गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

शहरी विस्तार और खाद्यान्न संकट

देश की बहुसंख्य आबादी की निर्भरता और स्वतंत्राता आन्दोलन की प्रतिबद्धताओं के चलते आजद भारत की सरकारें आरंभ से ही कृषि और ग्रामीण विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाती रही हैं। यह भी कहा जाता रहा है कि कृषि भूमि का गैर कृषि उपयोग के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। लेकिन व्यवहार में अंग्रेजी शासनकाल में बने काले कानून भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के साए में किसानों की इच्छा के विरुद्ध या फिर उसकी मजबूरी के चलते कृषि भूमि का निरतंर अधिग्रहण होता रहा है। इधर इस कानून में कई संशोधन भी किए गए हैं जिसमें यह व्यवस्था की गई है कि किसानों की इच्छा के बिना सामाजिक कारणों के अलावा किसी भी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। लेकिन जिन सामाजिक कारणों के लिए जमीन का अधिग्रहण किया जाना तय है उनमें से अधिकतर सरकार पहले ही निजी हाथों में सौंपकर पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने का इंतजाम कर चुकी है।
उदाहरण के तौर पर बिजली परियोजनाएं, स्कूल, अस्पताल आदि सभी सामाजिक कारण हैं लेकिन सरकार इन सभी क्षेत्रों को एक बड़ा हिस्सा निजी हाथों में सौंप चुकी है। वह इन योजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण कर उसे निजी हाथों में सौंप देगी और निजी क्षेत्रा के व्यवसायी उसका व्यावसायिक लाभ उठाते हैं। आज इस बात पर बड़ी बहस की जरूरत है कि जब एक व्यवसायी सरकार से सस्ते दरों में हासिल जमीन पर जब अस्पताल या शिक्षण संस्थान खोलता है, जो कि आज सबसे कम लागत पर सबसे अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय है, किसी अन्य व्यवसाय की अपेक्षा इन व्यवसायों से जुड़े लोगों की समृद्धि में दिन-दूनी रात चैगुनी गति से वृद्धि हुई है, क्या ऐसे सामाजिक कारणों के लिए जमीन अधिग्रहण करने का अधिकार सरकार के पास होना चाहिए या नहीं?
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि शहरी विस्तार के लिए सरकार ने उपलब्ध जमीन के उपयोग का जो फार्मूला तय किया है उसमें किसानों का अपनी जमीन से बेदखल होकर उजड़ना तय है। कथित सामाजिक कारणों के लिए सरकार देश के किसी भी हिस्से में भूमि का अधिग्रहण कर सकती है। लेकिन शहरी विस्तार मुख्यतः महानगरों और नगरों के आसपास विभिन्न सुविधाओं की आपूर्ति के लिए भूमि का अधिग्रहणकर सरकार उस पर स्वयं या व्यवसाइयों के माध्यम से सेवाओं का विस्तार करती हैं। इसलिए इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि सरकार जमीन का अधिग्रहणकर निश्चित क्रिया कलापों के लिए पूंजीपतियों को देती है या स्कूल, अस्पताल, पावर हाउस, पेट्रोल पंप आदि बनाने से लेकर काॅमर्शियल काॅम्पलेक्स व इण्डस्ट्री लगाने के लिए किसानों की जमीन खरीदनेे की आजादी देती है। दोनों ही स्थितियों में किसान और ग्रामीण ही अपनी जमीन से बेदखल होते हैं। कृषि और कृषि आधारित व्यवसायों के खत्म होने से सदियों पुरानी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का अंत होता है। दूसरी ओर तमाम जन सुविधाओं को निजी हाथों में सौंप दिए जाने से पूंजीपति सरकार से सस्ते दरों पर प्राप्त अथवा बाजार भाव से सीधे किसानों से खरीदी जमीन पर कारोबार कर सीमित समय में अपनी संपत्ति में कई गुना बढ़ोत्तरी कर लेते हैं। मुख्यतः निर्माण कार्यों और उसमें इस्तेमरल होने वाली सामग्री - लोहा, लकड़ी, सीमेंट, ईंट आदि के निर्माता मालामाल होते हैं। निर्माण के बाद उसका लाभ उठाने वाले अलग हैं। सरकारी तंत्रा के अलावा भी कारोबारियों की एक ऐसी लंबी सूची है जो शहरी विस्तार में अपना हित देखती है।
शहरी विस्तार के इस फार्मूले के मुताबिक न केवल किसान बल्कि शहरी क्षेत्रों में सरकार की इच्छा के विरुद्ध अपनी मेहनत-मजदूरी की कमाई से किसानों से जमीन खरीदकर उसमें अपना अशियाना बनाकर रह रहे लोग भी बेदखली की मार से नहीं बच पाते। दिल्ली सहित देश के सभी नियेजित कहे जाने वाले नगरों और महानगरों की अवैध कालोनियों को उजाड़े जाने से लेकर शहर में रेहड़ी-ठेले के कारोबार पर प्रतिबंध लगाने के पीछे यह प्रमुख कारण है। इससे जहां समाज के कमजोर लोगों के समक्ष तो आवास से लेकर आजीविका तक का संकट पैदा हो जाता है वहीं निर्माण कार्यों से जुड़े व्यवसायी, बिल्डर, शाॅपिंग काॅम्पलेक्स या माॅल के संचालक व्यवसायी हर दृष्टि से फायदे में रहते है। शहरी विस्तार के निम्न फार्मूले से स्पष्ट हो जाता है कि भूमि अधिग्रहण के बाद उसके उपयोग से इस वर्ग के लोगों में कौन कितने फायदे में रहता है।
यह समस्या देश के कुछ चुनींदा नगरों और महानगरों तक सीमित नहीं है। कमोवेश पूरे देश की स्थिति एक सी है। देशभर में जहां-जहां सरकारें जमीन का अधिग्रहण कर रही हैं या कृषियोग्य जमीन पर औद्योगिक घरानों को उद्योग या फिर एसईजेड लगाने की अनुमति दी जा रही है वहां के किसान इस बात को लेकर आशंकित है कि उनकी आय का एकमात्रा और पुस्तैनी जरिया छिन जाने के बसद उनका क्या होगा। किसान यह बात अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उनकी जमीन पर आवासीय, व्यावसायिक एवं औद्योगिक परिसर बनने से उद्योगपति, व्यवसायी और बिल्डर तो रातों-रात मालामाल हो जाएंगे लेकिन वे स्वयं आजीविका के लिए दर-ब-दर हो जाएंगे। उनके आने वाली पीढ़ियों के पास अपनी संपत्ति के नाम पर एक अदद मकान भी होगा या नहीं कहा नहीं जा सकता। क्योंकि सरकार या पूंजीपति उन्हें एक एकड़ जमीन की जितनी कीमत देंगे उससे वे उसी जमीन पर विकसित 100 मीटर का प्लाट भी नहीं ले सकेंगे।
देश का बुद्धिजीवी वर्ग शहरी विस्तार, औद्योगिकीकरण एवं एसईजेड के लिए कृषि योग्य जमीन के अधिग्रहण को आने वाले समय में खाद्यान्न संकट की समस्या के रूप में देख रहा है। यह सच भी है कि कृषियोग्य जमीन के गैर कृषि उपयोग की सर्वाधिक मार देश के खाद्यान्न भंडार पर ही पड़ेगी। अंतरराष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान की वर्ष 2008 की रिपोर्ट से इसका खुलासा भी हो चुका है। संस्थान के महानिदेशक झाओचिम वान ब्राउन ने स्पष्ट किया है कि हम 2015 तक गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा करने में निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं। वान ब्राउन का यह वक्तव्य परी दुनिया के संदर्भ में है। यदि हम सिर्फ भारत की बात करें तो स्थिति पूरी दुनिया से अधिक भयावह है। अंतरराष्ट्रीय खाद्यनीति शोध संस्थान का यह निष्कर्ष चैंकाने वाला है कि भारत में भूखे लोगों की संख्या न केवल दुनिया के किसी भी देश से अधिक है बल्कि भूख पर नियंत्राण करने में भारत की दशा अफ्रीका महाद्वीप के उप-सहारा देशों से भी अधिक चिंताजनक है। यही वजह है कि खाद्य नीति शोध संस्थान ने पहली बार विश्व भूख सूचकांक से अलग भारत के संदर्भ में भारत भूख सूचकांक तैयार किया है।
यह बात भारतीय नेतृत्व और भारत के योजनाकारों की समझ में क्यों नहीं आती, यह एक बड़ा प्रश्न है। वे इतनी सी बात को क्यों नहीं समझ पा रहे कि जब देश की कृषि पर निर्भर आबादी अपनी जमीन से बेदखल हो जाएगी और उसकी आजीविका के साधन से छिन जाएंगे, तो उनके बच्चे कुपोषण के शिकार होंगे ही, उन्हें अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाएगी। बेशक इस पूरी प्रक्रिया का लाभ उठाने वाले व्यवसायी, उद्योगपति और मुट्ठीभर सेवादाता लोगों की आर्थिक स्थिति और मजबूत हो जाएगी। इससे पहले से मौजूद अमीरी और गरीबी के बीच की खाई और भी चैड़ी हो जाएगी। कुलमिलाकर यह समस्या और भी जटिल हो जाएगी।
आज देश के अर्थशास्त्रिायों का एक समूह सरकार से यह मांग कर रहा है कि सरकार कृषि योग्य जमीन के गैर कृषि उपयोग के लिए अधिग्रहण करने से पहले देश की कृषि भूमि का व्यापक सर्वेक्षण कर यह निश्चित करे कि क्या वह देश की आवश्यकता के लिए खाद्यान्न एवं अन्य कृषि उत्पादों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। जब तक यह काम नहीं होता जमीन का अधिग्रहण न किया जाए और जिस जमीन को अधिग्रहण के लिए अधिसूचित किया गया है उसे निरस्त किया जाए। लेकिन देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों व पूंजीपतियों का हित पोषण के लिए और उनके दबाव में काम कर रहीं भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों को इसकी कतई चिंता नहीं है।
भूमि अधिग्रहण के इन दोहरे दुष्परिणामों की आशंका के चलते देश के किसान, काश्तकार, आदिवासी, मछुवारे आदि सभी जो मूलतः जल, जंगल और जमीन पर निर्भर हैं, अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलनरत हैं। निश्चित ही आज भी उनकी स्थिति कोई संतोषजनक नहीं है लेकिन भूमि अधिग्रहण एवं रोजगार के माध्यम छिन जाने के बाद तो और भी दयनीय हो जाएगी। आगे, आने वाली पीढ़ियों के पास वह भी नहीं रह जाएगा जो उनके पास है। इसलिए वे यह मान चुके हैं कि ऐसी स्थिति में अपनी जमीन और रोजगार को बचाने के लिए आंदोलन ही एकमात्रा जरिया रह गया है। यह अलग बात हैं कि कहीं पर आंदोलन अधिक मुखर है, किसान अपनी जमीन बचाने के लिए मर-मिटने के तैयार हैं तो कहीं जमीन की बेहतर कीमत और अधिक मुआवजा देने की मांग हैं लेकिन जमीन के अधिग्रहण के विरुद्ध असंतोष पूरे देश में है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

कृषि भूमि का बढ़ता संकट

भूमि, कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार है। देश की दो तिहाई से अधिक आबादी आज भी कृषि, पशुपालन और इनसे संबंधित व्यवसायों पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली देश की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूरी तरह भूमि पर निर्भर है। लेकिन हाल के वर्षाें में सरकार द्वारा भूमि के अधिग्रहण से ग्रामीण क्षेत्रा की कृषि योग्य निजी और सार्वजनिक जमीन निरंतर सिकुड़ती जा रही है। सरकार शहरी विस्तार से जुड़ी विभिन्न योजनाओं, औद्योगिकीकरण और विशेष आर्थिक क्षेत्रा ; ैचमबपंस म्बवदवउपर्ब वदमद्ध के नाम पर भूमि का अधिग्रहण कर देश को जाने-अनजाने में एक बड़े संकट की ओर धकेल रही है। इससे एक ओर आने वाले समय में देश की जरूरत के लिए खाद्यान्न और अन्य कृषि उत्पादों का संकट पैदा होने की आशंका बढ़ गई है तो दूसरी ओर किसानों और ग्रामीण आबादी को उनकी पुस्तैनी जमीन से बेदखल किए जाने से विस्थापन और सदियों पुरानी ग्रामीण समाज व्यवस्था के नष्ट होने का खतरा बढ़ गया है।
यह सच है कि मूलभत नागरिक सुविधाओं की आपूर्ति और विकास योजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण अवश्यंभावी है। स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, नहरों, पेयजल और बिजली परियोजनाओं के निर्माण और प्रशासनिक भवनों व सेना के लिए जमीन के अधिग्रहण को रोका नहीं जा सकता। इन उद्देश्यों से जब सरकार कृषि योग्य या सार्वजनिक भूमि का अधिग्रहण करती है और इससे किसी गांव या बस्ती का विस्थापन होता है तो सरकार कथित रूप में जमीन का मुआवजा देने और विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था करती है। लेकिन इधर सरकार द्वारा सस्ते दामों पर या मनमाने ढंग से किसानों की निजी अथवा सार्वजनिक जमीन का अधिग्रहण कर उद्योगपतियों और व्यवसाइयों को सौंपे जाने सेे भूमि अधिग्रहण एक जटिल समस्या बन गई है। इससे कई पीढ़ियों से कृषि, पशुपालन और जल-जंगल-जमीन पर निर्भर लोगों के समक्ष आजीविका संकट का खतरा बढ़ ही गया है तो दूसरी ओर लेकिन जिन उद्यमियों और व्यवसाइयों को सरकार जमीन सौंप या बेच जा रही है उनकी संपत्ति और आमदनी में आश्चर्यजनक ढंग से वृद्धि हो रही है। यह समस्या विशेष आथर््िाक क्षेत्रा के नाम पर सरकार द्वारा भूमि का अधिग्रहण कर उसे पंूजीपतियों को सौंपने के लिए 2005 में बनाए गए विशेष आथर््िाक क्षेत्रा अधिनियम के कारण और बढ़ गई है। सरकार की योजना कृषि योग्य जमीन में करीब 600 एस।ई.जेड. बनाने कीे है। इनमें से वर्ष 2008 के अंत तक, 260 एस.ई.जेड. परियोजनाओं को अधिसूचित ;छवजपपिमकद्ध किया जा चुका था।
जानकारों का कहना है कि एस।ई.जेड. के नाम पर जमीन हथियाने की जो होड़ इस समय देश में लगी है वह पिछले करीब 100 वर्षों में अब तक की सबसे बड़ी भूमि अधिग्रहण की मुहिम है। चंूकि सरकार विशेष आथर््िाक क्षेत्रा अधिनियम बनाने के समय ही स्पष्ट कर चुकी थी कि एस.ई.जेड. समय की मांग है, इसलिए उसने पहले चरण में ही 125 लाख कृषि योग्य जमीन का अधिग्रहण कर इस मुहीम को हरी झंडी दिखा दी है। दूसरे चरण में भी लगभग इतनी ही जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि कानूनन दो फसली जमीन का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गैर कृषि उपयोग के लिए अधिग्रहण न किये जाने की व्यवस्था है। सरकार ने भी उद्यमियों से साफ कह दिया है कि स्वीकृत परियोजनाओं के लिए सरकार केवल 30 प्रतिशत जमीन का ही अधिग्रहण करेगी बाकी उन्हें सीधे किसानों से बाजार भाव पर खरीदनी होगी। स्पष्ट है कि जमीन सरकार खरीदे या उद्योगपति दोनों ही स्थितियों में किसान को ही बेदखल होना है।
निजी एस।ई.जेड. तो किसानों से कृषि योग्य जमीन हथिया कर उसे पंूजीपतियों के हवाले करने का एक षढयंत्रा तो है ही, इसके लिए सरकार और पूंजीपति दोनों किसानों और भू-मालिकों को तात्कालिक लाभ और प्रलोभन दिखाने के साथ-साथ उनकी मजबूरी को फायदा उठाकर जमीन हथिया रहे हैं। इसके अलावा सार्वजनिक और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप नाम से स्थापित होने वाली औद्योगिक इकाइयों के लिए भी सरकार भारी मात्रा में भूमि का अधिग्रहण कर रही है, हालांकि ऐसे सार्वजनिक उपक्रमों और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप कंपनियों का लाभ भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में पूंजीपतियों और उद्योग जगत को ही मिलना निश्चित है। लेकिन कुछ मामले तो ऐसे भी हैं। जहां न तो घोषित तौर पर एस.ई.जेड. बनाया जाना है और न ही सार्वजनिक या पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप नाम से औद्योगिक इकाइयां विकसित की जानी हैं वहां भी सरकार किसानों की जमीन का अधिग्रहण कर सीधे उद्यमियों को सांैप रही है। प. बंगाल का चर्चित सिंगूर भूमि अधिग्रहण का मामला इसकी एक मिसाल है।
प।बंगाल सरकार ने सिंगूर की जिस 9097 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर टाटा मोटर्स को सौंपी थी उस पर कोई एस।ई.जेड. नहीं बनना था बल्कि वह उसकी लखटकिया ‘नैनो’ कार के निमार्ण के लिए लगने वाले उपक्रम के लिए दी गई थी। इसके लिए सरकार ने 140 करोड़ रुपए की कीमत चुकाई थी और मात्रा 20 करोड़ रुपए में टाटा को सौंप दी गई, वह भी पांच वर्षीय कर्ज के रूप में छोड़ दी गई। यह अलग बात है कि सिंगूर में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध चले जनांदोलन के कारण टाटा को वहां लखटकिया का कारखाना लगाने का विचार छोड़ना पड़ा। अन्यथा किसानों और मजदूरों की हितैषी कही जाने वाली राज्य की वाममोर्चा सरकार ने किसानों को उनकी जमीन से बेदखलकर टाटा को लाभ पहुंचाने की तैयारी पूरी कर ली थी।
प।बंगाल सरकार केे समान ही सभी राज्यों की सरकारें एस.ई.जेड. या गैर एस.ई.जेड. के नाम पर जमीन का अधिग्रहणकर उसे देशी-विदेशी उद्यमियों और पूंजीपतियों और जमीन के कारोबार करने वाले डेवलपरों को देने की होड़ में लगी हुई हैं। गुजरात के जाम नगर में 9000 हेक्टेयर में पेट्रो प्रोडक्ट एस.ई.जेड., मंगलोर के पास ओएनजीसी की भागीदारी वाला एस.ई.जेड., उड़ीसा के जगतसिंहपुर में कोरियाई स्टील कंपनी पास्को का एस.ई.जेड., हरियाणा के झज्जर जिले में अनिल अंबानी का एस.ई.जेड., मुंबई के पास रायगढ़ में 14000 हेक्टेयर पर देश का सबसे बड़ा एस.ई.जेड., पंजाब के बरनाला जिले में बन रहा एस.ई.जेड. आदि कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं जहां कि राज्य सरकारें कृषियोग्य भूमि का अधिग्रहणकर उसे पूंजीपतियों को सौंपने पर आमादा हैं। चूंकि इस बीच देशभर में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध चले आंदोलनों के कारण सरकार ने एस.ई.जेड. के लिए भूमि की अधिकतम सीमा 5000 हेक्टेयर कर दी है इसलिए राज्यों की सरकारें उनका अधिक हित नहीं कर पा रही हैं फिर भी उद्योगपति सरकार पर जिस तरह का दबाव बनाए हुए हैं। इससे साफ है कि यदि किसान लापरवाह और उदासीन रहे तो देर-सबेर वे अपनी जमीन से बेदखल हो जाएंगे। इसका खामियाजा किसानों को ही नहीं पूरे देश को आने वाले समय में खाद्यान्न संकट के रूप में झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा कृषि भूमि के गैर कृषि उपयोग जो कंक्रीट का जंगल उगेगा उससे पैदा होने वाली पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिकी असंतुलन की समस्या अलग है। एक ओर दुनियाभर के पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक अनिंयत्रित औद्यौगिकीकरण के कारण भू-मंडलीय उ$ष्णता और उसके कारण जलवायु परिवर्तन से बराबर आगाह कर रहे हैं वहीं भारत सरकार पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिकी असंतुलन के लिए जिम्मेदार उद्योगों को चिंताजनक गति से बढ़ावा दे रही है।
एस।ई.जेड. और औद्योगिकीकरण को यदि छोड़ भी दिया जाए तो शहरी विस्तार ही अकेले किसानों और ग्रामीण आबादी को उनकी जमीन से बेदखल कर दर-ब-दर करने के लिए कम नहीं है। शहरी विस्तार के कारण सरकार जन सुविधाओं के नाम पर सामाजिक कारणों के लिए जमीन का अधिग्रहण करती है, जिस पर सड़कों, सीवर लाइनों, पेट्रोल पंपों, स्कूलों, अस्पतालों, बिजली घरों, पेयजल योजनाओं, आवासीय एवं व्यावसायिक परिसरों का निर्माण किया जाता है। यद्यपि ये सभी निर्माण कार्य जन सुविधाओं के नाम पर होते हैं लेकिन आर्थिक उदारीकरण के बाद ये सभी दायित्व सरकार द्वारा निजी हाथों में सौंप दिए जाने के कारण अधिग्रहण की गई जमीन पूंजीपतियों और व्यवसाइयों को सौंप दी जाती है जिस पर वे करोड़ों-अरबों रुपए का कारोबार करते हैं। या फिर सरकार स्वयं जमीन का अधिग्रहण कर उसे विभिन्न योजनाओं के लिए विकसित करने के बाद उसे किसानों को चुकाई गई कीमत से कई गुना अधिक कीमत पर जरूरतमंदों को बेचती है। इससे किसान न केवल अपनी जमीन से बेदखल हो जाता है बल्कि उससे आजीविका का सहारा भी छिन जाता है। जमीन से मिली कीमत से 10-12 साल तक ही गुजारा हो पाता है। अत्याधुनिक बाजार व्यवस्था के भूमि की कीमत या मुआवजे के रूप में मिला धन विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के जरिए फिर से पूंजीपतियों के खजाने में जा मिलता है, इस क्रम में किसानों के बच्चे जो देश के अन्नदाता हो सकते थे फिजूलखर्ची और कई तरह की बुरी आदतों के आदी हो जाते हैं। आगे वह स्वयं या उसके बच्चे अपनी पुस्तैनी जमीन पर आबाद व्यावसायिक परिसरों-आवासीय परिसरों में मजदूर, क्लर्क, ड्रायबर, चपड़ासी, चैकीदार या घरेलू नौकर के रूप में नौकरी करके आजीविका चलाने के लिए मजबूर हो जाता है, लेकिन ये नौकरियां भी जमीन से विस्थापित सभी किसानों को नहीं मिल पाती हैं। यही नहीं कुछ लोग अपनी फिजूलखर्ची और बुरी आदतों के कारण राहजनी और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं। इस बात की पुष्टि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रा, दिल्ली सहित उन सभी क्षेत्रों में हुई आपराधिक गतिविधियों और उनमें सक्रिय लोगों से भी होती है, जहां कि सरकार ने कृषि भूमि के स्थान पर भव्य आवासीय, व्यावसायिक और औद्योगिक परिसरों का निर्माण किया है। ये समस्याएं शहरी विस्तार और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के साथ बढ़ती ही जा रही है।
मुंबई समेत महाराष्ट्र के एक बड़े हिस्से में वहां कार्यरत गैर मराठी भाषी मुख्यतः बिहार और उत्तर प्रदेश लोगों के प्रति जो विद्वेष की भावना हाल के वर्षों में देखी गई है, उसका एक बड़ा और अहम् कारण भी यही है। यद्यपि इस भावना को भड़काने उसका राजनैतिक लाभ लेने में पहले शिवसेना और अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की कुत्सित राजनीति रही है लेकिन मुंबई के विस्तार और राज्य में शहरीकरण के विस्तार के कारण कृषि और कृषि आधारित व्यवसायों के खत्म होने से मराठी लोगों में कहीं न कहीं इस तरह की भावना रही है। दुर्भाग्य यह है कि वे अपनी जमीन छिन जाने से उस पर आबाद उद्योगपतियों और पूंजीपतियों की समृद्धि तो नहीं देख पा रहे और न ही सरकार की विकास योजनाओं की खामी को समझ रहे बल्कि वहां आबाद औद्योगिक-व्यावसायिक इकाइयों में कार्यरत कमजोर मजदूरों और कामगारों को उसके लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। शिवसेना जैसे राजनैतिक संगठन मराठी भाषियों के इस भ्रम को बनाए रखने में अपनी भलाई देख रहे हैं, ऐसा नहीं वे इस त्रासदी की जड़ को नहीं समझते बल्कि वे उन व्यवसाइयों के विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहते। कारण, उन्हीं से वे अपनी राजनति के लिए संसाधन जुटाते हैं। यदि ऐसा न होता तो इतने सालों से मराठी हितों की रक्षा का दावा करने वाली शिवसेना या उसी से निकले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कृषि भूमि का अधिग्रहण कर उसपर आबाद और निर्भर लोगों को बेदखल किए जाने का विरोध करती।
यही स्थिति कम या ज्यादा कमोवेश पूरे देश की है। कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण से कृषि और उससे संबंधित व्यवसायों के खत्म होने से बेरोजगार लोगों का वहां पर कार्यरत बाहरी लोगों के प्रति नफरत की भावना पैदा हुई है। इससे राष्ट्रीय एकता और सहिष्णुता की जो भावना भारतवासियों के मन में रही है, उसपर नकारात्मक असर पड़ा है। साथ ही एक नई समाज व्यवस्था जो कि स्वाभावकि रूप से पूर्णतः बाजार और बाजार के मानदंडों पर निर्भर हैं, के अस्तित्व में अपने से संक्षेप में कहा जाए तो शहरी विस्तार और अंधाधुंध औद्योगिकीकरण से देश का सामाजिक ताना-बना भी प्रभावित हुआ है।