तृत बाजार बनाने की साजिश भी?
हाल के दिनों में जिस प्रकार से भारत-अमेरिकी संबंधों में गर्माहट आई है और अमेरिका भारत की ओर दोस्ताना हाथ बढ़ा रहे हैं, उसके पीछे उनकी नजर में भारत का व्यापक बाजार है। तभी तो वह भारत को एड्स से ग्रस्त समाज साबित करके एक हाथ से आर्थिक अनुदान देकर स्वयं को उदार और मानवीय सिद्घ करने का प्रयत्न कर रहा है, तो दूसरे हाथ से अमेरिकी दवाइयों क ी बिक्री के माध्यम से भारत के गरीबों को लूटने की कोशिश भी कर रहा है। एड्स के बारे में अमेरिकी प्रचार की मानें, तो यह जाहिर होता है कि दुनिया में जो गरीब है और पिछड़ेपन तथा बदहाली के शिकार हैं, वे ही एड्स के कारण भी हैं। भारत में एड्स की खोज करने वालों ने सबसे पहले मणिपुर राज्य को बड़े पैमाने पर एड्स-ग्रस्त माना था। एड्स की खोज करने वालों की नजर सबसे अधिक आदिवासी समुदायों पर है। मध्य प्रदेश के मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बंछारा और बोदिया आदिवासी समुदाय की सभी लड़कियां वेश्यावृत्ति में लगी रहती हैं, इसीलिए वे एड्स के लिए अति संवेदनशील हैं।
हालांकि इस सबके पीछे कहीं न कहीं अमेरिकी नीति काम कर रही है। वह चाहती है कि पूरी दुनिया में उसकी बादशाहत हो। अगस्त 2002 में रामबहादुर राय ने अपने लेख के जरिये एड्स के प्रसंंग में अमेरिकी दादागीरी के अनेक उदाहरण देकर लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि यह एक अमेरिकी साजिश है। एड्स का तो सिर्फ हौआ खड़ा किया जाता है। इस लेख के माध्यम से कहा गया था कि एड्स के प्रसंग में अमेरिकी दादागीरी के अनेक उदाहरण हैं। दुनिया के विभिन्न देशों को लोकतंत्र और मानवाधिकारों की शिक्षा देने की अमेरिक ी आदत और अमेरिकी हितों की सेवा करने वाली दूसरे देशों में क्रियाशील संस्थाओं के बचाव के लिए अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया जाता है। यद्यपि भारत में एड्स का प्रभाव घट रहा है, लेकिन अमेरिकी दवा कंपनियां यह नहीं चाहतीं कि भारत में एड्स में कमी आए? इसीलिए ये कंपनियां, उनसे जुड़े बुद्घिजीवी और उनके इशारों पर काम करने वाले गैरसरकारी संगठन आंकड़ों की कलाबाजी के सहारे एड्स का आतंक बढ़ा रहे हैं। यह प्रयास असल में बड़ी चाल का हिस्सा है, जिसका मकसद भारत के आत्मविश्वास को तोड़ना है। दुनिया के किसी भी आत्मविश्वासी समाज और व्यवस्था को अमेरिका अपना दुश्मन समझता है और उसके आत्मविश्वास को तोड़ने की कोशिश करता है।
एड्स के प्रचार-प्रसर में सरकारी संस्थाओं के साथ-साथ असंख्य गैरसरकारी संगठन भी लगे हुए हैं। हाल के वर्षों में समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा के नाम पर कमार्ई करने वाले बहुत सारे गैरसरकारी संगठन कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। इनमें से कुछ राष्टÑीय हैं, तो कुछ अंतर्राष्टÑीय भी। जो गैर सरकारी संगठन एड्स के काम में लगे हैं, उनके बारे में यह कहना ज्यादा सही है कि एड्स से जितने लोग मरते नहीं, उससे कहीं ज्यादा लोग एड्स के नाम पर जिंदा है। वैसे तो ये संगठन गैरसरकारी हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश को देशी एवं विदेशी सरकारों की सहायता और सुरक्षा प्राप्त है।
वैसे सुनने में यह कोई सामाजिक कार्य की ओर बढ़ाया गया कदम लगता है, लेकिन इससे वाकई में एड्स पीड़ित बच्चों को राहत मिली है या नहीं यह खबर में पता चल जाएगा। नागपुर नगर निगम द्वारा एचआईवी एड्स पीड़ित बच्चों के लिए खोला गया एक विद्यालय इन दिनों विवादों के घेरे में है। वर्तमान में इस विद्यालय का विरोध कुछ गैरसरकारी संगठन कर रहे हैं। खास बात यह है कि हाल ही में विश्व एड्स दिवस के मौके पर गैरसरकारी संगठन ‘सहारा’ के निवेदन पर ही एनएमसी ने इस विद्यालय को खोलने का फैसला लिया था।
एनएमसी के इस कदम से नाखुश विरोधी संगठन हो-हल्ला मचा रहे हैं। विरोधियों का तर्क है कि हाल ही में समूचे विश्व में एचआईवी एड्स पीड़ित बच्चों के प्रति भेदभाव की भावना का प्रचार होगा। वहीं दूसरी ओर एनएमसी के एक अधिकारी और शिशु रोग विशेषज्ञ मिलिंद माने ने कहा कि इस विद्यालय में 28 बच्चों के नाम दर्ज किए गए हैं, जिनके साथ पूर्व में विद्यालयों में अच्छा बर्ताव नहीं किया जा रहा था।
निगम के आयुक्त संजय सेठी का कहना है कि एचआईवी एड्स पीड़ित बच्चों से जुडेÞ तमाम तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। इस विद्यालय के विरोध में शामिल गैरसरकारी संगठन ‘सजीवन’ की कार्यकर्ता शशिकला का आरोप है कि एनएमसी के अधिकारी साधारण विद्यालयों से एचआईवी/एड्स विद्यार्थियों को निकाल कर इस विशेष विद्यालय में भेज रहे हैं। शशिकला ने बताया कि इस संबंध में गैरसरकारी संगठनों की एक बैठक भी हुई थी। यही नहीं, यह संगठन गैरसरकारी संगठन ‘सहारा’ के खिलाफ बगावत करने को तैयार हो गए हैं। पेड़ के नीचे बैठकर गुफ्तगू करने की पुरानी आदत को इस देश में एड्स विरोधी अभियान का हथियार बना दिया गया है। एक स्वयं सेवी संस्था ने एड्स के खिलाफ जागरूकता अभियान को सफल बनाने के लिए यह उपाय आजमाया है। कॉन्गो शहर की 48 वर्षीय आसिया किका, जो छह बच्चों की मां है, इस अभियान से प्रभावित हैं। वे बताती हैं कि मुझे पहले महिला कंडोम के बारे में कुछ भी पता नहीं था, लेकिन अब मैं इसके बारे में जान गई हूं। किका के हाथ में पर्चे और कुछ कंडोम हैं और वह इनकी उपयोगिता से वाकिफ हैं। इससे पहले किका को यह मालूम नहीं था कि महिला कंडोम का उपयोग कैसे किया जाता है। उसे इसकी भी जानकारी नहीं थी कि यह कंडोम स्त्री-पुरुष को एक दूसरे से होने वाली बीमारियों से बचाता है।
जर्मनी की संस्था जीटीजेड अपने इस अभियान के तहत पिछडेÞ और युद्घ प्रभावित इलाकों के लोगों के बीच एड्स के प्रति जागरूकता फैलाने में लगी है। इसके लिए संस्था ने लोगों को इक्ट्ठा करने का यह परम्परागत तरीका खोज निकाला है। समाचार एजेंसी डीपीए को जीटीजेड के एक प्रबंधक अचिम कोच ने बताया यह तरीका बेहद कारगर साबित हो रहा है।
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एड्स पर चर्चा से कतराते हैं भारतीय
तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद भारत में आज भी लोग एचआईवी/एड्स के प्रति रुढ़िवादी रवैया अपनाए हुए हैं। इस बात का खुलासा दो महीने पहले मैक एड्स फंड नामक अंतर्राष्टÑीय संस्था द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से हुआ है। मैक के अध्यक्ष जॉन डेमेसी कहते हैं कि एड्स को लेकर भारतीयों के बीच फैली तमाम भ्रांतियों को दूर करना बेहद जरूरी है। सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि 79 फीसदी भारतीय एड्स को बेहद ही घातक बीमारी समझते हैं, जबकि 59 लोग मानते हैं कि एड्स का उपचार हो सकता है।
कंडोम खरीदने से शर्माते हैं भारतीय?
सर्वेक्षण से पता चला है कि 65 फीसदी भारतीय एड्स के बारे में बातचीत तक करने में हिचकिचाते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 44 फीसदी भारतीय इस बीमारी के बारे में डॉक्टर से बात करने में शर्माते हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, 18 फीसदी भारतीय एचआईवी/एड्स से पीडित लोगों के साथ काम करने से डरते हैं, जबकि कुछ लोग उस कमरे में रहना पसंद नहीं करते हैं जिसमें एचआईवी/एड्स से पीडित लोग निवास करते हैं। भारत में सबसे उन्मुक्त विचार वाले संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक कंडोम वेंडिंग मशीन लगाई गई है। यह दिल्ली के किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय में लगाई गई पहली कंडोम मशीन है। इस मशीन पर ग्राहक सीधे आकर कंडोम ले सकते हैं। लेकिन यह बात जितनी आसान लगती है, उतनी शायद है नहीं। इस मशीन पर अधिकतर लोग रात के अंधेरे में आते हैं। वे रात में 11 बजे के बाद आते हैं। दिन के वक्त केवल एक या दो व्यक्ति आते हैं और जो दिन में आते भी हैं, वे सीधे-सीधे पूछते भी नहीं है। अक्सर ‘बिस्किट’ या ‘चिप्स’ कंडोम मांगने का बहाना बनाते हैं। वे बताते हैं कि वे सामने से बिस्किट मांगते हैं, लेकिन मुझे कोने में ले जाकर कंडोम मांगते हैं। आम तौर पर मशीन एक दिन में 30 पैकेट बेचता है। फिलहाल ‘क्रेर्जडों’ कंडोम की सबसे ज्यादा मांग है और मध्य प्रदेश में इस कंडोम को खरीदने की लहर-सी चल पड़ी है। प्रबंधक बताते हैं कि भले ही यह महंगा हो, लेकिन इसकी मांग सबसे ज्यादा है। भले ही युवक इस मशीन को लगाने के कदम से खुश हैं, लेकिन वयस्क अब भी इस मशीन की जरूरत होने के बावजूद सबसके सामने नाक-भौंह सिकोड़ने लगते हैं।
कॉमिक्स पढ़कर एड्स की समझ बढ़ाएंगे पुरुष
भारत के अलावा आठ अन्य देशों में भी इस संस्था द्वारा सर्वेक्षण कराया गया। कॉमिक्स केवल बच्चों के मनोरंजन का साधन नहीं हैं। देश में कार्यरत कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर पुरुषों में यौनता और इसे जुड़ी समस्याओं की समझ बढ़ाने के लिए कॉमिक्स का सहारा लेने का निर्णय लिया है। ‘दि पॉपुलेशन काउंसिल’और अन्य गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर ऐसे कॉमिक्स का सेट तैयार किया है, जिसमें एचआईवी/एड्स से संबंधित जानकारी दी गई हैं। यह सेट बंगाली, अंग्रेजी, हिन्दी औैर तेलुगु में में उपलब्ध है।
जनसंख्या परिषद के संचार विभाग के प्रमुख विजया निदादावोलू का कहना है किइस तरह के कॉमिक्स तैयार करने का उद्देश्य समाज में मौजूदा समझ को बदलना है। वेश्याओं से यौन संबंध बनाने के दौरान कंडोम के प्रयोग के लिए प्रेरित करना भी इसका उद्देश्य है।
कॉमिक्स के एक सेट में ‘होश में जोश’,‘खून का खतरा’, ‘सावधान सीनियर’ और ‘प्यार का पॉकेट’ नामक शीर्षक से कॉमिक्स तैयार किए गए हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद की शहरी झोपड़पट्टियों में उक्त कॉमिक्स की 25 हजार प्रतियां वितरित करने के लिए भेजी गई हैं। पे्ररणा(दिल्ली), अपनालय (मुंबई), सिनी आश (कोलकाता) और दिव्य दिशा (हैदराबाद) ने मिलकर कॉमिक्स तैयार किया है। विजया का कहना है कि 2006 में इस तरह के कॉमिक्स तैयार करना अति आवश्यक था। देश में 30 प्रतिशत एड्स रोग 15 से 20 साल के हैं। उन्होंने कहा कि इस कॉमिक्स के माध्यम से युवा भारतीय पुरुषों को उस पारंपरिक पुरुषत्व को बदलने के लिए कहा गया है, जिसमें वे जोखिम भरा यौन व्यवहार अपनाते हैं। इसके अलावा देश के चार शहरों में युवाओं से कॉमिक्स में बताए गए मुद्दों पर बातचीत भी की गई, ताकि उनकी समझ बढ़ाई जा सके।
संवेदना का मरहम जरूरी
करीब बीस वर्ष पहले पहचान में आई बीमारी एचआईवी/एड्स से इंसानों की जितनी मौतें हुई, उतनी आज तक के ज्ञात मानव इतिहास में किसी भी बीमारी से समूचे विश्व में एक साथ मौतें नहीं हुई हैं। पांच करोड़ 30 लाख से अधिक लोग इस भयावह बीमारी से संक्रमित हो चुके हैं और अभी तक इस बीमारी से एक करोड़ 88 लाख लोग मौत के मुंह में समा चुके हैं। आज तक 130 लाख बच्चे इस बीमारी के चलते अनाथ हो चुके हैं, क्योंकि उनके माता-पिता दोनों ही इसी बीमारी के चलते मर चुके हैं। दुर्भाग्य से ये सभी आंकड़े हर दिन तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व भर के नेता इस बीमारी का जल्दी पता लगाने, प्रभावी व अचूक उपचार करने, इससे बचने और पीड़ितों की देखभाल करने जैसी बातों को सभी के लिए मानव अधिकारों की सूची में शामिल करने की अपील कर रहे हैं।
दुनिया अब जान चुकी है कि एड्स जैसी महामारी से लड़ने के लिए मानव अधिकारों की सुरक्षा करना मूलभूत अधिकारों के तहत बेहद जरूरी है। मानव अधिकारों की अवहेलना से सेक्स वर्करों और नशेड़ियों के बीच यह बीमारी बेहद गंभीर खतरा बनकर मौजूद रहती है। वैसे इस दिशा में एचआईवी और एड्स नियंत्रण के प्रशंसनीय कार्य हुए हैं और हो भी रहे हैं, लेकिन एचआईवी और एड्स के नियंत्रण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए और प्रयत्न करने की जरूरत है। अन्यथा, हर वर्ष लाखों लोग इसी तरह एचआईवी बीमारी से संक्रमित होते रहेंगे और यह पूरी दुनिया में तेजी से फैलती रहेगी। लांछन और कलंक एचआईवी एड्स ने मानव जाति को समानांतर रूप से विभाजित कर दिया है। वैज्ञानिक जगत इस बीमारी की रोकथाम और इलाज की खोज करने में अपना सिर खपा रह है।
पूरी दुनिया में सभी स्थानीय सरकारें एचआईवी एड्स से बचे रहने के बारे में जागरूकता अभियान छेड़े हुए है। सभी सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाएं, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवक आम लोगों को यह बताने में अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं कि यह बीमारी छुआछूत से नहीं फैलती और इससे पीड़ितों के साथ सद्भावना से पेश आना चाहिए, लेकिन इसके ठीक उलट लोग एड्स से पीड़ित व्यक्ति को घृणा से देखते हैं और उससे दूरी बना लेते हैं। एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति का राज खुलने पर उसके माथे पर कलंक का टीका लग जाता है। यह कलंक इस बीमारी से भी बड़ा होता है और पीड़ित को घोर निराशा का जीवन जीते हुए अपने मूलभूत अधिकारों और मौत के अंतिम क्षण तक एक अच्छी जिंदगी जीने से वंचित होना पड़ता है। दि कोलीशन फॉर इलिमिनेसन आॅफ एड्स रिलेटेड स्टिग्मा (सीईएएस) का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि हम सभी एचआईवी एड्स को कलंक के रूप में प्रचारित करने की अपनी सोच और आचरण में बदलाव लाने के लिए चर्चा सत्र शुरू करें। हमें एचआईवी एड्स से जुड़ी हर चर्चा, प्रतिबंधात्मक उपाय और शोध का कार्य करते रहने के दौरान इससे जुड़े कलंक को खत्म करने के मुद्दे को भी शामिल करना चाहिए।
आज हमें एचआईवी एड्स पर कुछ अलग चर्चा करने की जरूरत महसूस होने लगी है और पूरी दुनिया के शोधार्थी, समुदाय, नेतागण और अन्य सभी इस विषय को प्रमुखता दें। विश्व एड्स दिवस सभी लोगों, समूहों, नेताओं समेत सभी को यह सुनहरा मौका दे रहा है कि वे एड्स पीड़ितों पर लगे कलंक के टीके को पोंछने और उनके मानव अधिकारों की रक्षा के लिए निर्णायक कार्य करें। कलंक की यह आंधी बड़ी तेजी से फैल रही है और समाज को दो भागों में बांट रही है। अत: विश्व एड्स दिवस के अवसर पर एड्स पीड़ितों के साथ हो रहे भेदभाव को जड़ से मिटाने के लिए बहुत ही बड़े स्तर पर कार्य करने का वक्त आ गया है। जीने का अधिकार इस वर्ष के लिए ह्यूमन राइट्स एंड एक्सेस टू ट्रीटमेंट यानी मानव अधिकार और इलाज तक की पहुंच के नाम से स्लोगन बनाया गया है। इसके तहत सभी पीड़ितों को इलाज की सुविधा देने, उनकी सुरक्षा और देखभाल करने जैसे लक्ष्यों को पूरा करने की योजनाएं बनी हैं। इस स्लोगन के माध्यम से पूरी दुनिया के सभी देशों को बताया जाएगा कि वे इस रोग से पीड़ितों के इलाज और सामान्य जीवन जीने में बाधक बने कानूनों को सुधारें और नए कानून बनाएं।
मानव अधिकार सभी के लिए मूलभूत अधिकार के रूप में है। एड्स से पीड़ित लोगों के साथ हो रहे भेदभाव, उन्हें परेशान करने और सताने जैसी प्रथाओं को रोकना होगा। पूरी दुनिया में यह एक कड़वा सच है कि इससे पीड़ित लोगों को कलंकित घोषित कर दिया जाता है, जो नौकरी पर हैं, उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है। स्कूलों से बच्चों को निकाल दिया जाता है। यहां तक कि इससे पीड़ित लोगों को इलाज कराने तक के मूलभूत अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। कई बार अस्पताल और डॉक्टर-नर्स आदि एड्स पीड़ितों का इलाज करने से मना कर देते हैं। भारत में भयावहता अपने देश में वर्ष 1986 में एड्स के पहले मरीज का पता चला था। तब से अब तक देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एचआईवी संक्रमित लोगों का फैलाव हो चुका है। वैसे एचआईवी संक्रमित मरीजों का अनुपात अपने देश में कम ही रहा है। हां, दक्षिण भारत और सुदूर उत्तर-पूर्व के राज्यों में इन मरीजों की संख्या कुछ अधिक है। एचआईवी से ग्रस्त मरीजों की अधिकता महाराष्टÑ, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक और उत्तर-पूर्व में मणिपुर व नागालैंड में है। अगस्त 2006 में राष्टÑीय स्तर पर जारी एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, एड्स से पीड़ित कुल मरीजों में से 90 फीसदी मरीज देश के सभी 38 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पाए गए थे। भारत में एड्स बीमारी को किसी और की समस्या के रूप में देखा जाता है। इससे पीड़ित लोगों की जीवनशैली व उनके चरित्र को संदेह की नजर से देखा जाता है।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि कई बार इस बीमारी से मरने वाले व्यक्ति का अंतिम संस्कार तक करने से इंकार कर दिया गया है।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

राजा-रानी भी लाइन में

मध्य प्रदेश की सियासत में रियासतों का दखल अब भी कायम है। यहां रियासतों के वारिसों के बगैर किसी दल की सियासत नहीं चलती। सत्ता में कोई आए, मगर उन्हें नकारना किसी के लिए आसान नहीं है। लिहाजा, इस बार भी इनकी धमक का एहसास हो रहा है।

राजा और रजवाड़े भले ही खत्म हो गए हों, मगर मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा का टिकट पाकर विधायक बनने की आस में बुंदेलखंड में नाम के ‘राजा’ और ‘रानी’ प्रजा के साथ कतार में लगे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और भाजपा में टिकट वितरण की कवायद तेज हो चली है। अन्य लोगों के साथ नाम के राजा भी उम्मीदवार बनने के लिए जोड़-तोड़ लगाए हुए हंै।
बेशक, बुंदेलखंड?में रियासतें गिनती की रही हैं। आजादी के बाद रियासतें भले ही खत्म हो गई हों, मगर इस इलाके में क्षत्रिय परिवार में जन्मे बालक के नाम के साथ आज भी राजा या जू लगाने के परंपरा बरकरार है। यही कारण है कि क्षत्रिय परिवार का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसको राजा या जू कहकर न बुलाया जाता हो। इस इलाके की  विभिन्न रियासतों के वारिस अथवा क्षत्रिय परिवारों से नाता रखने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की चौखट पर दस्तक देने में लगे हंै। कोई पाला बदल रहा है तो कोई अपनी  निष्ठा का हवाला देकर चुनाव में टिकट मांग रहा है। इनमें से कई तो अभी विधायक है और कई अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं।?बुंदेलखंड में वैसे तो मध्य प्रदेश में छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, सागर, दमोह, पन्ना और दतिया आते हंै। इस इलाके के छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना में नाम के साथ राजा, रानी या जू लिखने की परंपरा अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा है। छतरपुर जिले के छतरपुर विधानसभा से कांग्रेस का टिकट पाने डीलमणी सिंह उर्फ बब्बू राजा, राजनगर क्षेत्र से वर्तमान विधायक विक्रम सिंह उर्फ नाती राजा व पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह उर्फ मुन्ना राजा, महाराजपुर से भाजपा के विधायक मानवेंद्र सिंह उर्फ भंवर राजा, बिजावर से विधायक आशा रानी, भाजपा सांसद जितेंद्र सिंह बुंदेला उर्फ अन्नू राजा, टीकमगढ़ से कांग्रेस विधायक यादवेंद्र सिंह उर्फ जग्गू राजा, खरगापुर से भाजपा के पूर्व विधायक सुरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ बेबी राजा टिकट पाने के लिए ताल ठोंक रहे हंै। इसी तरह पन्ना राजघराने की जीतेश्वरी देवी उर्फ युवरानी भाजपा से टिकट की दावेदार हैं।?एक तरफ जहां प्रजा के साथ राजा टिकट मांग रहे हैं, वहीं एक राजा दूसरे राजा की टिकट कटवाने में भी पूरी तरह सक्रिय है। इन राजाओं की दोनों ही दलों में मजबूत पकड़ है, यही कारण है कि अधिकांश दावेदारों को मैदान में जोरआजमाइश करने का मौका मिल जाएगा। ?बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास कहते हैं कि इस इलाके की राजनीति ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच घूमती है। खासकर छतरपुर, टीकमगढ़ और पन्ना जिलों में आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर शेष स्थानों से इन्हीं दो वर्गों के प्रतिनिधि जीतकर आते हंै। ऐसा इसलिए क्योंकि यह दोनों वर्ग धन और बाहुबल में अन्य से कहीं आगे हंै। राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर बुंदेलखंड क्षेत्र में टिकट के लिए कतार में खड़े कितने राजा और रानी टिकट पाने में सफल होते हैं, यह कयास से आगे कुछ भी नहीं है।
देश की आजादी के बाद रियासतों का अस्तित्व मिट गया। उसके बाद सभी पूर्व रियासतों के मुखियाओं ने राजनीतिक दलों से नाता जोड़ा, क्योंकि वे सत्ता का हिस्सेदार बने रहना चाहते थे। आगे चलकर 1956 में मध्य प्रदेश का गठन हुआ तो रियासत से जुड़े यही लोग राज्य की राजनीति की मुख्यधारा का हिस्सा बन गए। राज्य में दर्जनों रियासतें और जागीरें थीं, जिनका अपने क्षेत्र में प्रभाव था और वे वहां के राजनीतिक मुखिया बन गए। राज्य गठन के बाद से रियासतों व राज परिवारों के वारिसों की राजनीतिक हैसियत व रसूख पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि राज्य के 57 वर्षो में से 18 वर्षो तक रियासतों से जुड़े प्रतिनिधि मुख्यमंत्री रहे हैं। सबसे ज्यादा समय तक राघौगढ़ रियासत के प्रतिनिधि दिग्विजय सिंह 10 वर्ष राज्य के मुखिया रहे, वहीं चुरहट रियासत के स्वर्गीय अर्जुन सिंह लगभग छह वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा गोविंद नारायण सिंह व राजा नरेशचंद्र सिंह भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इन सभी का कांग्रेस से नाता रहा है। वहीं, राज्य में जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जड़ें मजबूत करने में सिंधिया राजघराने की विजयाराजे सिंधिया का अहम योगदान रहा है। राज्य की सियासत में रियासतों के दखल पर गौर किया जाए तो सिंधिया राजघराने की विजयाराजे सिंधिया, उनके पुत्र माधवराव सिंधिया व पुत्री यशोधरा राजे और माधव राव के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीतिक हैसियत किसी से छुपी नहीं है। इसी तरह रीवा राजघराने के मरतड सिंह व उनकी पत्नी प्रवीण कुमारी और अब पुष्पराज सिंह राजनीति में सक्रिय हैं। आगे बढ़ें तो पता चलता है कि देवास राजघराने के तुकोजीराव पंवार, मकड़ई राजघराने के विजय शाह भाजपा सरकार में मंत्री हैं। पूर्व मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के बेटे ध्रुव नारायण सिंह विधायक हैं। चुरहट रियासत के अजय सिंह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, छतरपुर राजघराने के विक्रम सिंह, अलीपुरा सियासत के मानवेंद्र सिंह, कालूखेड़ा राजघराने के महेंद्र सिंह कालूखेड़ा से विधायक हैं।
राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार, देश की आजादी के बाद राजनीतिक दलों का कोई वोट बैंक नहीं था, इसलिए उन्हें रियासतों के विलीनीकरण के बाद चुनाव में उनका सहयोग लेना पड़ा। आज राज परिवारों का अस्तित्व कम भले हो गया, मगर उनका वोट बैंक आज भी है, लिहाजा कांग्रेस और भाजपा के लिए उन्हें साथ लेकर चलना मजबूरी है। वहीं दूसरी ओर, राजपरिवारों को भी राजनीतिक पार्टियों के संरक्षण की जरूरत है। इस तरह दोनों एक-दूसरे की जरूरत है। राज्य में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर राजघरानों से नाता रखने वाले वारिसों ने टिकट हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। राजघरानों के कुछ वारिस भाजपा का तो कुछ कांग्रेस का टिकट पाना चाह रहे हैं। दोनों दल एक दर्जन से ज्यादा स्थानों पर इन वारिसों को मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की सत्ता चाहे किसी भी के हाथ आए, मगर इतना तो तय है कि पुरानी रियासतों से नाता रखने वालों का असर नई सरकार में भी बरकरार रहेगा।

छठ पर गरमाई सियासत


छठ के अवसर पर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ी है। छठ के नाम पर राजनीतिक आयोजनों की संख्या में भी इजाफा होता जा रहा है। पूर्वांचल के लोगों कि बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि पूरब के प्रमुख सांस्कृतिक पर्व छठ में शरीक होने के लिए नेताओं की होड़ लगी रहती है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्वांचल का लोकपर्व ‘छठ’ धार्मिक से ज्यादा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। दिल्ली में सत्ता की दावेदार कांग्रेस और भाजपा में पूर्वांचल के प्रवासियों को अपने पक्ष में करने की होड़ शुरू हो गई है। दिल्ली में बड़ी संख्या में रह रहे पूर्वांचल के मतदाताओें को भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव से पहले लुभाने के प्रयास में जुटी हुई है। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और दिल्ली विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के प्रभारी बनाए गए नितिन गडकरी कहते हैं कि पूर्वांचल के लोगों को बराबर के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे। मैं आपको आश्वासन देता हूं कि दिल्ली में भाजपा के सत्ता में आने पर छठ पूजा को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाएगा। गडकरी ने कहा कि यहां रहने वाले पूर्वांचल के अधिकतर लोग मजदूर, रिक्शा चालक और इस तरह के मेहनत के काम करने में लगे हैं। भाजपा के दिल्ली की सत्ता में आने पर यहां रह रहे 40 लाख गरीब लोगों को नि:शुल्क स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत मेडिकल लाभ दिए जाएंगे। दिल्ली के गरीबों में अधिकतर पूर्वांचल यानी बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हैं। पूर्वांचल के गरीब लोगों को उन्होंने आश्वासन दिया कि राष्ट्रीय राजधानी में भाजपा की सरकार बनने पर सरकार कम लागत वाले 10 लाख मकान बनवाएगी और उनमें से अधिकतर पूर्वांचल के लोगों को दिए जाएंगे। वहीं, कांग्रेस में पूर्वांचल का चेहरा कहे जाने वाले पश्चिमी दिल्ली के सांसद महाबल मिश्रा दिल्ली विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। वे लंबे समय से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। क्षेत्र में विशेषकर पूर्वांचल के लोगों में इनकी बेहतर छवि है। जब उनसे पूछा गया कि क्या आप मानते हैं कि प्रवासी दिल्ली पर बोझ हैं? उन्होंने कहा कि ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। दरअसल, दिल्ली के उत्थान में प्रवासी लोगों का अहम रोल है। प्रवासी दिल्ली के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उत्थान में काफी मदद दे रहे हैं। महाबल मिश्रा ने कहा कि कांग्रेस भी प्रवासियों की उन्नति में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। छठ पर्व पर सरकारी छुंट्टी घोषित की गई और 40 छठ घाटों पर सरकार तमाम व्यवस्था कराती है। भोजपुरी-मैथिली अकादमी का गठन भी किया गया है। प्रवासी मजदूरों के लिए दिल्ली में न्यूनतम मजदूरी देश भर में सबसे ज्यादा तय की गई है। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि राजनीति के लिए जगह दी नहीं जाती, बनाई जाती है। चूंकि 1990 से पहले दिल्ली में प्रवासियों की संख्या काफी कम थी। पहले दिल्ली में रहने वाले प्रवासी रुपये कमा गांव भेज देते थे। धीरे-धीरे समय बदला और बाहर से आए लोग यहां बसने लगे। वे अपनी कमाई यहीं खर्च करने लगे। इससे दिल्ली का आर्थिक ढांचा मजबूत होने लगा। बावजूद इसके 1993 में कांग्रेस ने संगम विहार, जनकपुरी और यमुनापार की एक सीट पर पूर्वांचल प्रत्याशी को उतारा। वर्ष 1997 में मुझे पार्षद का टिकट दिया गया। 1998 में भी कांग्रेस ने भरोसा कर मुझ जैसे प्रवासी को विधानसभा में उतारा। वर्तमान में दिल्ली में पूर्वांचल के सात प्रतिनिधि हैं। हालांकि, जनसंख्या के अनुपात में प्रवासियों को अधिक टिकट दिए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। उल्लेखनीय है कि परिसीमन के बाद दिल्ली की दो तिहाई विधानसभा सीटें और नगर निगम की सीटें ऐसी बन गई हैं जहां पूर्वांचल के प्रवासी 20 फीसद से 60 फीसद तक हैं। परिसीमन से पहले बाहरी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली में प्रवासियों का असर था लेकिन परिसीमन के बाद लोकसभा की सातों सीटों, विधान सभा की 70 में से 50 सीटें और नगर निगम के 272 में से करीब दो वार्ड ऐसे बन गए हैं, जहां प्रवासियों के वोट निर्णायक हैं। पूर्वांचल के प्रवासियों के साथ उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के प्रवासी भी जुड़ कर ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं। प्रवासियों के बूते पहले विधायक और निगम पार्षद चुनाव जीतते रहे, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में बिहार मूल के महाबल मिश्र ने पश्चिमी दिल्ली लोकसभा सीट से जीत हासिल करके दिल्ली के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी। अब तो माहौल प्रवासियों के अनुकूल पहले से ज्यादा हो गया है। सच तो यह भी है कि पूर्वांचल, खासकर बिहार का लोक पर्व छठ अब बिहार से भी ज्यादा धूमधाम से दिल्ली में मनाया जाता है। छठ के मुख्य पर्व में दोनों दिन यमुना के घाटों पर तिल रखने की भी जगह नहीं रहती है। दिल्ली और आसपास के उपनगरों में हर नदी-नालों पर छठ करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। सालों से प्रवासियों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसी के चलते दिल्ली सरकार ने बिजली, पानी, साफ-सफाई का इंतजाम शुरू करवाया। विभिन्न स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल भी अपने स्तर पर घाटों की साफ-सफाई करते हैं। 2001 में दिल्ली सरकार ने छठ के दिन एच्छिक अवकाश घोषित करके दिल्ली के प्रवासियों को मान्यता दी। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद तो रहने वाली पंजाब की हैं, लेकिन दिग्गज गांधीवादी नेता पंडित उमाशंकर दीक्षित की बहू होने के चलते वे अपने को पूरब का प्रवासी बताती रही हैं। उनके पुत्र संदीप दीक्षित ऐसे इलाके (पूर्वी दिल्ली) से लगातार दो बार सांसद बन गए जो प्रवासी और ब्राह्मण बहुल सीट मानी जाती है। शीला दीक्षित से पहले भी प्रवासी कांग्रेस के ही साथ थे बल्कि 1993 में विधानसभा चुनाव में कई इलाकों में उन्होंने जनता दल को वोट किया था और तब जनता दल के नेता रामवीर सिंह विधूड़ी की उनमें जो अच्छी पैठ बनी वह अब तक बनी हुई है। पूर्व सांसद सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर को भी इस वर्ग का समर्थन मिलता रहा है। भाजपा नेता शुरू से इनसे अछूत जैसा व्यवहार करते रहे। 1993 के विधानसभा चुनाव में मदन लाल खुराना ने मेवाराम आर्य आदि की सलाह पर पहली बार इस वर्ग के लोगों में पैठ बनाई जिसका परिणाम हुआ कि भाजपा सत्ता में आई लेकिन मूलत: वैश्य व पंजाबी नेतृत्व वाली भाजपा प्रवासियों को ढंग से जोड़ नहीं पाई। दो बार प्रदेश अध्यक्ष रहे मांगेराम गर्ग या डॉ. हर्षवर्धन की कोशिशों का भी ज्यादा लाभ नहीं हुआ। इस बार प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल और भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी डॉ. हर्षवर्धन ने इसे मुख्य एजंडा बनाया है। उन्होंने बिहार में कई नेताओं को इस अभियान में सहयोगी बनाया है। दरअसल, चुनाव आते ही राजनीतिक दल दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचल, यानी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश, के मतदाताओं को लुभाने में लग जाते हैं। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से दिल्ली की तस्वीर बदली है, उसमें पूर्वांचल के लोग वोट बैंक के रूप में एक मजबूत ताकत बन कर उभरे हैं। दिल्ली में मतदाताओं की संख्या करीब 1.10 करोड़ है। इसमें से करीब 35 लाख मतदाता पूर्वांचल के हैं। विशाल वोट बैंक की वजह से ही पूर्वांचली-दिल्ली की राजनीतिक तस्वीर बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं। वैसे तो पूर्वांचली लोगों की उपस्थिति दिल्ली के कोने-कोने में है, लेकिन सात में से चार लोकसभा और दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में होते हैं। दिल्ली की पूर्वी, उत्तर-पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या 20 से 25 फीसदी के करीब है। बाकी तीनों सीटों पर पूर्वांचली मतदाताओं की तादाद करीब 10 फीसदी है। पूर्वांचल के लोगों कि बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि पूरब के प्रमुख सांस्कृतिक पर्व छठ में शरीक होने के लिए नेताओं की होड़ लगी रहती है। गौर करने योग्य यह भी है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने पूर्वांचलियों को रिझाने के लिए सूर्य को अर्घ्य दिया था। दूसरी ओर दिल्ली की मुख्यमंत्री और अपने को पूर्वांचल की बेटी कहने वाली शीला दीक्षित भी छठ घाटों का निरीक्षण करती नजर आई थीं। पूर्वांचली मतदाताओं को लुभाने की इसी कवायद का नतीजा है कि बिहार जागरण मंच की ओर से पूर्वी दिल्ली में यमुना के तट पर कराए जाने वाली छठ पूजा के आयोजन में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, ए के वालिया, मदन लाल खुराना, महाबल मिश्रा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता-अभिनेता पहुंचते रहे हैं। बिहार जागरण मंच के अध्यक्ष दिनेश प्रताप सिंह भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि छठ के माध्यम से राजनीतिक लाभ उठाने का भरसक प्रयास होता रहा है। इस बार छठ पूजा के दौरान भाजपा दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचली लोगों को खुश करने के लिए एक नई कोशिश करने वाली है। दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में बने छठ पूजा के घाटों पर भाजपा के कार्यकर्ता अपना बैनर लिए लोगों की मदद करते और चाय पिलाते नजर आएंगे। प्रदेश भाजपा ने तय किया है कि इस बार पार्टी सभी छठ घाटों पर अपने बैनर तले छठ व्रतियों की सुविधा के लिए टेंट और कैंप लगाएगी। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि शीला सरकार पुरबियों को फुसलाने के लिए घोषणाएं तो कर देती हैं, लेकिन उन घोषणाओं पर अमल नहीं किया जाता। न तो छठ घाटों की सफाई का ख्याल रखा जाता है और न ही छठ पूजा के लिए नदी-तालाब में साफ पानी की कोई व्यवस्था की जाती है।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

दिल्ली में त्रिशंकु विधानसभा

‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी के साथ मिलकर जब ‘हमवतन’ ने दिल्ली की जनता की नब्ज को टटोला, तो कुछ चौंकाने वाले जवाब सामने आए हैं। मसलन, पिछले 15 सालों से दिल्ली पर राज कर रहीं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित मुकाबले में तो बनी हुई हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता में जबर्दस्त गिरावट आई है। इसी तरह सरकार विरोधी माहौल होने के बावजूद भाजपा बहुमत से काफी दूर है। दरअसल, कांग्रेस और भाजपा दोनों के खेल को बिगाड़ रही है आप। पहली बार किसी चुनाव में भाग ले रही आप को दिल्ली के 21 प्रतिशत से ज्यादा लोग पसंद कर रहे हैं। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु जनादेश की संभावना बनती दिख रही है। साप्ताहिक ‘हमवतन’ और ‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी द्वारा 20 सितंबर से चार अक्टूबर के बीच 7, 550 मतदाताओं के बीच कराए गए सर्वे से, जो रुझान सामने आ रहे हैं, वे त्रिशंकु विधानसभा की ओर इशारा कर रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, दिल्ली में कांग्रेस को भारी झटका लग सकता है। सर्वे का दूसरा पहलू यह भी है कि भाजपा के तमाम दावों के विपरीत उसकी भी सरकार बनने की संभावना नहीं है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भाजपा के बढ़ते कदमों को रोक रही है। साथ ही कांंग्रेस के भी कई इलाके आप के कब्जे में जाते दिख रहे हैं। ग्रामीण, शहरी, इलाकों के युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के बीच दरवाजे से दरवाजे किए गए सर्वे में कांग्रेस के पक्ष में 26 सीटें आती दिख रही हैं। भाजपा को भी इतनी ही सीटें मिलने की संभावना है। जबकि आप को 12 सीटें और अन्य दलों के बीच छह सीटें जाती दिख रही हैं। कांग्रेस के पक्ष में 29.8 फीसदी जनता विश्वास जता रही है, जबकि भाजपा के पक्ष में 36.75 फीसदी जनता वोट डालने के मूड में है। अभी एक साल के भीतर आंदोलन के गर्भ से निकली केजरीवाल की पार्टी आप को 21.20 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं, जबकि 12.25 फीसदी लोग अभी अन्य दलों या निर्दलीय पर यकीन कर रहे हैं। दिल्ली के लोगों का मिजाज बदल रहा है। लगता है शीला दीक्षित के शासन से लोग ऊब से गए हैं। दिल्ली में 15 सालों में जो विकास हुए हैं, उससे लोग गदगद तो हैं, लेकिन महंगाई और भ्रष्टाचार की वजह से दिल्ली की जनता अब शीला दीक्षित की जगह केजरीवाल को ज्यादा तरजीह दे रही है। केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में 35.35 फीसदी जनता पसंद कर रही है, जबकि शीला दीक्षित को अगले मुख्यमंत्री के लिए 29.4 फीसदी और विजय गोयल को मात्र 27 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं। दिल्ली की जनता भले ही इस चुनाव में भाजपा को पसंद कर रही है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल को ज्यादा तरजीह दे रहे है। भाजपा को वोट देने वाले करीब 15 फीसदी ऐसे लोग हैं, जो सीएम के रूप में केजरीवाल को पसंद कर रहें हैं। इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के बड़े नेता अब तक चुनाव जीतते रहे हैं, वहां उनके खिलाफ लोगों में ज्यादा गुस्सा है। करीब दर्जन भर कांग्रेस की सीटें ऐसी हैं, जहां बड़े स्तर पर उलटफेर की संभावना है। कांग्रेस के चार मंत्रियों की हार तय मानी जा रही है, क्योंकि उनके इलाके में कहीं भाजपा के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है, तो कहीं केजरीवाल के प्रति। चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली में भाजपा के प्रति जिन लोगों की रूचि बढ़ी है, उसके लिए मोदी फैक्टर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। आठ विधानसभा ऐसे पाए गए हैं, जहां केवल मोदी के नाम पर भाजपा की जीत होती दिख रही है। हालांकि जनता क ा रुझान चुनाव होते-होते बदलते रहते हैं, लेकिन इस सर्वे से यह पता चलता है कि दिल्ली में जो 15 सालों में विकास हुए हैं, वह भ्रष्टाचार और महंगाई के नीचे दबते दिख रहे हैं। शीला आज भी लोगों की पसंद हैं और लोग मानते भी हैं कि दिल्ली में विकास हुए हैं, लेकिन महंगाई, बेकारी, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने कांग्रेस की जमीन को कमजोर किया है। सर्वे में कुछ अलग-अलग पहलुओं पर भी लोगों की राय जानने की कोशिश की गई। कांग्रेस से अगले मुख्यमंत्री के रूप में कौन बेहतर साबित हो सकता है? इस सवाल के जवाब में जो लोगों की राय मिली है, उसमें कांगे्रस के भीतर शीला दीक्षित सबसे ऊपर हैं। 31 फीसदी लोग शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, सुभाष चोपड़ा को 11 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं। 22 फीसदी लोगों की पसंद मुख्यमंत्री के रूप में जयप्रकाश अग्रवाल हैं, तो 36 फीसदी लोगों ने किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही है। यही हाल भाजपा के भीतर भी है। हालांकि भाजपा ने अभी अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, लेकिन जिस तरह से प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल को प्रोजेक्ट करने की बात हो रही है, वह भाजपा के पक्ष में नहीं है। विजय गोयल को मुख्यमंत्री के रूप में 24 फीसदी लोग पसंद कर रहे हैं, जबकि 47 फीसदी लोग सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाह रहे हैं। भाजपा अगर सुषमा स्वराज के नजरिये से चुनाव को देखती है, तो भाजपा को और सीटें मिलने की संभावना बढ़ सकती है। 11 फीसदी लोग हर्षवर्धन को और 18 फीसदी लोग किसी अन्य को भाजपा के मुख्यमंत्री के रूप में पसंद कर रहे हैं। दिल्ली के इस सर्वे में भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार अन्य संभावित प्रधानमंत्री प्रत्याशियों में सबसे आगे निकलते दिख रहे हैं। दिल्ली की 52.7 फीसदी जनता मोदी को अगला प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में हैं, दूसरे नंबर पर राहुल गांधी हैं। उनके पक्ष में 28.15 फीसदी जनता खड़ी है। सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बने, इसकी चाहत 6.25 फीसदी लोगों में है। दिल्ली के इस सर्वे में छह फीसदी लोग बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में तीन फीसदी और मुलायम सिंह यादव और मायावती के पक्ष में दो-दो फीसदी लोग समर्थन में हैं। सर्वे रिपोर्ट ‘हमवतन’ एवं ‘न्यूज एक्सप्रेस’ मीडिया एकेडमी द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव पर सर्वे-2013 -सर्वे की अवधि ( 20 सितंबर से 04 अक्टूबर) -कुल विधानस सीट- 70 -कुल जनमत संग्रह- 7550 पार्टी लोगों की राय (में) संभावित सीटें कांग्रेस 29.8 - 26 भाजपा 36.75 - 26 आप 21.20 - 12 अन्य 12.25 - 6 - त्रिशंकु विधानसभा के आसार - कांग्रेस को हानि, भाजपा की बढ़त पर झाडू का अडंÞगा - किसी भी दल को बहुमत नहीं भाजपा में सीएम के रूप में कौन है जनता की पसंद (प्रतिशत में) विजय गोयल - 24 हर्षवर्धन- 11 सुषमा स्वराज- 47 अन्य- 18 युवाओं की पसंद मोदी - 58 राहुल - 42 महिलाओं की पसंद राहुल - 62 मोदी- 48 कांग्रेस में सीएम के रूप में जनता की पसंद (प्रतिशत में) शीला दीक्षित - 31 सुभाष चोपड़ा - 11 जयप्रकाश अग्रवाल- 22 अन्य - 36 देश का प्रधानमंत्री कौन बने? लोगों की राय (प्रतिशत में) नरेंद्र मोदी- 52.7 राहुल गांधी- 28.15 सोनिया गांधी- 6.25 नीतीश कुमार- 6 लालकृष्ण आडवाणी- 3 मुलायम सिंह यादव- 2 मायावती - 2 दिल्ली का मुख्यमंत्री कौन बने, इस पर जनता की राय (प्रतिशत में) केजरीवाल - 35.35 शीला दीक्षित - 29.4 विजय गोयल - 27.05 पार्टियों के बारे में लोगों की राय प्रश्न 05 - सबसे भ्रष्ट पार्टी लोगों की नजर में कांग्रेस भाजपा सभी पार्टियों 48 41 11 प्रश्न 07 - दिल्ली की प्रमुख समस्या लोगों की नजर में भ्रष्टाचार बेरोजगारी पानी/बिजली महिलाओं से छेड़छाड़ 48 28 17 7 प्रश्न 08 - क्या अपराधियों को टिकट मिलना चाहिए? नहीं हां नहीं पता 87 3 10 प्रश्न 10 - दिल्लीवासियों की नजर में देश की समस्या भ्रष्टाचार आतंकवाद बेरोजगारी महंगाई 41 20 33 14 प्रश्न 11 -लोगों की नजर में राजनीति कैसी हो? सेक्युलर धार्मिक विकास 83 11 6 प्रश्न- 12 -किस आधार पर वोट देंगे पार्टी के नाम पर उम्मीदवार के नाम पर 78 22 प्रश्न -13-विकास के बारे में दिल्ली की जनता की राय विकास हुआ है विकास नहीं हुआ नहीं जानते 73 18 9 प्रश्न -14 क्या शीला दीक्षित को हटना चाहिए? हां नहीं नहीं जानते 46 49 5 प्रश्न - 16 क्या आप अपने विधायक से खुश हैं? हां नहीं पता नहीं 34 57 9 प्रश्न- 19 दिल्ली पुलिस का कार्य कैसा है? अच्छा बेकार मालूम नहीं 33 52 15 प्रश्न - 20 देश के दूसरे इलाके में हाल में हुए दंगे जनता की नजर में राजनीतिक सांप्रदायिक नहीं जानते 73 22 5

सोमवार, 30 सितंबर 2013

किसे मिलेगी आरजेडी की कमान?


रांची की सीबीआई कोर्ट ने चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू यादव को दोषी करार दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने 44 और आरोपियों को भी दोषी करार दिया है। इस फैसले के तुरंत बाद लालू को हिरासत में ले लिया गया है। लालू सहित सभी दोषियों की सजा पर फैसला 3 अक्टूबर को होगी। तब तक दोषियों की सजा पर कोर्ट में बहस होगी। इस फैसले के साथ ही लालू के लिए संकट का नया दौर शुरू हो गया है। दोषियों में पूर्व मंत्री जगन्नाथ मिश्र, जेडीयू सांसद जगदीश शर्मा भी शामिल हैं। इन सभी पर 37 करोड़ 68 लाख रुपए के चारा घोटाले का आरोप है। दागी नेताओं से जुड़े अध्यादेश के खिलाफ बने माहौल के बीच लालू के इस केस पर पूरे देश की नजर थी। फैसले के मद्देनजर बिहार के सभी जिलों में अलर्ट जारी किया गया है, ताकि फैसले के बाद उनके समर्थक किसी तरह का हंगामा न कर सकें। चारा घोटाले में लालू यादव को दोषी करार दिया गया है और अब सजा मिलने का इंतजार है। कोर्ट के फैसले के बाद बिहार की सियासी तस्वीर ही बदल जाएगी। नीतीश कुमार से दो बार मात खाने के बाद लालू यादव बिहार में अपनी जमीन वापस पाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। लेकिन उनको सजा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का क्या होगा। क्या लालू अपनी पार्टी पर दबदबा कायम रख पाएंगे।
लालू यादव के बाद कौन, क्या राबड़ी आरजेडी की कमान संभालने के लिए आगे आएंगी या फिर बेटा तेजस्वी अपने पिता की पार्टी को संभालने के लिए पूरी तरह से राजनीति में उतर जाएगा। लालू को सजा होने की सूरत में बड़ा संकट पार्टी के भविष्य पर आएगा। बीस साल तक बिहार की सत्ता में बादशाह की तरह राज करने वाले लालू यादव अपनी धार, अपनी रफ्तार, अपनी चमक खोते जा रहे हैं। एक वक्त वो भी था जब लालू की पार्टी के विधानसभा में 130 से ज्यादा विधायक होते थी। लेकिन अब हालत ये है कि बिहार विधानसभा में आरजेडी के सिर्फ 22 विधायक हैं। लोकसभा में भी लालू को मिलाकर सिर्फ 4 सांसद हैं। यानि नीतीश के विकास की आंधी में लालू एक बार उखड़ने के बाद अपना पैर नहीं जमा पा रहे। लोग उस दौर को भूलने के लिए तैयार नहीं जब लालू के राज में बिहार गर्त में पहुंच गया था। लूट और अपहरण उद्योग में तब्दील हो गए थे। दिन में भी सड़कों पर निकलने में लोग घबराते थे। ऐसे में जब पार्टी का मुखिया ही सलाखों के पीछे होगा तो कमजोर होती इस पार्टी का साथ देने वाले कितने होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सुरेन्द्र किशोर (पत्रकार) का मानना है कि फर्क तो पडेगा क्योंकि लालू बिहार के राजनीत में एक मजबूत स्तम्भ है। लेकिन सब कुछ सजा के ऊपर निर्भर करता है। हो सकता है की पार्टी में बहुत लोग अलग हो जाये क्योंकि ज्यादा लोगों की तो बिचार धारा मिलती जुलती है। जानकारो की मानें तो नीतीश कुमार जब दोबारा सत्ता में आये तब आरजेडी के कई नेता नीतीश कुमार का दामन थामने के लिए तैयार थे। लेकिन उस वक्त नीतीश कुमार को लोगो की जरूरत नहीं थी। नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए से अलग होने के बाद अब नीतीश को भी राज्य के अलग अलग इलाकों में बीजेपी से मुकाबला करने के लिए नए चेहरे चाहिए। इसलिए माना जा रहा है कि लालू के जेल जाते ही बिहार की राजनीति में नाटकीय मोड़ आ सकता है। राजनीतिक विशलेष्क शैलाव गुप्ता का कहना है कि इससे बिहार के राजनीति में बहुत पड़ा फर्क पड़ेगा। लालू बिहार के राजनीति में बड़े नेता के तौर पर है। जानकारों की मानें तो लालू के फैसले पर नजरें गड़ाए नीतीश कुमार जानबूझ ही अपने मंत्रीमंडल का विस्तार नहीं कर रहे हैं। सूत्रों की मानें तो आरजेडी में फूट पड़ने की हालत में नीतीश बागी विधायकों को हाथों-हाथ लपकने के लिए तैयार हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से लालू अपने अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन राजनीति की पिच पर अपने पिता जैसा खिलाड़ी बनने में उन्हें काफी वक्त लगेगा। लालू के जेल जाने के बाद बिहार के राजनीत में बडा परिवर्तन आ सकता है। जिसमें आरजेडी के नेताओ को अपनी पार्टी को सम्भलाने के साथ-साथ अपने लोगो को खोने से भी बचाना होगा। दागी नेताओं से जुड़े अध्यादेश के खिलाफ देश में बने माहौल के बीच लालू के इस केस पर सबका ध्यान था। लालू दोषी पाए गए हैं और उन्हें 6 महीने से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अगर उनकी सजा 2 साल से ज्यादा की हुई तो तुरंत ही संसद की सदस्यता खारिज हो जाएगी। सजा काटने के लिए बाद भी अगले 6 साल तक वो चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। जेल जाने के बाद पार्टी और बिहार की जमीन पर उनकी रही-सही पकड़ भी कमजोर होनी तय है। चाईबासा केस में लालू के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और जेडीयू सांसद जगदीश शर्मा पर भी घोटाले में शामिल रहने का आरोप थे। चाईबासा केस के अलावा लालू पर और भी आरोप हैं। लालू पर चारा घोटाले के दौरान रांची के डोरंडा से 184 करोड़ की अवैध निकासी, दुमका कोषागार से 3.47 करोड़ की अवैध निकासी, देवघर कोषागार से 97 लाख की अवैध निकासी के मामले चल रहे हैं। मुकदमा करने वाले सरयु राय ने बताया कि यह घोटाला पहले से चला आ रहा था। लेकिन लालू के सत्ता में आते ही इसका पैमाना और बढ़ गया। नब्बे के दशक में चारा घोटाला तब सुर्खियों में आया जब बिहार के पशुपालन विभाग में जानवरों के लिए चारे की खरीद और ढुलाई में तमाम गड़बड़ियां पाई गईं। जांच में ये तक सामने आया कि जानवरों के चारे की ढुलाई के लिए कागजों पर स्कूटर और मोटरसाइकिल तक का इस्तेमाल दिखाया गया। बवाल मचा तो लालू की गिरफ्तारी भी हुई। उस वक्त अपना दबदबा कायम रखने के लिए लालू ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। बेहद कम पढ़ी-लिखी राबड़ी का मुख्यमंत्री बनना उस समय बहुतों को अखरा। लेकिन लालू अपनी जिद पर अड़े रहे। कहते हैं खुद राबड़ी भी सीएम बनने के लिए तैयार नहीं थीं। लेकिन लालू ने उन्हें सीएम बनाकर जेल से ही बिहार की सत्ता पर राज किया। अब 17 साल बाद इस केस में फैसले की घड़ी आई है। 17 साल पहले सुर्खियो में आये चारा घोटाले में तब पचास से भी ज्यादा लोगों का नाम सामने आया था। जिसमें किसी की मौत हो गयी तो कुछ लोग बरी भी हो गये। लेकिन इस चारा घोटाले के आरोप में राजनेता बचते रहे।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

कैसे लगे रोक?


बिहार में हिंसक आतंकी वारदात भले न हुई हो, लेकिन देशद्रोही तत्व यहां जाली नोटों का कारोबार तेजी से फैला रहे हैं। खासबात यह है कि इनमें बड़े नोटों मसलन हजार और पांच सौ रुपये के जाली नोटों का चलन बढ़ा है। पिछले करीब साढ़े पांच साल में सिर्फ पुलिस ने 69 लाख से अधिक के जाली नोट पकड़े हैं।
एक तरफ सीमा पर पाक गोलीबारी कर रहा है, तो इधर उसका आइएसआइ जाली नोट फैलाने में लगा है। पांच साल में लगभग 25 करोड़ के जाली नोट बिहार लाए गए। लगभग पांच करोड़ रुपये मूल्य के जाली भारतीय नोट हर साल बांग्लादेश से मालदा हो कर बिहार पहुंच रहे है। पिछले पांच वर्षो में एक करोड़ 21 लाख रुपये मूल्य केजाली नोट बरामद किए गए हैं, इसके साथ ही 356 तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। वर्ष 2013 में अब तक 25 लाख 40 हजार 440 रुपये मूल्य के जाली नोट बरामद किए गए हैं, वहीं 26 तस्करों को गिरफ्तार किया गया है। बिहार में पहुंच रहे जाली नोटों में ज्यादातर हजार व पांच सौ रुपये के हैं। गौर करने योग्य यह है कि वर्ष 2008 से 2010 तक जाली नोटों का विस्तार मिला है। जब्त नोटों के आंकड़ों से भी इसकी पुष्टि हुई है। इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि इस दौरान पुलिस और अन्य एजेंसियों की सक्रियता बढ़ी हो, जिसके चलते उन्हें यह कामयाबी हासिल हुई। कहा जा रहा है कि नेपाल के रास्ते ये नोट बिहार पहुंच रहे हैं। इसके पीछे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ माना जा रहा है। बिहार में इस धंधे से जुड़े करीब 500 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। नेपाल से सटे जिलों में लगने वाले पशु हाट-बाजार में जाली नोटों के चलन की बात सामने आई है। इसको रोकने के लिए सशस्त्र सीमा बल ने अपने पोस्टों पर जाली नोट पकड़ने वाली मशीन लगाई है। ऐसे हाट और मेलों में भी मशीनें का इस्तेमाल किया जा रहा है। नोटों की पहचान के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने राज्य पुलिस को सीडी उपलब्ध कराई है। इस सीडी में डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से यह दिखाया गया है कि जाली नोटों की पहचान कैसे की जा सकती है। सभी जिलों के एसपी को यह सीडी भेजी गई है जिसका प्रदर्शन हाट-बाजार में आम लोगों के बीच किया जाना है। जिलों में एंटी फेक करेंसी सेल का भी गठन किया जा रहा है। नकली नोटों की जांच में एक और बात सामने आई है जिसमें यह कहा जा रहा है कि इसमें भी आॅरिजनल और डुप्लीकेट हैं। अधिकारियों के अनुसार आईएसआई द्वारा तैयार नोटों को उसके धंधेबाज ‘आईएसआई’ के नाम से ही जानते हैं। आईएसआई कोड का मतलब है ‘आॅरिजनल नकली नोट’। दूसरा है लोकल मेड। राज्य पुलिस मुख्यालय के आलाधिकारियों का मानना है कि जितने जाली नोट पकड़े जा रहे है, उसका पांच गुना कारोबार बिहार के रास्ते से हो रहा है( दूसरी ओर, भारत नेपाल सीमा क्षेत्र से गिरफ्तार किए गए आतंकी अब्दुल करीम टुंडा ने बिहार सहित देश भर में जाली भारतीय करेंसी की हो रही खपत को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। एनआइए सूत्रों के अनुसार टुंडा ने माना है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने लश्कर- ए- तैयबा के सहयोग से भारत में जाली करेंसी की खपत बढ़ाई है। इस काम में पंजाब मूल के लोग प्रारंभिक सहयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही नेपाल सीमा से जाली भारतीय करेंसी को भारत में पहुंचाया जा रहा है। एडीजी (मुख्यालय) रवींद्र कुमार के अनुसार, बांग्लादेश के रास्ते प बंगाल में जाली भारतीय करेंसी पहुंचती है। इसके बाद इसे बिहार में भेजा जाता है। हाल के पुलिस आॅपरेशनों में गिरफ्तार किए गए े तस्करों से हुई पूछताछ में इसकी पुष्टि हुई है। पुलिस सूत्रों की मानें, तो आतंकी टुंडा द्वारा जाली नोटों के दम पर बोधगया में बम ब्लास्ट को अंजाम दिए जाने की भी जांच की जा रही है। टुंडा अधिक पैसा देने का लालच दिखा कर युवकों को आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए प्रेरित करता रहा है। आर्थिक अपराध के मामलों की जांच की जिम्मेवारी इओयू को दी गई है। बताया जाता है कि बिहार पुलिस मालदा व पश्चि बंगाल की ओर से आ रहे जाली नोट के कंसाइनमेंट को अकेले दम पर रोक पाने में विफल साबित हो रही है। इस कारोबार में नोटों के कंसाइनमेंट लेकर चलने वालों में महिलाओं व राज्यों से पलायन कर जाने वाले मजदूरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जहां सूचनाएं मिल रही हैं, वहां ट्रैप कर लिया जा रहा है, लेकिन अधिकतर कंसाइनमेंट पुलिस को सूचना मिले बगैर आगे फारवर्ड हो जा रहे हैं। उत्तर बिहार में तो जाली नोट के कारोबारियों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि फारबिसगंज, कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया सहित आस-पास के इलाकों के चट्टी- बाजारों में जाली नोट पहुंच चुके हैं। सीबीआई के आलाधिकारी भी मानते हैं कि उत्तर-पूर्वी बिहार के कोसी क्षेत्र में स्थित बैंकों में भी जाली नोट पहुंच चुके हैं। जाली नोट के कंसानइमेंट को पकड़ने में डीआरआई भी लगी हुई है। उत्तर बिहार में सीबीआई, डीआरआई व बिहार पुलिस की कार्रवाई के बाद जाली नोट के तस्करों में हड़कंप मचा हुआ है। बीते समय में डीआरआई ने 20 लाख के 1000 रुपये के नकली नोट मशरिकी चंपारण के पीपरा कोठी में दो दिसंबर को एक बस से बरामद किये थे। इसके साथ ही मग्रीबी बंगाल के मालदा के मोहनपुर रिहायसी अशरफुल आलम को गिरफ्तार किया गया था। एक दूसरी वारदात में पटना पुलिस और एसटीएफ ने जॉइंट कार्रवाई में पटना में 75000 रुपये के नकली नोट को बरामद किए थे। 13 दिसंबर को 10 लाख रुपये के जाली नोट के साथ 10 सेलफोन,10 पासपोर्ट और छह नेपाली सिम के साथ मशरिकी चंपारण के प्रमोद कुशवाहा को गिरफ्तार किया गया था। उसने कबूल किया था कि पाकिस्तान के रास्ते जाली नोट बिहार लाए गए थे।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

छोटे दल खेलेंगे बड़ा खेल

2013 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने है। जिसके लिए रणनीति बनाने में जहां कांग्रेस अपनी पूरी तैयारी में है वहीं भाजपा भी इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं इनपर भाजपा और कांग्रेस में लड़ाई होती रही है। बीते एक दशक में बसपा ने भी अपनी आमद दर्ज कराई है। इस बार के नगर निगम के चुनाव में जीत दर्जकर बसपा सबको चौका भी दिया है। लेकिऩ अब एक और दल उस मुकाबले में आ गई है वह आम आदमी की पार्टी। यानी तय है कि इस वर्ष मुकाबला चतुष्कोणीय है। कम से कम बनाने की तो कोशिश है। कांग्रेस और भाजपी की असली चिंता यही है कि आखिर कैसे बसपा और आप के प्रभाव को कम किया जा सके। जहां तक आंकड़ों की बात है तो दिल्ली में अनुसूचित जाति के 19 फीसदी, मुस्लिम 10 फीसदी, सिख 5 फीसदी, जाट 3 फीसदी और अन्य 14 फीसदी मतदाता हैं। इनमें से 50 लाक मतदाता बिहार-यूपी, झारखंड और उत्तराखंड के हैं। दरअसल, पूर्वांचल मतदाता ही इस बार कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकता है। ऐसा प्रतीत हो रहा है। जिसका ट्रेलर नगर निगम के चुनाव में देखा गया है। हालांकि, शीला दीक्षित अपनी ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती है। शीला दीक्षित ने एक बार फिर अपा मैनेजमेंट संभाल लिया है। शीला दीक्षित के लिए इस बरा सबसे बड़ा मुद्दा है अनियमित कॉलनियों को नियमित करना। उन्होंने घोषणा तो कर दी हैं लेकिन अभी तक वे कुछ नहीं कर पाई है। दिल्ली सचिवालय में अभी मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्री इस काम को पूरा करने में साफ दिख जाएंगें। शीला दीक्षित दिल्ली वालों के सुहाने सफर के लिए ईस्टर्न वेर्स्टन कॉरिडोर, पानी की सप्लाई के लिए मुनक नहर, केरोसीन फ्री दिल्ली, अन्न श्री योजना, गरीब महिलाएं के बैंक खाते और विकलांगों जैसी योजनाओं का प्रचार कर रही हैं ताकि जनता के बीच अभी सकारात्मक छवि पहुंच सकें। हालांकि इस बार समीकरण में कुछ बदलाव जरूर आया है। जिस प्रकार अन्य प्रदेशों में छोटी पार्टी अहम रोल निभा रही है, उससे बार-बार यह कहा जा रहा है कि इस बार छोटी पार्टियां अपना बड़ा रोल अदा करेंगी। दरअसल दिल्ली में बसपा ही एकमात्र पार्टी है जो अहम भूमिका में है। दिल्ली में अन्य पार्टियों में जो चुनाव के समय सक्रियता दिखाती है वह आईएनएलडी, राजद, जदयू, पीस पार्टी, अपना दल, एनसीपी, अकाली दल है। इस बार आप पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी अहम भूमिका में रहेगी। दिल्ली में छोटे दलों की चर्चा के पहले दो पार्टियों की चर्चा आवश्यक है वह है आप पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी। प्रोग्रेसिव पार्टी के अध्यक्ष जगदीश मंमगई हैं। वे पार्षद रह चुके हैं। भाजपा में रहे हैं और दिल्ली की पूरी जानकारी रखते हैं। इनकी खास बात यह है कि इनकी पार्टी दिल्ली आधारित पार्टी है। जगदीश मंमगई अरविंद केजरीवाल की तरह मीडिया में छाए रहने और होहल्ला में विश्वास नहीं करते हैं। जगदी मंमगई के आदर्श कांशीराम हैं जिन्होंने अपना मजबूत आधार बनाया। अपने कार्यकर्ता बनाएं जिसके बदौलत अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बना ली और जो पार्टी आज देश में अहम भूमिका में है। ममंगई भी लगातार दिल्ली में घूमघूमकर अपना जनाधार मजबूत करने में लगे हैं। इनका फास मानना है कि जो कांग्रेस और भाजपा से दुखी है वह अपना विकल्प ढूंढेगा और वह विकल्प प्रोग्रेसिव पार्टी देगी। इस रूप में इन्हें सफलता मिलता साफ नजर आ रहा है क्योंकि कांग्रेस सत्ता में है तो इसे सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा जबकि शहरी मतदाता भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के छिछालेदर से अवगत हो गया है। इसलिए ये मतदाता प्रोग्रेसिव पार्टी की ओर आएंगें ही । जगदीश ममंगई का अरविदं केजरीवाल के बारे में कहना है कि वे भले ही दिल्ली में अपनी गतिविधि चला रहे हैं लेकिन इनके साथ और वे खुध बाहरी है, जिससे चुनाव में इनका प्रभाव नहीं पड़ेगा। अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी की पार्टी बनाकर सीधे मैदान में आ गए हैं। इन्हें मीडिया भी खूब तरजीह दिया। भाजपा के मंच पर चढकर इन्होंने उसे भी रूलाया तो कांग्रेस पर आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, लेकिन चुनाव में सबसे अहम बात होती है सामाजिक समीकरण की। वह इनके पास जीरो है। इनका अभियान व्यवहारिक नहीं दिखता है चुनाव के खातिर। केजरीवाल के वोटर वे होंगे, जिनके लिए वोट फैशन है। ऊंचे वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के मतदाता इनके प्रभाव में हैं जिन्हें ये प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यह तो तय है कि दिल्ली में आम भूमिका में नहीं होगी आप पार्टी। हां यह भी तय है कि भाजपा को ही इनके आने से नुकसान होगा। प्रोग्रेसिव पार्टी आप पार्टी में अंतर यही है कि प्रोग्रेसिव पार्टी प्रत्येक मुहल्ले और आर डब्ल्यूए में जाकर अपने जड़ मजबूत करने में लगी है सामाजिक समीकरण समझने में लगी है तो केजरीवाल सीधे मीडिया से मजबूत होना चाहते हैं। दिल्ली में जो नेशनल पार्टी यहां छोटी भूमिका में हैं लेकिन अहम है, वह है बसपा। दिल्ली में 12 सीटे सुरक्षित सीटें हैं पहले यह 13 हुआ करती थी जो परिसीमन के बाद 12 हो गई। बसपा ने पिछले विधानसभा में दो सीटें जीती भी थी। अभी इनमें 10 सीट कांग्रेस के पास है। बसपा इऩ सीटों पर अपना प्रभाव छोड़ देती है। इऩ सीटों में भाजपा कहीं भी मुकाबले में नहीं है। यहां भी मुकाबले में भाजता तभी आती है जब बसपा कांग्रेस का वोट काट दें तो इसका फायदा भाजपा को मिल जाता है। यहां सामाजिक समीकरण समझने की जरूरत है। बसपा को दिल्ली में जाटव का वोट तो मिलता है लेकिन बाल्मिकी का नहीं। यह वोट केवल और केवल कांग्रेस को जाता है। जबकि यही बाल्किमीकी उत्तर प्रदेश में बसपा को वोट देता है। दिल्ली में बाल्मिकी वोट यहां पुराने समय से कांग्रेस से जुडा है जिसे बसपा भी नहीं तोड़ पाई है। नंदनगरी जैसे इलाकों में सुरक्षित सीट पर वोट कांग्रेस को मिलता है जिसका कारण बताया जाता है कि यहां झुग्गी झोपड़ी से सीधे कांग्रेस इन्हें बसा दिया है जिससे इनके मकानों की कीमत आसमान पर है। इसलिए इन क्षेत्रों में बुर्जुग सौ फीसदी कांग्रेसी है। भले ही युवा कुछ इधर-उधर हो जाएं। 12 सीटें जो सुरक्षित हैं उसमें दूसरी पार्टी ज्यादा अहम रोल इसलिए नहीं निभा पाती है क्योंकि यहां अन्य समुदाय के लोगों में उत्साह नहीं है क्योंकि अल्टीमेटली सुरक्षित सीट ही है। इसलिए यहां जो एक बार मजबूत हो गया है वही रहेगा। यह भी तय है। दिल्ली में बसपा में टिकट लेने की होड़ इसलिए रहता है क्योंकि टिकट के साथ अपना वोट बैंक भी देती है। बसपो को दिल्ली में 9 से 10 फीसदी वोट पड़ जाती है। यह पार्टी तीसरे नंबर पर तीन बार से रही है चुनावों में। सीमापुरी, मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी, सुलतानपुरी, भलस्वा, जहांगीरपुरी, पटपड़गंज, देवली और अंबेडकरनगर जैसे इलाकों में बसपा का प्रभाव है। अब बात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी की। दिल्ली में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का मतलब है रामवीर सिंह विधुरी। जो बदरपुर का प्रतिनिधित्व करते हैं। दो सीटें हैं इस पार्टी के पास एक बदरपुर तो दूसरा हरकेशनगर से। इनका दिल्ली में और कहीं जनाधार नहीं है। जो भी उम्मीदवार जीतकर इस पार्टी से आते हैं वह अपने बूते हीं। उन्हें पार्टी का चिह्न जरूर मिल जाता है जबकि पार्टी को नेशनल पार्टी बनने में सहायता इसके अलावे इनकी भूमिका नग्णय है। विधुरी इस पार्टी का अपने आवश्यकतानुसार उपयोग करते हैं। छोटी पार्टी में एक दल है राजद। जिसके सुप्रीमो लालू प्रसाद हैं। राजद ने पिछले विधानसभा में ओखला से एक सीट जीता है। राजग की साख बिहार में होने की वजह से ऐसा प्रतीत होता है कि उसे दिल्ली में बिहार वासियों का वोट बैंक मिलेगा। लेकिन यह तय है दोनों दिग्गज पार्टियां भाजपा औऱ कांग्रेस भी अपने-अपने उम्मीदवार ऐसे तय करते हैं जहां इनकी संख्या ज्यादा है वहां उम्मीदवार भी बिहार और यूपी के लोगों को देते हैं जिससे राजद जैसे दलों की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है। हां यह तय है कि राजद के कुछ समर्थक जरूर दिल्ली में हैं जो इनकी साख को मजबूत करने में लगे हैं लेकिन यह आसान नहीं दिखता। राजद की तरह जदयू भी अपनी उम्मीदवार दिल्ली में खड़ा करती है। जदयू के जो उम्मीदवार रहते हैं उसे ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार का समर्थन मिलेगा। लेकिन नीतीश राजनीति की बारिकियों को समझते हैं और दिल्ली में प्रचार के लिए नहीं आते। शरद यादव का तो खुद जनाधार कहीं नहीं है तो दिल्ली में कहां से मतदाताओँ को रिझा पाएंगे। इंडियन नेशनल लोकदल बाहरी दिल्ली नजफगढ़ इलाके में अपना वजूद एक सीट तक ही सीमित रखा है। दिल्ली के अंदर इनका प्रभाव न के बराबर है। हां इतना तय है कि नजफगढ़ इलाके में इनका प्रभाव चलता रहेगा जहां से अभी भरत सिंह विधायक हैं। आईएनएलडी अन्य इलाकों में विस्तार की भी योजना नहीं है। लेकिन छोटी पार्टी की लिस्ट में तो है ही। आउटर दिल्ली में लोकदल का प्रभाव भी रहा है वह चौधरी चरण सिंह की वजह से लेकिन फिलहाल किसी रोल में नजर नहीं आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश की दो और पार्टी है जो दिल्ली में अपना जगह तलाश रही है वह अपना दल और पीस पार्टी। अपना दल को भी तक कोई खास अहमियत यहां नहीं मिलने जा रहा है क्योंकि यहां जाति आधारित चुनाव न हो कर समुदाय आधारित चुनाव होते हैं। जबकि पीस पार्टी मुसलमानों की पार्टी कही जाती है इसमें वैसे मुसलमान टिकट के लिए आ जाते हैं जिन्हें कांग्रेस या भाजपा ने टिकट नहीं दिया हो। ताकि वे अपने बलबूते जीत दर्ज करा सकें। इनकी भूमिका भी यहीं तक है। जहां तक सपा की बात है तो इस बार सपा अपने उत्तर प्रदेश के जीत को दिल्ली में भुनाना चाह रही है। लेकिन उसे लगता है कि उसका प्रभाव यहां ज्यादा नहीं है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तीसरा मोर्चा पर काम कर रहे हैं उनका मानना है कि अगर इसी तर्ज पर दिल्ली में काम किया जाए तो दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा का वर्चस्व तोड़ा जा सकता है। बहरहाल, छोटी पार्टी चुनाव के पहले तक तो लगता है कि अहम भूमिका में रहती है लेकिन चुनाव के समय में दिल्ली जैसे इलाकों में अहम भूमिका में नहीं होती है क्योंकि वोटों का समीकरण कुछ इस प्रकार है। दिल्ली के समीकरण को समझें तो 37 फीसदी वोट कांग्रेस के पास हैं, 32 फीसदी वोट भाजपा के पास। उस 37 फीसदी वोट में कोई सेंध लगता है तो भाजपी की सरकार बन जाएंगी। यानी बाकी बचे 30 फीसदी वोट पर अन्य छोटे दल अपने पक्ष में कर लेते तो कुछ अहम भूमिका में आ सकते हैं जो कि लगता नहीं है।

नाम नहीं, आइडिया कहिए जनाब

इतिहास ने कई प्रभावशाली नेता देखे हैं, जिन्?होंने देश की जनता को आगे बढ़ाने में सकारात्?मक भूमिका अदा की। आपदा के समय उन्?होंने देश को संकट से उबारा। ऐसी ही एक आंधी गुजरात से उठी है, जिसने दिल्?ली में बैठे कई लोगों के होश उड़ा दिये हैं। उस आंधी का नाम है नरेंद्र मोदी। जब भ्रष्?टाचार की बात आती है तो आपको नरेंद्र मोदी की छवि पर एक भी दाग नहीं मिलेगा। यही कारण है कि मोदी हर मंच पर बेबाक बोलते हैं। यदि आप विकीलीक्?स के द्वारा किये गये खुलासों में देखें तो भारत में तमाम नेताओं की छवि को धूमिल करने के लिये हजारों प्रयास किये गये हैं। उनमें 100 से अधिक प्रयास तो सिर्फ मोदी की छवि को धूमिल करने के लिये हैं। कहते हैं अच्?छी राजनीति अच्?छी अर्थव्?यवस्?था नहीं होती, अच्?छी अर्थव्?यवस्?था अच्?छी राजनीति नहीं होती। यही कारण है कि एक राजनीतिक पार्टी का मकसद साम दाम दंड भेद किसी भी प्रकार से चुनाव जीतना होता है। आर्थिक मंदी के चलते कई बार राजनीतिक इच्?छाशक्ति भी समाप्?त हो जाती है। राजनीति में आने वाले लोगों में किसे राजस्?व की चिंता रहती है। ऐसे बहुत कम ही मिलेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी हैं, जिनके अंदर आर्थिक मामलों में कुशाग्रता हासिल है। आप ही देख लीजिये देश में कौन सा नेता है उनके अलावा जिसने फूड सिक्?योरिटी बिल का विरोध किया है। यह वो व्?यक्ति है, जिसने हमेशा जमीनी स्?तर पर सोचा और काम किया साथ ही अपनी गवर्नेंस से लोगों को चौंका दिया है। कांग्रेस से एकदम अलग हट कर देखें तो मोदी की ख्?याति का सिर्फ एक कारण है गुजरात में उनका प्रदर्शन। उनके नेतृत्?व में गुजरात का लोहा कई बड़े अर्थशास्?त्री मानते हैं। न्?यूज मैगजीन इक्?नॉमिस्?ट ने लिखा, "गुजरात में जिस तरह कई काम चल रहे हैं, वैसे भारत में बहुत कम दिखाई पड़ता है।" भारत की 5 फीसदी जनसंख्?या को समेटे हुए इस गुजरात में 16 फीसदी औद्योगिक आउटपुट और 22 फीसदी निर्यात होता है। पिछले दस साल में यहां की विकास दर दोगुनी हो गई है। कृषि विकास दर 10 फीसदी है, जबकि भारत 3 फीसदी पर अटका हुआ है। मोदी ने अपने शाासन में यहां के इंफ्रास्?ट्रक्?चर को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिजली की निरंतर सप्?लाई उद्योगों को बल देती है। नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन फिर भी जहां वो जाते हैं जनता उनकी ओर खिंची चली आती है। हाल ही में हैदराबाद की रैली ही ले लीजिये। कांग्रेस जहां तेलंगाना पर राजनीति कर रही है और तेलंगाना व सीमांध्रा के लोग एक दूसरे को मारने-काटने पर उतारु हैं, वहीं मोदी ने दोनों से अपील की कि हिंसा बंद करके एक साथ मिलकर शांतिपूर्वक राज्?य का बंटवारा करें। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस का मुद्दई बनने में कामयाब हो गये हैं। अभी तक भले ही कांग्रेस उनके बारे में कहती रही हो कि वे मोदी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं और मोदी उनके लिए कोई चुनौती नहीं हैं लेकिन जहां एक ओर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मोदी नाम की माला जपी तो कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह और केन्द्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद ने मोदी पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि मोदी कांग्रेस से बड़ा खतरा भाजपा के लिए हैं। बिहार में जदयू भाजपा गठजोड़ के टूटने के बाद कांग्रेस के तीनों दिग्गजों ने नरेन्द्र मोदी पर अलग अलग मौकों पर राजनीतिक हमला बोलते हुए जो कुछ कहा उससे एक बात तो साफ हो गई कांग्रेस के लिए मोदी मुद्दई नंबर एक हो गये हैं। और राजनीतिक रूप से नरेन्द्र मोदी की मंशा भी यही थी, इसीलिए अपने भाषणों में नरेन्द्र मोदी केन्द्र की कांग्रेस सरकार पर तीखे हमले करने से कभी पीछे नहीं रहते हैं। ऐसे में बरबस ही सवाल उठता है कि क्या मोदी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखकर कोई अपराध कर रहे हैं? क्या मोदी पीएम पद के लिए आवश्यक योग्यता नहीं रखते? क्या मोदी राष्ट्र और विकास विरोधी हैं? क्या मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश और जनता का कोई बड़ा नुकसान होने वाला है? ऐसे तमाम सवाल है जिनका सीधा जबाव देने की बजाय विपक्ष मोदी को व्यक्तिगत तौर पर कीचड़ उछालने, गोदरा कांड ओर फर्जी हत्याओं का आरोप उन पर लगाता है। पिछले कई सालों से सुरक्षा और जांच एजेसिंया मोदी के खिलाफ इन घटनाओं में शामिल होने के पर्याप्त और पुख्ता सुबूत ढूंढ नहीं पाई हैं। इन स्थितियों में विपक्ष का विरोध ऊपरी तौर पर दुष्प्रचार और दुर्भावना से ओत-प्रोत दिखता है। और जहां तक पार्टी के भीतर मोदी के विरोध की बात है तो स्वाभाविक तौर पर पीएम बनने की इच्छा पार्टी के कई दूसरे नेता भी पाले बैठे हैं फिर अगर मोदी पीएम पद के लिए प्रयासरत हैं तो इसमें बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं है।

तो खत्म होगा राज्यपाल का पद?

हाल ही में राज्यपाल के पद के राजनीतिक दुरुपयोग की लोकसभा में जमकर बवाल मचा। इसकी आलोचना करते हुए विभिन्न दलों के नेताओं ने इस पद को औपनिवेशक काल की विरासत बताया और इस संवैधानिक पद को समाप्त किए जाने की पुरजोर मांग की। जनता दल यू , तृणमूल कांग्रेस , समाजवादी पार्टी , राजद और बीजू जनता दल समेत अधिकतर दलों के सदस्यों की राय थी कि देश की आर्थिक हालत को देखते हुए राज्यपाल का पद आर्थिक ढांचे पर एक बोझ है और बदलते परिदृश्यों में इस पद की व्यावहारिकता की समीक्षा किए जाने की जरूरत है। इन दलों के नेताओं ने ‘राज्यपाल (उपलब्धियां, भत्ते और विशेषाधिकार) संशोधन विधेयक’ पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए राज्यपाल पद की कड़ी आलोचना की और राजभवनों को ‘सफेद हाथी’ करार दिया। राज्यपाल पद को बनाए रखने की स्थिति में अधिकतर दलों के सदस्यों ने संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशविरे के अनुसार ही राज्यपाल की नियुक्ति किए जाने संबंधी 1988 में गठित सरकारिया आयोग की सिफारिशों का अनुपालन किए जाने की पुरजोर मांग की। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए भाजपा के कीर्ति आजाद ने राज्यपाल के पद को राजनीति से परे रखे जाने, नियुक्ति में पारदर्शिता बरते जाने और इस संबंध में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा गठित सरकारिया आयोग की सिफारिशों का अनुपालन किए जाने पर जोर दिया। कीर्ति आजाद ने कहा कि सरकारिया आयोग समेत केंद्र राज्यों के संबंधों पर तीन आयोग और दो समितियां गठित की जा चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद राज्यपाल का पद दिनोंदिन विवादास्पद होता जा रहा है। उन्होंने दागदार व्यक्तियों को इस संवैधानिक पद पर नियुक्ति नहीं किए जाने का प्रावधान करने की भी मांग की। यदि हाल के वर्षों में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि के राज्यपालों की भूमिका पर पड़ताल की जाए, तो कहने में कोई संकोच नहीं होता कई बार राज्यपाल केंद्र सरकार नहीं बल्कि केंद्र में सत्तासीन दल के एजेंट विशेष के रूप में कार्य करते हैं। ऐसे में सवाल तो बनता ही है कि ऐसे सियासी दांवपेच के बीच राज्यपालों की भूमिका क्या होनी चाहिए? इस पर बहस तेज हो गयी है। हालांकि राज्यपालों की बयानबाजी और उनकी भूमिका को लेकर यह कोई पहली मर्तबा सवाल नहीं उठा है। गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल द्वारा लोकायुक्त के पद पर न्यायमूर्ति आरए मेहता की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठा था। मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक गया था। कर्नाटक में भी राज्य मंत्रिपरिषद से सलाह-मशविरा किए बगैर ही लोकायुक्त की नियुक्ति की गई। सच यह है कि कांग्रेस पार्टी जब भी सत्ता में रही है राज्यपालों का दुरुपयोग की है। साढ़े छह दशक का इतिहास बताता है कि वह गैरकांग्रेसी सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए राजभवन की ताकत का इस्तेमाल की है। वह संघ-राज्य संबंधों का बिल्कुल ख्याल नहीं रखती है। आज भी जिन राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें हैं वहां राज्यपालों की सक्रियता ज्यादा देखी जाती है।

बुधवार, 8 मई 2013

कितने हलाहल पीएंगे ‘शिव’!


सिद्धांतों का किया जा रहा है दरकिनार। जिस लक्ष्?य को लेकर भाजपा जनता के बीच पहुंची थी, उसमें भटकाव भी नजर आता है। इस भंवरजाल से भी भाजपा बाहर निकलने के लिए भीतर ही भीतर बेचैन हैं। अब कैसे निकलेगी यह तो वक्?त ही बताएगा? बेशक भाजपा मिशन 2013 को फतह करने के लिए कमर कस चुकी है, लेकिन पार्टी की आंतरिक गुटबाजी से कैसे पार पाएगा शिवराज? सुभाष चंद्र करीब तीन दशक की भाजपा धीरे-धीरे इस कदर अपना जनाधार बढ़ाती रही कि मध्य प्रदेश में बीते एक दशक से सत्ता में है। सत्ता का अपना चरित्र है। गुण-दोष है। लिहाजा, मध्य प्रदेश में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा इस दफा काफी संजीदा नजर आ रही है। इस संजीदगी का अहम कारण है - पार्टी का आंतरिक सर्वे, जिसने वरिष्ठ भाजपाइयों के चेहरे का नूर गायब कर दिया है। सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित भाजपा हाईकमान किसी भी सूरत में जोखिम मोल लेने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि चुनाव नतीजों को प्रभावित करने वाले प्रभावशाली (बाहुबलियों) से लेकर जातीय समीकरणों पर उसकी पैनी नजर है। स्वयं पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता दीपक विजयवर्गीय भी स्वीकारते हैं कि ये ऐसे दो कारक हैं, जो चुनाव को प्रभावित करते हैं। विजयवर्गीय का कहना है कि इनका सरकार की योजनाओं तथा उसके द्वारा जनहित में किए गए कामों से कोई मतलब नहीं होता है। इसीलिए इस तरह की जानकारी जुटाना पार्टी ने उचित समझा है। सरकार और संगठन के मुखिया की दिक्कत पार्टी में आंतरिक गुटबाजी को लेकर भी है। दरअसल, भाजपा ने चुनावी तैयारी के क्रम में 25 फरवरी से 20 मार्च तक महाजनसंपर्क अभियान चलाया था। इसका मकसद मतदान केंद्र तक अपनी पैठ बनाने के साथ ऐसी जानकारियां जुटाना था, जो चुनाव में उसके पक्ष और विपक्ष में जा सकती हैं। पार्टी ने इसके लिए मतदान केंद्र स्तर तक का ब्योरा तैयार करने के लिए एक प्रपत्र तैयार किया और जिला इकाइयों तक भेजा। पार्टी के प्रदेश मुख्यालय से तैयार इस प्रपत्र में 12 सवालों के जरिए जानकारी मांगी गई। पार्टी जानना चाहती है कि मतदान केंद्र स्तर पर उसके कितने सदस्य हैं, वहीं दूसरे राजनीतिक दलों की क्या स्थिति है? इस प्रपत्र में मांगी गई दो जानकारियां सबसे अहम है। पार्टी ने मतदान केंद्र स्तर पर प्रभावशाली लोगों के ब्योरे के साथ जातीय समीकरणों का भी ब्योरा मांगा है। यह जानकारी विधानसभा चुनाव और कांग्रेस और दूसरे दलों के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति बनाने को ध्यान में रखकर जुटाया जा रहा है। इस प्रपत्र के जरिए यह भी जानकारी जुटा रही है कि संबंधित मतदान केंद्र में किस दल के कौन से प्रमुख कार्यकर्ता हैं? आवासीय सोसायटी के पदाधिकारी और सदस्य कौन हैं? और तो और, कार्यकर्ताओं से मतदान केंद्र में पार्टी की जीत के लिए सुझाव भी मांगे गए हैं। साथ ही पिछले चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा, इसका भी जिक्र कार्यकर्ता को करना है। बताया जा रहा है कि इन प्रपत्रों के जरिए आई जानकारी के आधार पर ही पार्टी अपना चुनावी एक्शन प्लान तैयार कर सरकार से सहयोग लेगी, ताकि पार्टी के खिलाफ जा सकने वाले संकेतों को नियंत्रण में लिया जा सके। प्रदेश भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि पार्टी की आंतरिक सर्वे के बाद संगठन में यह बात उठने लगी है कि आगामी विधानसभा चुनाव में 90 विधायकों के फिर से चुनाव जीतने को लेकर संशय है। लिहाजा, संगठन के पदाधिकारी 70 से अधिक विधायकों को दोबारा उम्मीदवार न बनाने का मन बना रहे हैं। लेकिन पार्टी की दिक्कत यह है कि टिकट नहीं मिलने पर ये नेता समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी सरीखे खेमों में चले जाएंगे और भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर कभी भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, तो कई बार दिल्ली में कई वरिष्ठ नेताओं से सलाह मशविरा कर रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महासचिव रामलाल भी थावरचंद गहलोत, अनंत कुमार, प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष प्रभात झा आदि नेताओं से बातचीत कर रहे हैं। दरअसल, भाजपा को लगता है कि अगर मध्य प्रदेश में हैट्रिक लगानी है, तो कई कड़े फैसले लेने के साथ ही नए चेहरों पर दांव लगाकर युवा नेतृत्व को विकसित करना होगा, क्योंकि यह युग ही युवा शक्ति का है। यह चुनाव मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि शिवराज सिंह चौहान पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काफी भरोसा करती है। संघ के कई वरिष्ठ प्रचारक उन्हें नरेंद्र मोदी से बेहतर मानते हैं। संगठन से जुड़े नेता ने बताया कि भाजपा की विशेष नजर इस बार उन सीटों पर भी है, जहां हम पिछले चुनाव में हार गए थे। आदिवासी बहुल इलाकों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा ने जो कार्य किया, वह भी लोगों को बताया जाएगा। हारी हुई विधानसभा की सीटों पर सरकार की उपलब्धियों के जरिए जनमानस के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। पार्टी की ओर से एक टीम बनाने की बात हो रही है, जिसका मुख्य काम तमाम आयोजनों के जरिए विरोधी पार्टी कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की होगी। उल्लेखनीय यह है कि बीते छह अप्रैल को जब भोपाल में भाजपा का स्थापना दिवस मनाया गया, तो प्रदेश अध्यक्ष और सांसद नरेंद्र सिंह तोमर ने विधायकों की बैठक में कहा कि नई कार्यसमिति बनने के बाद ‘महा जनसंपर्क अभियान’ हमारा पहला कार्यक्रम था। इसका फीडबैक मन को संतुष्ट करने वाला रहा। उन्होंने कहा कि चुनावी वर्ष के दृष्टिकोण से पार्टी के हर कार्यक्रम को भव्यता प्रदान करें, ताकि ज्यादा से ज्यादा जनता पार्टी से जुड़ सके। ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्येक पंचायत एवं नगर क्षेत्र के वार्ड केंद्र तक आयोजन हों। तोमर ने सीधे तौर पर संगठन नेताओं से कहा कि हारी हुई विधानसभा सीटों पर मंत्री कार्यक्रम में उपस्थित हों, ताकि कोई भी क्षेत्र विकास पर्व से अछूता न रहे। विधानसभा क्षेत्रों में हुए विकास कार्यों पर केंद्रित होर्डिंग्स लगे। साथ ही होर्डिंग्स पर नेतृत्वकर्ता के साथ भाजपा और विकास नजर आए। इसी दौरान संगठन मंत्री अरविंद मेनन ने भी कहा कि महा जनसंपर्क अभियान के माध्यम से भाजपा सरकार ने गत नौ वर्षों में जो जनता के बीच पैठ बनाई है, उसका फीडबैक प्राप्त हुआ है। साथ ही अनुसुचित जाति वर्ग तक हम पहुंचे हैं। मध्य प्रदेश में अनुसूचति जाति वर्ग का 17 प्रतिशत मत है। इस वर्ग का कांग्रेस से मोह भंग हो चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि करीब तीन दशक से अधिक के सफर में भाजपा ने मध्य प्रदेश में अपनी जड़ें तो मजबूत की है, शाखाओं को भी ताकतवर बना लिया। कई आदिवासी क्षेत्रों में भी संघ की अच्छी-खासी दखल हो गई। प्रदेश में भाजपा के इस फैलाव में पार्टी के दिग्?गज नेताओं के साथ लाखों कार्यकर्ताओं का त्?याग, बलिदान और भागीदारी है। सबसे अ?हम भूमिका अदा करने वाले नेताओं में कुशाभाऊ ठाकरे, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, प्?यारेलाल खंडेलवाल, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, नारायण प्रसाद गुप्?ता सहित आदि शामिल हैं। त्?यागी और तपस्?वी ठाकरे ने तो अपने जीवन का अमूल्?य समय पार्टी को देकर न सिर्फ मध्?यप्रदेश में कई चेहरों को मुख्?यधारा के मैदान में उतारा और उन्?हें पार्टी नेतृत्?व भी सौंपा। उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान ने उसी मेहनत के फल में इजाफा किया। जानकारों का कहना है कि संघर्ष, जुझारूपन और लगातार सड़कों की लड़ाई लड़ने का जज्?वा लेकर भाजपा ने पहली बार 1990 में अपनी स्?पष्?ट बहुमत की सरकार प्रदेश में बनाई। यह सरकार ढाई साल का ही सफर तय कर पाई और उसके बाद राष्?ट्रपति शासन लग गया। फिर भाजपा को 1998 से 2002 तक संघर्ष का रास्?ता अपनाना पड़ा। हिं?दू ब्रांड नेता उमा भारती के नेतृत्?व में 2003 में फिर भाजपा की सरकार बनी। दूसरी बार 2008 में भी भाजपा ने अपना झंडा गाड़ा और अब तीसरी बार 2013 में भाजपा एक बार फिर तीसरी बार सत्?ता पर काबिज होने के लिए पूरी तरह से जोर-आजमाईश करने में लगी हुई है। अब नेतृत्?व मुख्?यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों में है, जो कि अपनी छवि के सहारे प्रदेश में फिर से सरकार बनाने के लिए न सिर्फ बेताब है, बल्कि उसके लिए सक्रिय भी हैं। सरकार बनेगी अथवा नहीं यह तो वक्?त ही बतायेगा, लेकिन फिर भी भाजपा ने अपने मिशन को गति तो दी है। यूं तो मध्?यप्रदेश भाजपा में गुटबाजी का बीजारोपण 90 के दशक में हो गया था, तब सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी आमने-सामने आ गए थे। जोशी के साथ पूर्व मुख्?यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा, रघुनंदन शर्मा, प्?यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्?ता एवं लक्ष्?मीनारायण शर्मा सहित आदि दिग्?गज हुआ करते थे, जबकि दूसरे गुट की अगुवाई पूर्व मुख्?यमंत्री सुंदरलाल पटवा के हाथों में होती थी। पटवा को आशीर्वाद कुशाभाऊ ठाकरे का रहा। यही वजह रही कि पार्टी पर पटवा की तूती बोलती रही है। धीरे-धीरे पार्टी की तस्?वीर बदली और गुटबाजी का रोग फैलता ही गया। इसके बाद 2005 में फिर भाजपा में बंबडर आया और उमा भारती को पार्टी से अलग होना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2011 में उमा की फिर वापसी हो गई। इसके साथ उमा भारती ने अपने आपको मध्य प्रदेश की राजनीति से दूर रखा। एक बार फिर वर्ष 2013 में भाजपा की राजनीति में उबाल आ गया है। इसकी वजह है उमा भारती को पार्टी का राष्?ट्रीय उपाध्?यक्ष बनाना है और दूसरी वजह पूर्व अध्?यक्ष्?ा प्रभात झा को भी उपाध्?यक्ष बनाना है। इन दोनों नेताओं को वर्तमान में विरोधी गुट का माना जा रहा है। यह नेता बार-बार कह भी रहे हैं कि वे पूरी तरह से गुटविहीन है, लेकिन किसी को विश्?वास नहीं हो रहा है। हालांकि, 8 अप्रैल को प्रदेश भाजपा कार्यालय में पार्टी के राष्?ट्रीय पदाधिकारी बने नेताओं के स्?वागत समारोह में भी सारे नेताओं ने एक स्?वर से यह कहा कि हम शिवराज के नेतृत्?व में हर हाल में सरकार बनाएंगे। काबिलेगौर है कि उमा भारती 7 साल बाद भाजपा कार्यालय पहुंची और प्रभात झा को जिस तरह से प्रदेश अध्?यक्ष पद से दरकिनार करके अलग किया गया था, वे भी फिर पार्टी कार्यालय पहुंचे। आशंका यह जाहिर की जा रही है कि उमा भारती अपनी कड़वी यादें आसानी से भुला नहीं पाएंगी, क्?योंकि उन्?हें भाजपा की राजनीति में भुला ही दिया गया था, जबकि प्रभात झा के साथ जो पर्दे के पीछे प्रतिघात हुआ है, उसका दर्द उन्?हें आज भी है, जिसे वे समय-समय पर बयां भी कर रहे हैं। आने वाले समय में प्रदेश भाजपा की राजनीति का ध्रुवीकरण हो जाए, हैरत नहीं होना चाहिए। इस पर पार्टी और सरकार की नजर तो है, लेकिन राजनीति में कब क्?या नया हो जाए, कोई कुछ नहीं कह सकता!

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

हजारों करोड़ का रोडमैप तैयार


मानव विकास से ही बिहार का युवा वर्ग और बच्चे अपनी क्षमता का विकास कर सकेंगे। बिहार आगे बढ़ेगा, लोग आगे बढेंगे। जरूरत इस बात की है कि सूबे को निरंतर प्रगति की राह पर आगे बढ़ाने के लिए मानव विकास मिशन को एक जनांदोलन का रूप दिया जाए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि विकास का मतलब गरीबों का उत्थान है और राज्य सरकार मानव विकास के लिए प्रतिबद्ध है। इसी सोच के तहत ‘मानव विकास मिशन’ की शुरुआत की गई। बीते दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में ‘मानव विकास मिशन’ के लिए बनी राज्य अनुश्रवण समिति की बैठक हुई, जिमसें रोड मैप पर मुहर लगी। इस पर 41 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। मकसद मातृत्व दर, शिशु मृत्यु दर व प्रजनन दर को कम करना, एनीमिया को नियंत्रित करना और लोगों को आर्सेनिक एवं फ्लोराइड मुक्त पानी पहुंचाना है। मिशन मानव विकास की चौथी बैठक में स्वास्थ्य प्रक्षेत्र के सभी मानकों को राष्ट्रीय औसत से ऊपर ले जाने पर चर्चा हुई। सरकार की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि पांच साल के रोड मैप पर खर्च होनेवाली राशि से 10 वर्षों का लक्ष्य हासिल किया जाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि मानव विकास से ही युवा एवं बच्चे अपनी क्षमता का विकास कर सकेंगे। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, शुद्ध पेयजल, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तीकरण, महादलित, अतिपिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग की विशेष पहल से ही मानव विकास सफल होगा। बिहार को प्रगति की राह पर निरंतर आगे बढ़ाने के लिए इसे जनांदोलन का रूप देने की आवश्यकता है। मिशन की चौथी बैठक में स्वास्थ्य ्रक्षेत्र में सुधार के लिए बनी उप समिति ने समिति के समक्ष प्रेजेंटेशन दिया। इसमें 6700 ममता की नियुक्ति की बात भी कही गई। मुख्यमंत्री ने इसे और बढ़ाने को कहा। साथ ही यह भी कहा गया कि बाल विवाह और लिंगानुपात को ठीक करने के लिए जीविका के तहत संचालित हो रहे स्वयं सहायता समूह और विद्यालयों का सहयोग लिया जाएगा। बैठक में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, पीएचइडी मंत्री चंद्रमोहन राय, स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे, शिक्षा मंत्री प्रशांत कुमार शाही, समाज कल्याण मंत्री परवीन अमानुल्लाह, आइटी मंत्री शाहिद अली खान, विज्ञान एवं प्रावैधिकी मंत्री गौतम सिंह, सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री वृष्णि पटेल, कला संस्कृति मंत्री प्रो. सुखदा पांडेय, मुख्य सचिव एके सिन्हा, विकास आयुक्त फूल सिंह, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अंजनी कुमार सिंह, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव अमरजीत सिन्हा सहित कई दूसरे विभागों के आला अधिकारी भी मौजूद थे। बताया जाता है कि मानव विकास मिशन में शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण, पिछड़ा व अति पिछड़ा, एससी-एसटी कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण, कला, संस्कृति व युवा विभाग, विज्ञान व प्रावैधिकी, योजना व विकास विभाग, श्रम संसाधन, सूचना व जन संपर्क एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को शामिल किया है। साथ ही इसके रोड मैप बनाने के लिए जनसंख्या संबंधी, स्वास्थ्य संबंधी, शिक्षा संबंधी, स्कील डेवलेपमेंट, पीने का पानी व सफाई, कला व संस्कृति एवं कमजोर व वंचित वर्ग से संबंधित कमेटी का विशेष योगदान रहा। दरअसल, जिन मामलों में बिहार राष्ट्रीय औसत से नीचे है, उन्हीं को लेकर प्रदेश में एक मानव विकास मिशन बनाया गया है। अब तक इसकी चार बैठक हो चुकी हैं। नीतीश सरकार का कहना है कि न केवल संयुक्त राष्ट्र संघ के मिलिनियम डेवलपमेंट गोल को हासिल किया जाएगा, बल्कि उससे आगे हम बढेंगे। दूसरी ओर, सच यह है भी है कि पिछले दस वर्षों में बिहार की आबादी में 25-26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यहां आबादी बढ़ने का सिलसिला ऐसे चलता रहा, तो वर्ष 2051 तक यहां की आबादी 20 करोड़ पहुंच जाएगी। बिहार का कुल क्षेत्रफल 94 हजार वर्ग किलोमीटर है और यहां एक वर्ग किलोमीटर में 1100 लोग वास करते हैं। नीतीश सरकार ने जनसंख्या घनत्व के इस दबाव को बिहार के लिए एक गंभीर मसला माना है और इच्छा जताई है कि उसे कम करना होगा। सच तो यह भी है कि ग्लोबल इकनॉमिक स्लो डाउन और देश में कम होती घरेलू मांग के बावजूद बिहार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 11.95 फीसदी की दर से प्रगति की थी, जो देश के अन्य राज्यों में सबसे ज्यादा रहा था। बिहार के लिए 2012-13 का इकनॉमिक सर्वे विधानसभा में पेश करने के बाद उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बिहार के आर्थिक विकास की दर 11.95 फीसदी रही, जो देश के अन्य राज्यों में सबसे ज्यादा है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर बिहार में प्रति व्यक्ति आय 25,653 रुपये है, जबकि राष्ट्रीय औसत 60,972 रुपये है। 2011-12 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय स्तर पर तुलना में 42 फीसदी हो गया, जबकि 2007-08 में यह 32.4 फीसदी था। यह सर्वे बिहार की अर्थव्यवस्था की अच्छी तस्वीर पेश करता है। यह अच्छी आर्थिक नीतियों का नतीजा है। राज्य न हर क्षेत्र में प्रगति की है।