सोमवार, 29 जून 2009

माओवादियों के चपेट में समलैंगिक


इंसानी जिंदगी के बदलते तौर-तरीकों को वक्त के साथ-साथ समाज और कानून में मान्यता मिल जाती है , लेकिन सेक्सुअल पसंद में आ रहे बदलावों पर कई देशों का कानून और समाज दोनों ही चुप हैं। आखिर क्यूं ? होमोसेक्शुऐलिटी एक ऐसा मुद्दा है , जिसके बारे में बात करना अमूमन पसंद नहीं किया जाता। इंसानी फितरत है कि अगर किसी चीज पर रोक लगाई जाए , तो वह उसके खिलाफ जाने की कोशिश करता है। इसी का नतीजा है कि नेपाल में अक्सर गे और लेस्बियन जोड़ों के घरों से भाग जाने के केस सामने आते हैं। कई बार तो समाज की प्रताडऩा से बचने के लिए वे लोग आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। इसके बावजूद अभी तक सरकार द्वारा इस बारे में कोई पहल सामने नहीं आई है। गत वर्षों में नेपाल नरेश ज्ञानेन्द्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण वाली सरकार और नयी बहुदलीय सरकार की नाराजगी झेलने के बाद अब नेपाल का समलैंगिक समुदाय माओवादियों के हत्थे चढ़ गया है। जब माओवादी सत्ता पर काबिज थे तो उन्होंने समाज को साफ-सुथरा बनाने के नाम पर समलैंगिकों के खिलाफ सख्ती बरतनी शुरू कर दी, जो आज भी बदस्तूर जारी है। सत्ता में आने से पहले भले ही पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के साथ समझौते के बाद जब माओवादियों के लिए बेरोकटोक घूमना आसान हो गया ,वे अपने लिए नयी भूमिका तलाशने लगे । समाज को प्रदूषित करने वालों की खबर लेने लगे। जो पहले जनता की नजरों में अपराधी तो वे अपनी छवि सुधारने की जुगत में समाज को स्वच्छ रखने का ठेका लेने लगे। जब से माओवादियों का सरकार से समझौता हुआ और उन पर से आतंकवादी होने का ठप्पा हटा , उन्होंने समाज के कथित प्रदूषकों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया । उनके इस अभियान की गाज पोर्नोग्राफिक फिल्मों का धंधा करने वालों से लेकर समलैंगिकों सभी पर गिरी है। जब नेपाल नरेश के प्रत्यक्ष शासन के खिलाफ माओवादियों और राजनीतिक पार्टियों ने झंडा बुलंद किया था, तब काठमांडु के समलैंगिकों ने भी इसमें उनका साथ दिया था। तब उन्हें यह भरोसा था कि व्यवस्था बदलने के साथ ही उनके भी दिन फिर जाएंगे, लेकिन सत्ता के करीब आते ही माओवादियों ने उनके खिलाफ अभियान तेज कर दिया है।

हालात इस कदर हो गए कि माओवादियों ने नेपाल के तमाम मकान मालिकों को चेताया दिया कि वे महिला और पुरुष समलैंगिकों को अपने घरों में रहने की इजाजत नहीं दें। जो भी मकान मालिक इन तत्वों को अपना मकान किराए पर देगा, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस नए फरमान के बाद समलैंगिक समुदाय के लोगों ने काठमांडु घाटी में पूर्व माओवादी कमांडर सागर से मुलाकात की और उनसे यह अभियान रोकने की अपील की। बकौल सागर, 'हम समाज के किसी भी वर्ग के खिलाफ नहीं हैं। हम ऐसे लोगों के खिलाफ हैं जो अपनी गलत हरकतों से समाज को प्रदूषित कर रहे हैं।Ó बताया जाता है कि समलैंगिकों के अधिकारों की लड़ाई लडऩे वाले ब्लू डायमंड सोसायटी के अधिकारियों ने पिछले महीने एक वरिष्ठ माओवादी नेता देब गुरुंग से मुलाकात की थी। कहा जाता है कि माओवादी नेता ने इन्हें स्पष्ट बताया कि देश में समलैंगिकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

दूसरी तरफ कुछ ऐसी खबरें भी आ रही है कि माओवादियों में समलैंगिक प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बेशक यह माओवादियों के कमांडरों के लिए चिंता की बात है। नेपाल में समलैंगिकों के लिए काम करने वाली संस्था ब्लू डायमण्ड सोसायटी ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि माओवादी विद्रोहियों में 'होमोसेक्सुअलÓ होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। दूसरी ओर वरिष्ठ माओवादी इसलिए चिंतित हैं कि उन्हें लगता है कि समलैंगिक होना पूंजीवाद की देन है। यह खबरें उस वक्त आनी शुरू हुई जब माओवादियों और सरकार के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ था। इसके तहत माओवादियों के हथियार जमा करा लिए गए और उन्हें कई शिविरों में रखा गया जिसकी निगरानी नेपाल सरकार, संयुक्त राष्ट्र और माओवादी साझा तौर पर कर रहे थे।

अमूमन पड़ोसी मुल्क भारत के अधिकत्तर क्रियाकलापों का प्रत्यक्ष और परोक्ष परिणाम नेपाल को प्रभावित करता रहा है। ऐसे में नेपाली समाज का एक तबका का मानना है कि अभी तक हमारे समाज में इस सेक्सुअल कल्चर को लेकर एक रहस्यमय माहौल रहा है। इस कल्चर में किशोर-किशोरी के बीच संबंध, समलैंगिकता जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन मुद्दों में खुली बाचतीत करने के लिए हमारा समाज कभी तैयार नहीं हुआ। जब भारत में कुछ दिन पूर्व बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा होमोसेक्शुऐलिटी के मुद्दे कहा गया कि वक्त के साथ सामाजिक ढांचे में काफी बदलाव आ गया है , जिससे लोगों की सेक्सुअल पसंद चेंज हो गई है। इसे अननैचरल नहीं माना जाना चाहिए। अब वह वक्त आ गया है , जब करीब एक सेंचुरी पहले बने कानूनों पर दोबारा से विचार किए जाने की जरूरत है। गौरतलब है कि फिलहाल भारत में धारा 377 का उल्लंघन करने पर 10 साल की सजा का प्रावधान है।

दरअसल, नेपाल का समाज रुढि़वादी और धार्मिक है जहां सार्वजनिक तौर पर समलैंगिक पुरुष और महिलाएं नहीं दिखते हैं। समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ब्लू डायमंड सोसाइटी का कहना है कि समलैंगिक होने का आरोप लगा कर लोगों को पीटे जाने की ख़बरें बढ़ रही हैं। हाल ही में मानवाधिकार पर आयोजित कार्यशाला में माओवादी महिला संघ की प्रमुख ने समलैंगिकता को 'अप्राकृतिकÓ और 'समाज में गंदगी फैलाना वालाÓ बताया। एक अन्य माओवादी नेता का कहना था कि समलैंगिकता पूंजीवाद की देन है और यह समाजवादी समाजों में नहीं पाया जाता। नेपाल में कम ही ऐसे नेता हैं जो इस विषय पर बात करते हैं। नेपाल के क़ानून में अप्राकृतिक संबंधों पर पाबंदी है लेकिन इसके दायरे में क्या क्या आता है, इसकी व्याख्या नहीं की गई है। और तो और, माओवादियों का अपना 'लीगल कोडÓ भी इस विषय पर चुप्प है। ऐसे में ब्लू डायमंड सोसाइटी ने मांग की है कि जब अगले साल नेपाल का संविधान बनेगा तब उसमें समलैंगिकों के अधिकारों को भी शामिल करना चाहिए जैसा की दक्षिण अफ्रीका में हुआ है। बेशक, डेनमार्क , फ्रांस , जर्मनी , इटली , रूस और यूनाइटेड किंगडम समेत यूरोप के ज्यादातर देशों में होमोसेक्शुऐलिटी के खिलाफ कोई कानून नहीं है। स्पेन , बेल्जियम , नीदरलैंड , साउथ अफ्रीका , कनाडा और हाल ही में नॉर्वे समेत दुनिया के 6 देश गे मैरिज को मान्यता भी दे चुके हैं। मगर नेपाल के समलैंगिक आज भी अपने वजूद के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

शनिवार, 27 जून 2009

अकेले हम, अकेले तुम

पिछले कुछ वर्षों से अच्छी नौकरी के लिए भारतीयों का विदेश जाना शगल में शुमार हो चुका है। अच्छी तनख्वाह, ऊंचे ओहदे और अति-आधुनिक जीवनशैली। यही चाहत अधिसंख्य की रहती है। बाह्य आवरण में तो यही दिखता है लेकिन यथार्थ के धरातल पर इसके दूसरे रूप में होते हैं। जो अवसाद, मानसिक यंत्रणा, अकेलापन आदि से जुड़ा होता है। विशेषकर प्रवासी महिलाओं को। बाजारवाद के चंगुल में आकर वे एकाकी हो जाते हैं। सिर्फ भावना के स्तर पर वे अकेले नहीं होते हैं, बल्कि हारी-बीमारी में भी वे अकेले होते हैं। मदद के लिए उठने वाले हाथ कम रहते हैं। एक तो लोग लगातार असामाजिक होते जा रहे हैं, ऊपर से संवेदना का ह्वास हो रहा है।
दरअसल, यह सच है विकसित या अर्ध विकसित देशों में जाकर बसे प्रवासी भारतीयों का, जिसकी अभिव्यक्ति अभी बस शुरू ही हुई है। विदेशी धरती पर जहां की जुबान अलग होती है, संस्कृति अलग होती है और लोग भी बिल्कुल अलग होते हैं, वहां उनका एडजस्ट होना एक समस्या बन जाती है। दूसरे दुनिया के विकसित देशों, खास कर अमेरिका वगैरह में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद महंगी हैं, जिन्हें एक आम प्रवासी भारतीय अफोर्ड नहीं कर सकता है। एक आदमी की कमाई पर चार-पांच लोगों के परिवार को पालन भी आसान नहीं होता है। जो रकम भारत के हिसाब से ज्यादा दिखाई देती है, वह वहां के लिए काफी कम हो जाती है। इस मजबूरी की वजह से भी युवाओं को अपने मां-बाप को भारत में ही छोडऩा पड़ता है। वैसे अब इस भावनात्मक अलगाव ने युवाओं को वापस लौटने के लिए प्रेरित किया है और दुनिया के हर देश से प्रवासी भारतीय लौटने लगे हैं। दूसरी समस्या सामाजिक असुरक्षा की है। कभी नस्लीय भेदभाव के आधार पर तो कभी घर के अंदर ही वे हिंसा के शिकार होते हैं। महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है। जिसका चित्रण दीपा मेहता ने अपनी फिल्म 'विदेशÓ में किया है। फिल्म विदेशों में रहने वाली भारतीय महिलाओं पर किए जाने वाले घरेलू हिंसा पर आधारित है। अमूमन घरेलू हिंसा के मुद्दे को प्राय: अन्य समुदायों की भांति, दक्षिण एशियाई देशों में दबा दिया जाता है। लेकिन न्यू यॉर्क शहर की एक गैर-लाभ संस्था विदेश में सताई हुई व बेसहारा महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लिए कृत-संकल्प है। 'सखीÓ अर्थात महिला मित्र की स्थापना 1989 में पाँच दक्षिण एशियाई महिलाओं द्वारा की गई। ये महिलाएं एक दूसरे से मिली क्यों कि इन्होंने अनुभव किया कि न्यू यॉर्क शहर में प्रवासी दक्षिण एशियाई आबादी पर घरेलू हिंसा के मुद्दे, जिस पर विचार नहीं हो रहा, पर विचार करने की तुरन्त जरूरत है। इसकी निदेशक सदीप बथाल हैंं। बथाल घरेलू हिंसा को गाली-गलोज युक्त व्यवहार के सदृश मानती है जिसमें एक साथी दूसरे की तुलना में भय, धमकी व नियंत्रण के माध्यम से शक्तिशाली स्थिति में होता है। जहां सभी सांस्कृतिक परिवेश की महिलाएं घर में र्दुव्यवहार झेलती हैं।
अनेक दक्षिण एशियाई मामलों की दूसरी विशेषता यह है कि महिला पर उसके ससुराल वालों, उसके पति सहित पारिवारिक ब्यक्तियों द्वारा जुल्म हो सकता है और इसी प्रकार की मानसिकता लिए वह यूरोपीय देशों में भी जीना चाहते हैं।
बथाला बताते हैं, ' एक प्रकार से, ससराल वालों व परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा किया गया जुल्म दक्षिण एशियाई समाज में सयुक्त परिवार/ बृहत्तर परिवार के महत्व के कारण और भी पेचीदा हो सकता है। शिकागो में रह रही माला, 28, के साथ उसका बच्चा पैदा होने तक सब कुछ ठीक चल रहा था, तब उसकी सास ने उनके पास आने व साथ रहने का निर्णय किया। उसके बाद, उसकी जिन्दगी भयंकर स्वप्न के समान हो गई। माला की सास ने उसको शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी जब कि उसका पति इन यातनाओं को चुपचाप देखते रहता। तब उसका पति एक दिन, अपने साथ महत्वपूर्ण कागजात, धन और यहां तक कि माला के विवाह के गहने लेकर चले गया। वह मेरे 3 माह के बेटे को बच्चे को सम्भालने वाले से भगाकर अपने माता-पिता के पास रहने लगा। मैं अपने बच्चे को वापस लेने में सफल रही व सखी के पास आ गई। सखी के कर्मचारी के साथ मैं न्यायालय संरक्षण का आदेश लेने गई। अकेले परिवार-न्यायालय जाना खतरे का काम है और सखी के कर्मचारी ने सारी वैधानिक प्रक्रिया के दरमियान मेरी पूरी सहायता की। उन्होंने मुझे वकीलों के सम्पर्क में रखा तथा सतत अपने पांव पर खडे होने में मेरी मदद की, माला याद करती है।
सच तो यह भी है कि विदेशों में महिलाएं विविध परिवेशों से आती हैं। उन्हें वहां के परिवेश से सामंजस्य बिठाने में समय लगता है। सामाजिक ताना-बाना अलग रहता है तो पुरूषों की कार्यसंस्कृ ति भी एकदम जुदा होती है। अमूमन जो भी प्रवासी होते हैं वह अधिक से अधिक धन अर्जित करने को तत्पर होते हैं और उसी प्रक्रिया में परिवार बिखरता चला जाता है। संवेदनाएं छिजती जाती है। सखी के ऑंकड़े बताते हैं कि जुल्म के शिकारों में सबसे अधिक ंसंख्या प्रथम-पीढी की प्रवासी महिलाओं की होती है । यह महिलाएं अपने सीमित साधनों के कारण सर्बाधिक आघात-सुगम होती हैं।
वैसे दो दशक से ज्यादा हो गए, ''जब चि_ी आई है वतन से चि_ी आई है...ÓÓ गाना 'नामÓ फिल्म में दिखाया गया था। उसमें एक प्रवासी भारतीय की मां, बाप, बहन और पत्नी की पीड़ा का सजीव चित्रण किया गया था। वह फिल्मी पीड़ा अब यथार्थ में बदल गई है। देश के हर शहर, कस्बे और गांव में आज अपने बेटे का इंतजार करते मां-बाप हैं, भाई-बहन हैं और सात समन्दर पार उन्हीं की तरह भावनात्मक खालीपन लिए एकाकी जीवन बिता रहे उनके प्रियजन हैं। अपनों से अलगाव का दर्द दोनों तरफ है। भावात्मक खालीपन दोनों ओर है। लेकिन एक तरफ है आर्थिक स्वतंत्रता और उन्मुक्त जीवन शैली तो दूसरी ओर है आर्थिक निर्भरता, असुरक्षा की चिंता और कई किस्म के सामाजिक दबाव। इन सबके बीच जीवन बिता रहे बुजुर्गों की बातों में इस बात का गर्व तो आपको हर समय मिल जाएगा कि उनके बेटे-बहू या बेटी-दामाद विदेश में रहते हैं। अगर वे अमेरिका या ब्रिटेन में रहते हों तो यह गर्व थोड़ा बढ़ भी जाता है। लेकिन उनसे पूछिए कि क्या यह गर्व उन्हें किसी किस्म की खुशी भी दे रहा है? आर्थिक रूप से थोड़ी संपन्नता जरूर आ जाती है लेकिन इसके साथ ही आती हैं कई किस्म की समस्याएं। प्रसिद्घ समाजशास्त्री श्रीनिवासन के अनुसार, 'आज का समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव का पहला शिकार हुआ है परिवार। संयुक्त परिवार की अवधारणा लगभग खत्म हो गई है। एकल परिवार के बाद अब हम न्यूक्लियर परिवार की अवधारणा के साथ जी रहे हैं। ऐसे में अगर बच्चे अपने मां-बाप को छोड़ कर पलायन कर जाते हैं (चाहे यह पलायन अंतर्देशीय हो या अंतरराष्ट्रीय) तो मां-बाप के सामने बड़ी समस्याएं आती हैं। इसमें स्वास्थ्य की समस्याओं को सबसे ऊपर रख सकते हैं। बढ़ती उम्र में उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच और चिकित्सा की जरूरत होती है। लेकिन जिनके बच्चे बाहर हैं उन्हें इसके लिए भी दूसरों का मोहताज होना पड़ता है। भावनात्मक अकेलापन शारीरिक पीड़ा को ज्यादा बढ़ा देता है।Ó
असल में भारत में यह समस्या इसलिए भी बहुत ज्यादा है क्योंकि पारंपरिक रूप से भारत में माता-पिता को साथ रखने और उनकी सेवा करने का चलन रहा है। आखिर श्रवण कुमार का देश है यह। भारत में भी प्रवासी भारतीयों के बुजुर्गों ने इसका रास्ता खोज निकाला है। केरल से लेकर आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब तक प्रवासी भारतीयों के माता-पिता अपना संगठन बना रहे हैं। पैरेंट्स एसोसिएशन ऑफ एन.आर.आई. का विस्तार हो रहा है। ऑल इंडिया बॉडी के रूप में एसोसिएशन ऑफ पैरेंट्स ऑफ इंडियन रेजिडेंट्स ओवरसीज (ए.पी.आई.आर.ओ.) का गठन हुआ है। इन संगठनों ने उन जरूरतों की पहचान की है, जिनका सामना बुजुर्गों को रोजमर्रा की जिंदगी में करना होता है। सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के अलावा, स्वास्थ्य जरूरतें, वित्तीय आश्वस्ति, विदेश यात्राओं के इंतजाम आदि ऐसे मसले हैं, जिन पर ये संगठन बुजुर्गों की मदद करते हैं। तनाव दूर करने के उपाय इन संगठनों के द्वारा किए जाते हैं और भावनात्मक खालीपन को दूर करने के लिए भी ये संगठन काम करते हैं। लेकिन इन संगठनों के द्वारा किए जाने वाले उपाय तात्कालिक हैं। यह संक्रमण का दौर है।

सोमवार, 15 जून 2009

दिल्ली में है सरकार ?

देश की राजधानी - दिल्ली। सत्ता और शक्ति का केन्द्र - दिल्ली। केन्द्र के अलावा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का मुख्यालय और प्रधानमंत्री के अलावा एक मुख्यमंत्री भी। यानी दोे सरकारोेेें से शासित - दिल्ली। मगर कानून व्यवस्था - सिफर। अपराध की प्रयोगशाला बन चुकी दिल्ली अपराधों के हिसाब से देश की सर्वाधिक असुरक्षित जगह है। लगता है शीला दीक्षित और मनमोहन सिंह की सरकार ने बिहार में कानून का राज स्थापित होने के बाद दिल्ली को जंगल राज का दर्जा दिलाने का बीड़ा उठा लिया है। यह भले ही सहयोगी लालू यादव को खुश करने के लिए उनकी परम्परा का अनुसरण नहीं हो लेकिन राजधानी में बढ़ते अपराध को देखते हुए सबकी जुबान पर यही सवाल है कि क्या दिल्ली में है भी कोई सरकार ?
व्यवस्थाहीनता से ग्रस्त दिल्ली में असुरक्षा के साथ ही हर तरह की समस्याओं का अंबार है। प्रशासकीय अमला कहीं भी प्रभावी नजर नहीं आता। भ्रष्टाचार का बोलबाला हर सरकारी विभाग में इस हद तक है कि मानो यह भी सरकारी नियमावली का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया हो। लालफीताशाही ने एक नई मिसाल कायम कर ली है। रिश्वत के बिना तो किसी काम की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सड़क पर परिवहन व्यस्थापन पूर्णतः लचर साबित हुई है। तमाम नियम - कानून, आदेश - अध्यादेश सरकारी फाइलों में धूल फाॅंक रहे हैं। ’आपके लिए आपके साथ सदैव’ की उद्घोषणा करने वाली दिल्ली पुलिस का नाम ही शरीफ लोगों के बदन में सिहरन पैदा करने के लिए काफी है। दिल्ली पुलिस की छवि ‘भरी जेब खुले हाथ के साथ - सदैव‘ वाली बनी हुई है। वह भी तब जब केन्द्र और राज्य दोनों जगह ‘आम आदमी के साथ‘ वाली पार्टी की सरकार है।
आपराधिक घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि की खबरें प्रायः प्रतिदिन मीडिया में पढ़ने - सुनने को मिलती है। कभी 60 से भी अधिक उम्र की महिला के साथ ब्लात्कार तो कभी नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म। इन अपराधों में क्या अपराधी, क्या पुलिसकर्मी या शिक्षक कोई पीछे नहीं रहता। इतना ही नहीं, 12-13 साल के अबोध बच्चों के द्वारा दिल दहलाने वाले कातिलाना अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि पुलिसवालों पर भी हमला करने से वे नहीं हिचकते। लचर राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति तथा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पुलिस तंत्र अब अपराधियोें से लड़ने का नैतिक हौसला भी खोता जा रहा है। हो भी क्यों न ! जब पुलिस के बीट और थाने तक बिकाऊ हैं और ‘कमाऊ जगह‘ पर बहाली के लिए कथित रुप से पुलिसकर्मियों को रिश्वत देनी पड़ती है तो ऐसे में उम्मीद ही क्या किया जा सकता है ? तभी तो पुलिस थानों के अगल बगल से लेकर व्यस्ततम सड़कों,, चलती वाहनो और सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण समझे जाने वाले बैंकों तक अपराधी बहुत आराम से हत्या, लूट, अपहरण और ब्लात्कार जैसी संगीन घटनाओं को अंजाम देने में अपराधियों को खास दिक्कत नहीं होती। मजे की बात यह है कि अधिकांश मामलों में अपराधी दिन दहाड़े इन वारदातों को अंजाम देकर गायब हो जाते हैं और हाथ मलती रह जाती है पुलिस।
दिल्ली पुलिस को आॅंकड़ों मेें हर साल अपराध की संख्या कम दिखाने में खासी मशक्कत करनी पड़ती है। पहले जब दिल्ली सरकार और पुलिस के आला अधिकारियों को महसूस हुआ कि दिल्ली में अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है तोे अपराधियोें पर अंकुश लगाने के बदले यह दलील दी जाने लगी कि चूॅंकि सरकार और पुलिस प्रशासन ने सभी मामलों में एफआईआर दर्ज करने की पहल की है इसीलिए आॅंकड़े ज्यादा दिख रहेेेेे हैं। सरकार की लापरवाही और पुलिस की अकर्मण्यता का ही परिणाम रहा कि आज राजधानी में अपराध बेलगाम हो गया है और अब पुलिस एफआईआर दर्ज करने के नाम पर भी भड़कने लगी है। शिकायतकर्ता को उल्टे पाॅंव लौटाने में पुलिस का जवाब नहीं है। अब तो एफआईआर लिखाने के लिए भी पैरबी और रसूख का सहारा लेना पड़ता हैै। रिश्वत की चाश्नी में डूब कर ही काम करने की आदी हो चुकी दिल्ली पुलिस का आलम यह है कि वह पीड़ित पक्ष और शिकायत कर्ता को भी नहीं बख्शती। इतना ही नहीं कई बार तो शिकायतकर्ता और प्रत्यक्षदर्शी को ही पुलिस ऐसेेेेेे फंॅसा देती है कि वह पुलिस का नाम सुनते ही सहम जाता है। यहाॅं समस्त नियम कानून और प्रशासनिक निकाय कुछ बड़े और प्रभावशाली लोगों की बांदी बनकर रह गई है।
दिल्ली में अव्यवस्था और कानून की धज्जी सरेआम उड़ते देखने के लिए मात्र किसी नजदीकी सड़क पर आने की आवश्यकता है। ट्रैफिक के तमाम नियम जहाॅं कराह रहे होते हैं वहीं ट्रैफिक वाले या तो निर्विकार भाव से अपनी ‘ड्यूटी‘ निभाते या फिर किसी गाड़ीवाले से ‘वसूली’ करते देखे जा सकते हैं। ट्रैफिक का आलम यह है कि निर्धारित लेन में गाड़ियों को चलते देखना मुश्किल है। दूपहिया वाहन तो फुटपाथों पर इस फर्राटे से चल रहे होते हैं कि पैदल यात्रियों का चलना दूभर हो गया है। व्यस्त समयों में बीस मिनट के सफर के लिए घंटा भर का समय कम पड़ जाता है। राजधानी में टैªफिक की यह स्थिति तब है जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं देश की टैªफिक के हाल पर चिन्ता जता चुके हैं। राजधानी की रक्त रंजित सड़के वाहन चालकों के लिए खूनी सैरगाह बनी हुई है, जहाॅं वे मानों कभी भी किसी को गाड़ी से रौंदने का लाइसेंस लेकर चलते हैं। पहले रेड लाइन बसों ने सड़कों पर अपना कहर ढ़ाया था अब उसकी जगह ब्लू लाइन बसों ने ले ली हैं। प्रतिवर्ष सैकड़ों लोगों की जान लेने और हजारों परिवारों से रोजी रोटी छिनने के बाद भी अगले ‘शिकार‘ की तलाश में यह दिल्ली की सड़कों को बेखौफ रौंदती फिर रही है। एक ही स्टैंड पर देर तक खड़ा रखना, यात्रियों से बदसलूकी और मार पीट और गाड़ी में जेबकतरों को संरक्षण देना ब्लू लाइन और आरटीवी वालो का शगल बन चुका है। दिल्ली की सड़केें यात्रियों के लिए कितनी असुरक्षित बन चुकी है इसकी मिसाल है तिपहिया वाहन चालको द्वारा सवारी संग लूटपाट और महिला यात्रियों से की गई ब्लात्कार की घटनायें। पर ऐसी कितनी घटनायें प्रकाश में आ पाती हैं ?
दिल्ली यूॅं तोे किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं रह गया है उसमें भी महिलाओं स्थिति तो और भी दयनीय है। अपहरण और ब्लात्कार की घटनाओं में लगातार ईजाफा हो रहा है। अबोध बच्चियों से लेकर उम्र के चैथे पड़ाव तक पहॅंच चुकी महिलाएॅं ब्लात्कार की शिकार होती रही हैं। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चलती वाहनों से लेकर हाॅस्पीटल तक में महिलाएॅं इस घृणित अपराध का शिकार होती रही हैं। विद्यालयों तक में छात्राएॅं अपने ही शिक्षकों के हवस का शिकार हुई हैं। हालात इस हद तक गंभीर हो चुका है कि अपने मित्रों या परिजन के साथ घर से निकली महिला कब अपहरण या ब्लात्कार अथवा दोनों का शिकार हो जाय, कहना मुश्किल होे गया है। पुलिस की मुस्तैदी का आलम यह है कि किसी भी संगीन घटना की सूचना 100 नम्बर पर देने के बाद भी वह घटना स्थल पर कभी भी घंटे भर से पहले नहीं पहुॅंच पाती चाहे वारदात की जगह कितनी ही नजदीक क्यों न हो। लम्बी कानूनी प्रक्रिया भी पुलिस और अपराधी दोेेेेेेनो के मुफीद ही साबित हुई हैं। बुजुर्ग नागरिकों को सुरक्षा और सम्मान देना प्रत्येक सभ्य समाज का दायित्व होता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तोेेे यह एक खास धरोहर है। सरकार ने रेल, बस, बैंक, अस्पताल आदि जगहों पर वरिष्ठ नागरीकों के सुविधा का ख्याल तो रखा है परन्तु उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने देने के मामले में उदासीनता बरत रखी है। सच् तोे यह है कि देश की राजधानी में हमारे बुजुर्ग सर्वाधिक असुरक्षित हैंै। घरेलु हिंसा से लेकर लूट और हत्या जैसे जघन्य अपराध के सबसे आसान शिकार बनाये जा रहे हैं दिल्ली के वरिष्ठ नागरिक। पिछले दिनों एक खबर मीडिया में काफी सुर्खियों में थी जिसमेें एक आला पुलिस अधिकारी पर दिल्ली विश्वविद्यालय से रिटायर्ड एक महिला केे करोड़ों की कोठी हड़पने का आरोप था। गौरतलब है कि दिल्ली में शासन की तिगड़ी बनानेवाली मुख्यमंत्री स्वयम् बुजुर्ग महिला हैं और बुजुर्गों की मुश्किलों और अपेक्षाओ से अच्छी तरह वाकिफ भी हैं। बावजूद इसके वरिष्ठ नागरिकों के प्रति बढ़ रहे अपराध के सामने विवश दिखती हैं।
जिस विकास का ढ़िढ़ोरा पीटकर सरकार दिल्ली में अपने चुनावी जीत का श्रेय लेती है वह विकास दिल्ली के कुछ खास क्षेत्रों में ही सिमटा रह गया है। पूर्वी और बाहरी दिल्ली विकास के बयार से कोसों दूर दिखता है। यहाॅं की गंदी गलियाॅं और टूटी सड़कें इसे दिल्ली से अलग होने का भ्रम पैदा करती हैं। दक्षिणी दिल्ली के बदरपुर - जैतपुर आदि इलाके भी जगमगाती दिल्ली से इतर किसी दूर दराज के कस्बाई क्षेत्र होने का आभास कराते हैं। इन क्षेत्रों में बिजली, पानी, सड़क परिवहन, स्वास्थ्य चिकित्सा आदि सभी मूलभूत सुविधाओं का खासा अभाव है। विकास के पैमाने पर सौतेलेपन का दंश झेल रहे इन क्षेत्रों की सुधि सरकार मात्र चुनावों के वक्त लेती है। इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अपराध भी अधिक है और अधिकंाश मामलों में प्रशासनिक रवैया ‘समरथ को नाहीं दोष‘ के अनुरुप ही रहता है।
जब कभी देश में अपराध पर चर्चा होती है तो बिहार, उत्तर प्रदेश, आदि कुछ राज्यों का नाम तोते की तरह रटने लगते हैं बुद्धिजीवी। किन्तु विडंबनापूर्ण हकीकत यही है कि केन्द्र सहित दो सरकारों की मुख्यालय दिल्ली न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के सर्वाधिक अपराधोें वाला शहर है। जो लोग इसकी तुलना बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से करते हैं उन्हें यह तथ्य भी याद रखना चाहिए कि इन बड़े राज्यों का जितना किसी एक जिला का क्षेत्रफल है उसमें पूरी दिल्ली ही समा सकती है। तुलना करने पर यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य के क्षेत्रुफल के हिसाब सेेे न सिर्फ दिल्ली में पुलिसकर्मियों की संख्या अधिक है अपितु ये आध्ुानिक हथियारों से अधिक सुसज्जित और प्रशिक्षित भी हैं। भौगोलिक और सड़क परिवहन की सुविधा की दृष्टि से भी यह अन्य राज्यों जैसी विसंगतियों का शिकार नहीं है न ही यहाॅं उस तरह का जातिय या धार्मिक सामाजिक संरचना है जिससे अन्य बड़े राज्य ग्रसित हैं। जागरुकता, गरीबी, शिक्षा, और रोजगार की स्थिति भी यहाॅं अन्य राज्यों की तुलना में कहीं बेहतर है। बावजूद इसके यदि दिल्ली में कानून व्यवस्था और सुशासन का अभाव दिखता है तो यह सवाल बहुत लाजिमी हो जाता है कि दिल्ली में कोई सरकार है भी या यहाॅं की अधिसंख्य जनता भगवान भरोसे ही जीवन गुजार रहे हैं।

- बिपिन बादल
9810054378

रविवार, 14 जून 2009

गंगा के घाट पर 'जल' नहीं


जिस भू-भाग में 'सदानीराÓ प्रवाहित होती हो, जहां लोग मोक्ष की कामना लिए आते हों, वहां लोगों को बोतलबंद पानी के सहारे अपना गल तर करना पड़ता है। गंगा के घाट पर 'बाजारÓ इस कदर हावी है कि तीर्थयात्रियों को पीने के लिए पानी खरीदना पड़ता है। प्लास्टिक की बोतलों में बंद। वह भी निर्धारित मूल्य से अधिक पर और स्थानीय प्रशाासन है कि पेयजल की व्यवस्था नहीं करता।

अमूमन 30 से 35 हजार तीर्थयात्री रोजाना हरिद्वार आते हैं। यहां की प्रसिद्घ घाट 'हर की पौड़ीÓ पर आकर स्नानादि करते हैं। अवकाश के दिनों और विशेष तिथियों में इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। इस घाट पर पेयजल की व्यवस्था नहीं के बराबर है। पेयजल के लिए गंगा सभा द्वारा घाट के शुरू और अंत में दो जगहों पर नल लगाए गए हैं, जो लोगों की संख्या के अनुपात में नहीं के बराबर हैं। ऐसी स्थिति में लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए बोतलबंद पानी खरीदनी पड़ती है। अव्वल तो यह कि जो पानी की बोतलें दूसरे जगहों पर 10-12 रुपए में मिलती है वह हरिद्वार के घाटों पर 15 रुपए में लोगों को नसीब होती है। विकल्पहीनता के कारण लोग इसे खरीदने को मजबूर होते हैं। बताया जाता है कि एक दिन में हरिद्वार के घाट और अन्यत्र मंदिरों के आस-पास 50-60 हजार पानी की बोतलें बिकती हैं, यानी इस तीर्थनगरी में बोतलबंद पानी का कारोबार साढ़े सात से नौ लाख रुपए प्रतिदिन है।

पेयजल की समस्या के निदान के लिए घाट की जिम्मेदारी संभालने वाला 'गंगा सभाÓ अपने हाथ खड़ा करता है तो स्थानीय प्रशासन लाचार लगता है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि घाटों पर दुकानदारों की मनमानी चलती है और उन्हें कुछेक साधु मण्डली का संरक्षण भी प्राप्त है। जब भी कोई कार्रवाई करने को स्थानीय प्रशासन प्रस्तुत होता है उसे धार्मिक आड़ में रोक दिया जाता है। काबिलेगौर है कि हरिद्वार में अगले साल होने वाले अर्द्धकुंभ की तैयारी के सिलसिले में हर की पैड़ी स्थित कुछ दुकानों को हटाने के स्थानीय प्रशासन के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति मार्कन्डेय काटजू और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ ने सड़क के किनारे छोटी-छोटी दुकान चलाने वालों को राहत प्रदान की। सुप्रीम कोर्ट ने 1990 में ही हरिद्वार नगरपालिका को निर्देश दिया था कि वैकल्पिक सुविधा दिए बिना दुकानें न हटाई जाएं। 64 दुकानदारों ने अदालत में दायर अवमानना याचिका में कहा कि नगरपालिका ने वैकल्पिक दुकानों का कई बार नक्शा तैयार किया, लेकिन आवंटन अभी तक नहीं हुआ। अर्द्धकुंभ बसंत पंचमी के दिन 10 फरवरी, 2010 से शुरू होगा और 15 अप्रैल, 2010 तक चलेगा। श्रद्धालुओं के आवागमन को सुगम बनाने के लिए पवित्र स्नान के सात दिनों के दौरान दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद करने का आश्वासन दिया, लेकिन मेला अधिकारी, जिलाधिकार और नगरपालिका ने उन्हें तीन जून, 2009 तक दुकानें हटाने का अल्टीमेटम दिया था। याचिका में कहा गया था कि हर की पौड़ी के अलावा प्रशासन लालतारो पुल की दुकानों को भी तोडऩा चाहता है। फूल, हार, प्रसाद, धार्मिक पुस्तक और पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदारों ने कहाकि 1990 के बाद भी सुप्रीम कोर्ट कई बार दुकानों को हटाने का प्रयास विफल कर चुका है। ऐसी स्थिति में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब धर्म और बाजार का गठजोड़ मजबूत हो तो भला आम आदमी को कैसे राहत मिल सकती है।


सोमवार, 8 जून 2009

जो मुझे पसंद है

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, जलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा सी जो बात मिली
- मीना कुमारी


अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे
चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे

तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर
ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे

लहूलोहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज
परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे

ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू
बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे

झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले
वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे

अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी
सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे
- राहत इन्दोरी


आज वीरान अपना घर देखा
तो कई बार झाँक कर देखा

पाँव टूटे हुए नज़र आये
एक ठहरा हुआ सफ़र देखा

होश में आ गए कई सपने
आज हमने वो खँडहर देखा

रास्ता काट कर गई बिल्ली
प्यार से रास्ता अगर देखा

नालियों में हयात देखी है
गालियों में बड़ा असर देखा

उस परिंदे को चोट आई तो
आपने एक-एक पर देखा

हम खड़े थे कि ये ज़मीं होगी
चल पड़ी तो इधर-उधर देखा।
- दुष्यंत कुमार

शनिवार, 6 जून 2009

रक्षक ही भक्षक

भारतीय परिप्रेक्ष्य में फिलहाल बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता हुआ अपराध है। एक अनुमान के मुताबिक 1971 के बाद से बलात्कार की घटनाओं में 678 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। राष्टï्रीय रिकॉडर्स अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट दर्शाती है कि बलात्कार करने वालों में से 75 फीसदी लोग जान-पहचान वाले होते हैं जिसमें परिवार के सदस्य, अभिभावक, पड़ोसी और रिश्तेदार शामिल हैं। पीडि़ता जब इसकी शिकायत करने पुलिस वालों के पास जाती है तो वहां भी उसके साथ उत्पीडऩ का दुहराव होता है। ऐसे एक नहीं, अनेक मामले प्रकाश में आए हैं, तो सवाल उठता है कि आखिरकार पीडि़ता कहां गुहार लगाने जाए? जब रक्षक ही भक्षक हों तो फरियाद कौन सुनेगा।
अमूमन पीडि़त अपने शिकायत के निवारण के लिए अथवा अपेक्षित कार्रवाई के लिए पुलिस के पास जाते हैं, लेकिन जब पुलिस ही उसका कारण हो तो भला कहां जाए? हाल के वर्षों में जिस प्रकार से पुलिस महकमे के चरित्र पर अंगुली उठाए जा रहे हैं, वह निश्चय ही निंदनीय है। लेकिन सच यही है। टीवी चैनलों ने एक-एक कर कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के द्वारा गुलछरे उड़ानेवालों की करतूतों का भांडाफोड़ किया है। साथ ही कई प्रसंग में पीडि़ता जब पुलिस द्वारा रौंदी जाती है तो कहानी आत्महत्या तक पहुंच जाती है। बीते सालों में बिहार में पदस्थापित आईपीएस अधिकारी अभिताभ कुमार दास के खिलाफ एक पूर्व आईपीएस स्व। प्रभात कुमार सिन्हा की बेटी शबनम सिन्हा ने आरोप लगाया था कि दास ने उसका आठ वर्षों तक यौन शोषण किया और शादी का झांसा देते रहे। दास द्वारा छली गई शबनम के अलावा औरों से भी संबंध कायम होने की चर्चा पुलिस विभाग में छायी रही। शबनम ने तो यहां तक कहा था कि दास ने अकेले में उसकी मांग में सिन्दूर भरा था और वह भी अति सुरक्षित माने जाने वाले आईपीएस मेस के कमरा नंबर 11 में।
आईपीएस संवर्ग में केवल अभिताभ कुमार दास की ही एक रंगरलियों की कहानी नहीं है, बल्कि रांची में पदस्थापित आईजी नटराजन की रंगरलियों के दृश्य सभी ने खुलेआम देखे थे। अगस्त 2005 में झारखंड पुलिस के महानिरीक्षक पी।एस. नटराजन के खिलाफ यौन उत्पीडऩ का मामला चला था। पूरी दुनिया ने पहले टेलीविजन पर और बाद में अखबारों में उनके एक आदिवासी युवती सुषमा के संग अभिसार प्रसंग को आंख फाड़-फाड़ कर देखा था। पीडि़ता सुषमा एक अन्य पुलिस अधिकारी परवेज हयात के खिलाफ यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने आईजी नटराजन के पास गई तो उन्होंने भी उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला। बाद में जब सुषमा से पूछा गया कि डीआईजी परवेज हयात और आईजी नटराजन में सबसे बड़ा गुनाहगार कौन है तो वह बताती है,'सबसे बड़ा गुनाहगार परवेज हयात है। उनके पास मैं न्याय की गुहार लेकर गई थी जिनको सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए उन्होंने ही मेरा शोषण किया। मेरा शारीरिक शोषण किया और बेबसी का लाभ उठाया।Ó इस घटना के बाद पूरे पुलिस महकमे के चरित्र पर अंगुली उठने लगी थी, लेकिन नटराजन ने एक पत्रिका के साथ बातचीत में कहा था कि 'मौज बलात्कार नहीं है और मेरे खिलाफ यह पुलिसिया षडयंत्र है। कारण कुछ लोग नहीं चाहते कि मेरी पदोन्नति हो।Ó इस प्रसंग के बाद पूरे पुलिस महकमे के चेहरे पर बदनुमा दाग लगा और प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने मामला उजागर होते ही फौरन नटराजन को निलंबित कर दिया था। मामले की तहकीकात होनी शुरू हुई तो कई तार पुलिस के दूसरे जगहों से जुड़ती चली गई। तो प्रथम दृष्टïया जनता ने यही माना कि पुलिसया चरित्र पर सहसा भरोसा नहीं किया जाए, खासकर महिला को तो कतई नहीं करना चाहिए। हालांकि पीडि़ता सुषमा के चरित्र पर भी अंगुली उठी थी।
इतना ही नहीं, कुछेक आईपीएस अधिकारी पहली पत्नी के होते हुए दूसरी महिला से शादी कर लेते हैं। हिंदू विवाह कानून के तहत पहली पत्नी को तलाक दिए बगैर दूसरी शादी करनी गैर कानूनी है और उसका उल्लंघन करने वालों को जेल जाना पड़ता है। सरकारी नौकरी से हटना पड़ता है, लेकिन बिहार के पटना निवासी और जम्मू -कश्मीर कैडर के आईपीएस अधिकारी सुनील कुमार ने अपनी पहली पत्नी निभा सिन्हा के रहते सुनीता से दूसरी शादी कर ली। अब इसे कानून का मजाक उड़ाना नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? पुलिसिया मौज-मस्ती का आलम यह है कि मायानगरी मुंबई में पुलिस चौकी में ही पुलिस कर्मियों ने एक महिला को अपनी हवस का शिकार बना लिया और मामले की लीपापोती करने का भरसक प्रयास किया। जम्मू-कश्मीर के चर्चित अनारा कांड में पुलिस की किरकिरी किस कदर हुई थी, उससे हर कोई वाकिफ है। हरियाणा के रोहतक जिले की सरिता का मामला शांत भी नहीं हो पाया था कि करनाल से एक पुलिस इंसपेक्टर को महिला से बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इंसपेक्टर जय सिंह पर आरोप है कि उसने एक महिला के साथ अपने क्वार्टर पर बलात्कार किया। मानवाधिकार मुद्दे से जुड़े और वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडिय़ा कहते हैं, '' आजादी के बाद की भारतीय पुलिस से बेहतर और सभ्य अंग्रेजों की पुलिस थी। वर्तमान पुलिस घोर स्त्री विरोधी है और महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार करने का कोई भी मौका नहीं छोडऩा चाहती। गोस्वामी तुलसीदास के कथन कि नारी ताडऩ की अधिकारी है, पर अक्षरश: पालन करती है और महिलाओं को प्रताडऩा का अधिकारी समझती है। भले ही कई कानून बनें हों, लेकिन जब तक समाज में जागरूकता नहीं आएगी, कानून मात्र से कुछ नहीं होगा। देखना पड़ता है कि कानून को कौन और किस रूप में लागू करता है।
और तो और, पुलिस के साथ अद्र्घसैनिक बलों में भी यौन उत्पीडऩ की घटनाएं होती रही है। हाल ही में सीमा सुरक्षा बल ने जम्मू-कश्मीर में बल के एक अनुदेशक द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाया गया था। बिहार मिलिट्री पुलिस के 136 रंगरूटों ने आरोप लगाया था। बीएसएफ के महानिदेशक एके मित्रा का कहना है कि इस मामले के कई अन्य पहलू भी हो सकते हैं। बीएसएफ मामले की जांच कर रही है। बीएसएफ का कहना है कि ऊधमपुर स्थित प्रशिक्षण कार्यक्रम की कड़ाई को देखकर रंगरूट भाग खड़े हुए थे। बल ने पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखाई है। बीएमपी के रंगरूटों का आरोप है कि 20 जून 2008 को बीएसएफ के अनुदेशक ने एक रंगरूट को अपने कमरे में बुलाया और उसका यौन शोषण करने का प्रयास किया। रंगरूटों के हवाले से पुलिस का कहना है कि बाकी रंगरूटों ने अपने साथी को यौन शोषण का शिकार होने से बचाया।
इसके अलावा, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों पर भी यौन उत्पीडऩ का मामला दर्ज होता रहा है। इसी वर्ष मार्च में उड़ीसा विधानसभा के अध्यक्ष महेश्वर मोहंती के खिलाफ सहायक महिला मार्शल द्वारा यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाया गया और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पीडि़ता गायत्री पांडा ने कहा था कि अध्यक्ष अपने चालक और अन्य कर्मचारियों के मार्फ त उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए कह रहे थे और मोहंती उसे देखकर अश्लील इशारे किए करते थे।
न्यायालय ने कामकाजी महिलाओं के साथ कार्य स्थल पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीडऩ से संबद्घ मामलों से निपटने के लिए कानून के अभाव पर चिंता व्यक्त की। अदालत की ओर से कहा गया कि कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीडऩ से संबद्घ मामलों से निपटने के लिए कानून का अभाव गंभीर चिंता का विषय है। बीते दिनों न्यायधीश कैलाश गंभीर ने केंद्र सरकार की एक महिला कर्मचारी के खिलाफ निलंबन आदेश पर रोक लगा दी। उन्होंने कहा था कि कामकाजी महिलाओं के साथ यौन उत्पीडऩ से महिलाओं का जीवन अवसाद और दुख से भर जाता है, उनके जीवन में परेशानी आ जाती है।
सच तो यह भी है कि कागजी तौर पर देश में महिला हितों के संरक्षण के लिए कई कानून तो हैं लेकिन अभी भी उन कानूनों को सामाजिक स्वीकृति मिलनी बाकी है। अब तक अनैतिकता व्यवहार निवारण अधिनियम 1956, आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम 1986, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961/1984, सती निवारण अधिनियम 1987, विशेष विवाह अधिनियम 1954, स्त्री और बालक संस्था (अनुज्ञापन) अधिनियम 1956, मुस्लिम स्त्री (विवाह विच्छेद पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 और फिर हालिया घरेलू हिंसा अधिनियम आदि महिला अधिकारों के संरक्षण के लिए पहले भी कानूनी प्रयास किए गए हैं और संभव है भविष्य में भी हों। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन कानूनों से महिला हितों के संरक्षण में मदद जरूर मिली है, किंतु महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर पूर्ण रूप से अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
दरअसल, इन कानूनों से महिलाअेां को अपेक्षित लाभ न पहुंचने के पीछे सबसे बड़ा कारण इनकी सामाजिक स्वीकृति का अभाव ही रहा है। न्यायालय और कानून किसी अपराध के लिए भले ही कोई सजा निर्धारित करे, उसकी पूर्ण सफलता कानून का सम्मान एवं उसकी सर्वमान्यता पर निर्भर है। महिला हितों के संरक्षण के नाम पर अब तक जितने कानून बने हैं, उनके उल्लंघन के मामले भी सामने आए हैं। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च दिल्ली द्वारा प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि देशभर में 1998 में महिलाओं के साथ बलात्कार के 15 हजार 151, 1999 में 15 हजार 468, 2000 में 16 हजार 496 एंव वर्ष 2001 में 16 हजार 75 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं यौनाचार के 1998 में 8 हजार 54, 1999 में 8 हजार 858, 2000 में 11 हजार 24 एवं 2001 में 9 हजार 746 मामले दर्ज किए गए। एक अनुमान के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा एवं उत्पीडऩ के मामले में तीन गुना इजाफा हुआ है। ऐसे में महिला हितों के कानूनों संरक्षण के प्रयासों के साथ उन्हें सामाजिक सुरक्षा का कवच भी देना होगा।

गुरुवार, 4 जून 2009

आगे-आगे देखिये, होता है क्या?

- विपिन बादल

गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है, ‘परिवर्तन ही संसार का नियम है। अंगे्रजी में भी कहा गया है ‘नथिंग बट चेंज इज परमानेंट‘। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि परिवर्तन ही जीवन है। हमारे चारों तरफ हो रहे नित नये परिवर्तन भी यही नि’शकर्’ा देेते हैं। अब ये बात जुदा है कि ये परिवर्तन सकारात्मक है या नकारात्मक। मगर प्रशासनिक अमला और राजनीति के क्षेत्र में ये बदलाव बहुत कम ही देखने को मिलता है। पिछले कुछ दशकों में अधिकारी वर्ग, पुलिस, पत्रकारिता और राजनीतिज्ञों की मानसिकता इतनी जड़ हो चुकी है कि सुखद परिवर्तन के आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की अप्रत्याशिात और पार्टी की ही नजर में अकल्पनीय जीत के बाद तो चुनाव के निहितार्थों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की तो मीडिया में झड़ी ही लग गई। कोई लिखकर तो कई बोलकर चुनावी निहितार्थ को कवितार्थ में तब्दील करता ही दिखा। प्रसन्नता की वजह सबकी थी, अलग-अलग कारणों से कोई केन्द्र में अरसे बाद लगभग स्थिर सरकार के गठन पर खुश था तो कोई मोल भाव करने वाले क्षेत्रीय दलों के धराशायी होने से उत्साही तो किसी को केन्द्र और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मजबूत होने की खुशी। किन्तु सबको समान रूप् से इस बात का राहत और हर्श था कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा अपेक्षित परिणाम न ला सकी और कांग्रेस से बुरी तरह पिछड़ गई। बस इस एक तथ्य ने देश के सभी कथित बुद्धिजीवियों को मानों संजीवनी प्रदान कर दी थी। इस खुशी को जाहिर करने में क्या मीडिया, क्या कथित सेकुलर बिरादरी कोई पीछे नही रहना चाहता था। यहाॅ तक कि वामपंथी विचारधारा के मानस पुत्र चाहें और मीडिया में हों या कहीं और धर्मनिरपेक्षता का झंडा लपेटे हो, पशिचम बंगाल से केरल तक वामपंथियों के धराशायी होने का शोक मनाने से अधिक भाजपा की हार का जशन मनाने में ही सराबोर रहे।
कुछ न्यूज चैनल तो चुनाव के दौरान इस तरह खबरों का प्रसारण कर रहे थे मानों वे किसी खास राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित न्यूज चैनल हो। मतगणना के दौरान ज्यों-ज्यों परिणामों के रूझान भाजपा के विपरीत जा रहे थे त्यों-त्यों खबर प्रस्तोता (एंकर्स) के न सिर्फ चेहरे की दमक बढ़ती जा रही थी बल्कि उनके सम्पूर्ण शरीर की बढ़ रही थिड़कन से ऐसा लग रहा था कि अब वे शायद ठुमका लगाना भी शुरू कर देंगे। अंग-प्रत्यंग का यह लचीलापन देखते ही बनता था। एक चैनल के एंकरों को तो पार्टी विशोश की कसीदा गढ़ते अपने ही शब्द कम पड़ते नजर आ रहे थे और वे भाजपा के पराजय को ठीक से व्यक्त न कर पाने की अकुलाहट में शब्दों के टोटके में फॅसते नजर आ रहे थे। तभी तो भाजपा की बुरी तरह पराजय के जैसे शब्द उन्हें संतोश प्रदान नहीं कर रहा था और वे एक ही सांस में घो’ाणा करने लगे कि ‘भाजपा ने घुटने टेके‘। यह तो गनीमत रही कि उन्होंने यह नहीं कहा कि भाजपा लगी गिड़गिड़ाने, मांगी एक-दो सीटों की भीख। शायद अति उत्साह के अफरातफरी में उनके जेहन में यह शब्द आया ही नही होगा न ही पीछे से कनफुकवा निर्देश ऐसा मिला होगा। एक चैनल की प्रतिनिधि तो चुनावों के चरम मौके पर जब कुछ चरणों का चुनाव भी बीत चुका था, प्रियंका वाड्रा के लॅान की मखमली घास पर बैठकर उनकी स्तुति-पुराण में व्यस्त रही। इस लंबे (संभवतः प्रायोजित) कार्यक्रम में प्रियंका की अपनी दादी इंदिरा से तुलना कर उनके पसंद की साड़ी तक का विस्तृत विवरण सलीके से प्रस्तुत किया गया। परन्तु चुनाव के दौरान भारतीय परिधान में दिखने वाली प्रियंका का मतदान के वक्त का ड्रेस जिसने भी देखा वह राजनीतिक हस्तियों और मीडिया के फरेब में अपने को उलझा और दगा ही महसूस करता रहा।
खैर जिन लोगों ने लगभग दो दशक के बाद कांग्रेस का ऐतिहासिक उत्थान पर कविता और कसीदा गढ़े थे उनका यह दावा भी था कि अब कांग्रेस गठबंधन की लगभग बहुमत वाली पार्टी बगैर किसी मोल-भाव और क्षेत्रीय दलों के शर्तों से मुक्त होकर केन्द्र को स्थिरता प्रदान करेगी और सहयोगी भी अपनी बात कांग्रेस पर थोपने की स्थिति में नहीं रहेंगे। परन्तु यह दावा 15 दिन भी कायम नहीं रह सका। देश ने एक बार फिर सत्ता के सौदागर सहयोगियों के शर्तों के खनक में सत्ता में शामिल गठबंधन की प्रमुख पार्टी कांग्रेस और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेेचारगी को देखा। छुटमैये सहयोगी दलों के अलावा अपने ही पार्टी के सांसदो ने सोनिया और मनमोहन सिंह के रातों की नींद हराम कर दी थी। एक तरफ द्रमुक की वजह से मंत्रीमंडल के गठन में अनाव”यक विलम्ब हुआ तो दूसरी तरफ मंत्रीमंडल के प्रथम चरण में शामिल नहीं किये जाने से भन्नायें नेशनल कांफ्रेस के नेता फारुख अब्दुल्ला ने अफ्रीका जाकर मैच देखने का ही फैसला कर लिया। उनके पुत्र और जम्मू क”मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस को नसीहत दे डाली। फायर ब्रंाड ममता की ‘अग्निशिाखा‘ वाले तेवर से भी निपटना कांग्रेस आलाकमान के लिए आसान नहीं था। अंततः सहयोगियों के दबाव में सरकार के ‘मजबूत‘ मुखिया मनमोहन सिंह और पार्टी सुप्रीमों सोनिया गंाधी को झुकना ही पड़ा। किन्तु बात यहीं खत्म नहीं हुई, सहयोगी माने तो अपने ही दल के सांसद रूठ गये। मंत्री पद पर इतना मोल-भाव और दबाव की राजनीति हुई कि इस मंदी के दौर में भी सरकार को ‘जम्बो कैबिनेट‘ का गठन करना पड़ा। फिर भी केन्द्रीय मंत्री और राज्यमंत्री पर मामला उलझ ही गया। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में पहली बार शामिल कुछ लोगों को उन मंत्रियों से भी उॅचा दर्जा दिया गया है जो पहले भी मंत्री रह चुके हैं। ऐसे ही एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने अपना दर्जा नीचे होते देख मंत्री पद की शपथ लेने से ही इंकार कर दिया। आखिर मरता नेतृत्व क्या करता!
उन्हें खुश करने के लिए पूर्व घो’िात कैबिनेट मंत्री मीरा कुमार से इस्तीफा लेकर उन्हें लोकसभा अध्यक्ष के रूप में नामित कर दिया गया। इस एक चाल से पार्टी ने कई निशाने साध लिये। पहला तो नाराज चल रहे राज्यमंत्री के कैबिनेट मंत्री के रूप में मंत्रीमंडल में शामिल होने का दरवाजा खुल गया, दूसरा लोकसभा अध्यक्ष के रूप में दलित महिला को चुनकर वाहवाही अलग बटोर गई। इसके पीछे एक और मकसद दलित वोट को फिर से पार्टी की ओर आकर्शिात करने का भी है। ताज्जुब है कि चाटुकार कथित बिरादरी को पार्टी की हास्यास्पद दयनीय स्थिति नहीं दिखी। वे उसी रंग में रंगकर दलित महिला केा लोकसभा अध्यक्ष बनाये जाने का कसीढ़ा गढ़ने में मशगूल हो गये हैं।
चुनावी निशकर्श के महीना भर के अन्दर इतने सारे उलटफेर निराश करने वाले हैं। इससे प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के निर्णय लेने की कमजोरी एक बार फिर सतह पर आ गई है। एक ऐसे समय में जब कांग्रेस बहुत हद तक केन्द्र में निर्णायक भूमिका में है, उसकी दुलमुल नीति, निर्णय क्षमता में लचरपन और पार्टी सांसदों तथा सहयोगियों के सामने मिमियाने की स्थिति ने देश की जनता के बीच कोई शुभ संकेत नहीं दिया है। अभी तो खैर शुरूआत है, आगे-आगे देखिये होता है क्या?



लेखक द लास्ट सन्डे मैगजीन में सलाहकार संपादक हैं .