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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

क्या सत्ता की दलाल हैं सोनिया गांधी ?

भारती राजनीति में त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में स्थापित श्रीमति सोनिया गांधी ने लगातार चौथी बार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनकर एक इतिहास रचा हो, लेकिन विदेशी मीडिया को यह नहीं सुहा रहा है। भारत में मीडिया भले ही उन्हें त्याग की देवी बता रहा हो या उनकी महानता का गुणगान कर रहा हो, दुनिया की सबसे बड़ी समाचार एजंसियों में से एक 'एएफपीÓ ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सत्ता का सबसे बड़ा दलाल घोषित कर दिया है। हैरत तो इस बात को लेकर भी है कि एक भी कांग्रेसी ने इस समाचार पर अपनी अथवा संगठन की ओर से कोई आपत्ति तक नहीं दर्ज कराईं। तो इसे क्या माना जाए? साथ ही साथ लोगों के जेहन में यह सवाल उठने भी शुरू हो गए हैं कि आखिर क्यों सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ रही हैं? अब तो उनका बेटा राहुल गांधी भी इस लायक हो चुके हैं। कांग्रेस महासचिव के रूप में उनका कार्य सब को भा रहा है? तो फिर वह कुर्सी से दूर क्यों हैं? सवाल कई हैं।
दरअसल, सोनिया गांधी के चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने के मौके पर एएफपी ने जो खबर जारी की है उसकी हेडिंग लगाता है कि ''इंडियन पॉवर ब्रोकर सोनिया गांधी विन्स प्लेस इन हिस्ट्री बुक्स।ÓÓ खबर के इन्ट्रो में ही एजेंसी लिखती है कि इटली की पैदाइश सोनिया गांधी सत्ता की दलाली को मजबूत करते हुए सोनिया गांधी रिकार्ड चौथी बार अध्यक्ष बन गयी हैं। (Italian-born Sonia Gandhi was elected Friday for a record fourth term as president of India's ruling Congress party, cementing her role as the power broker of the country's politics.)
अपने देश में पॉवर ब्रोकर शब्द राजनीति में किन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है इसे बताने की जरूरत नहीं है। खुद अमर सिंह भी अपने आप को पॉवर ब्रोकर (सत्ता के दलाल) कहलाना शायद ही पसंद करें, फिर यहां तो सोनिया गांधी सवाल है। वह जो लाखों कांग्रेसियों के लिए देवी की मूर्ति हैं। जिनके आवास 'दस जनपथÓ की देहरी तक पहुंचने को भी कांग्रेंसी किसी तीर्थ स्थान की मानिंद मानते हैं। हालांकि खबर में एक और अतिवादिता की गयी है। सोनिया गांधी को भले ही कांग्रेस के इतिहास में रिकार्ड दर्ज करनेवाला बताया गया है लेकिन खबर के आखिरी पैरे में एजंसी लिखती है कि ''वे इन दिनों राजनीति में अपने 40 वर्षीय बेटे राहुल गांधी के लिए रास्ता तैयार कर रही हैं ताकि 77 वर्षीय मनमोहन सिंह को हटाकर उन्हें अगला नेता बनाया जा सके।ÓÓ (She now is widely thought to be preparing the way for her son Rahul, y®, to become the country's ne&t leader, replacing -year-old Singh.)
आश्चर्य तो इस बात को लेकर भी है कि भाजपा जब लगतार चौथी बार सोनिया गांधी के अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी को लेकर सवाल खड़े करती हैं तो कई सारे कांग्रेसी विरोध में खड़े हो उठते हैं, लेकिन जब एक विदेशी समाचार एजेंसी इस प्रकार के आपत्तिजनक बातें सोनिया गांधी के बारे में लिखती है तो चूं तक नहंी किया जाता है। आखिर क्यों? क्योंकि वह एक विदेशी समाचार एजेंसी हैं? भाजपा के इस बयान पर कि सोनिया गांधी अध्यक्ष पद खुद ही किसी गैर नेहरू गांधी परिवार के व्यक्ति को आफर कर दें, कांग्रेस ने हंगामा खड़ा कर दिया था। अब एएफपी द्वारा सोनिया गांधी को सत्ता का दलाल बताये जाने पर कांग्रेस के प्रवक्ता क्या कहेंगे? क्या वाकई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हटाने के लिए सोनिया राहुल को तैयार कर रही है? हैरत है कि कांग्रेसी और उनका मीडिया प्रभाग कानों में रुई देकर सोया पड़ा है?
कहीं इसके पीछे कोई विदेशी ताकत तो नहीं है? जो एक साथ तीन लोगों पर वार कर रही है। सोचता हूं कौन हैं वो चेहरे, कौन हैं वो हाथ जो सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मनमोहन सिंह को हमारे सामने किये हुए हैं। पर सब कुछ कितने सही मैनेज किया हुआ है। ये न विस्मयकारी है न रहस्यपूर्ण। खुले आम नंगई है।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

मनमोहन का इस्तीफा, सोनिया ने संभाली गद्दी

बहुत हुआ। अब नहीं चलेगा। पांच साल से अधिक का मौका दिया। दोबारा भी कुर्सी थमाई। फिर भी न देश सुधरा और न परिवार। एक ही तो बेटा था, जिसकी शादी भी नहीं करा पाए। तो भला क्यों बनाए 'रखवारÓ। ऐसे थोड़े ही होता है। लोग तो यही कहते हैं न कि सरकार का रिमोट जब हाथ में है तो खुद ही क्यों नहीं गद्दी पर बैठ जाते हैं। नया साल का बजट भी पेश हो गया तब भी आम आदमी को राहत नहीं मिला। इसी प्रकार की तमाम मुद्दों पर सरकार और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की होलियाड बैठक हुई, जिसमें फैसला लिया गया कि डा. मनमोहन सिंह को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार शेष नहीं रह गया है। सो, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। ताजा घटनाक्रम में मनमोहन सिंह ने भरे मन से अपन पद और गोपनीयता से इस्तीफा दे दिया है और सोनिया गांधी ने रिमोट ही नहंी पूरी सरकार अपने हाथ में रख ली है।
दरअसल, देश को बजट मिल गया। सत्ता में बैठे नेताजी सब खुश हैं, उनके दोनों मंत्रियोंं ने एकदम धांसू इलेक्शन वाला बजट पेश किया है, तो विपक्षी नेताओं की परेशानी ई है कि बजट का पोस्टमार्टम कर ऊ जनता को जो उसका सड़ा-गला पार्ट दिखा रहे हैं, उसको देखकर जनता को हार्ट अटैक नहीं हो रहा। एक ठो विपक्षी नेताजी मिले, बोले, 'पब्लिक निकम्मी हो गई है। पहले लालू ने सब्जबाग दिखा दिया, ऊ खुश हो गई... इस दफा ममता ने दिखाया तब भी खुश। आज प्रणव दा ने भी खूब छकाया, कई ख्वाब दिखाया, ऊ खुश हो गई। हमरी तो कोयो सुनबे नहीं करता है। हम कह रहा हूं कि ई बोगस बजट है, इससे लोगों का भला नहीं होगा, लेकिन पब्लिक है कि समझने को तैयार नहीं है।Ó
दो दिन पहले ममता दी का दिन था...अब प्रणब दा का । प्रणब दा को फिक्र रही ..फिस्कल घाटे की...जीडीपी की...रुपया आएगा कहां से...रुपया जाएगा कहां...लेकिन आंकड़ों की बाज़ीगरी के इस वार्षिक अनुष्ठान से हमारा-आपका सिर्फ इतना वास्ता होता है कि क्या सस्ता और क्या महंगा...इनकम टैक्स में छूट की लिमिट बढ़ी या नहीं...होम लोन सस्ता होगा या नहीं...लेकिन इस देश में 77 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनका प्रणब दा से एक ही सवाल है...रोटी मिलेगी या नहीं...?
बजट से एक दिन पूर्व आर्थिक सर्वे में सुनहरी तस्वीर दिखाई गई कि भारत ने आर्थिक मंदी पर फतेह हासिल कर ली है...अगले दो साल में नौ फीसदी की दर से विकास का घोड़ा फिर सरपट दौडऩे लगेगा...लेकिन आम आदमी को इस घोड़े की सवारी से कोई मतलब नहीं...उसे सीधे खांटी शब्दों में एक ही बात समझ आती है कि दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए भी उसकी जेब में पैसे होंगे या नहीं...? दाल, चावल, आटे के दाम यूं ही बढ़ते रहे तो कहीं एक वक्त फ़ाके की ही नौबत न आ जाए...ये उसी आम आदमी का दर्द है जिसके दम पर यूपीए सरकार सत्ता में आने की दुहाई देते-देते नहीं थकती थी...चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस नारा लगाती थी...आम आदमी के बढ़ते कदम, हर कदम पर भारत बुलंद...लेकिन आठ महीने में ही आम आदमी की सबसे बुनियादी ज़रूरतों पर ही सरकार लाचार नजऱ आने लगी...।
इससे पूर्व बैठक में यह भी चर्चा हुई कि पंचवर्षीय योजनाओं के देश में 100 दिन की योजना बनी। हरेक मंत्रालय के लिए, वह भी प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर। तब किसी ने यह नहीं पूछा कि गरीबी कब दूर होगी? महंगाई कब खत्म होगी? भ्रष्टïाचार से कब छुटकारा मिलेगा? पीने के लिए जल लोगों को कब मुहैया होगा? बिजली कब आएगी? सब को रोजगार कब मिलेगी? आदि...आदि। संभव है जबाव मिलता - 100 दिन में। जबकि गुणा भाग का तात्कालिक हिसाब से मनमोहन सरकार के पास कोई 1825 दिन का जमा पूंजी था। लेकिन वे थे कि 100 दिन में ही सब निपटा देना चाहते थे। सारे मंत्री 100 दिन के टारगेट पर सेट कर दिए गए।
अब, जबकि टारगेट की सौ दिनी समय-सीमा कब की समाप्त हो चुकी है और दूसरा सौ दिन भी बीत चुका है, एक भी लक्ष्य पूरा नहीं कि या गया। सरकार ने क्या उपलब्ध्यिां हासिल की, इस पर हर कोई चुप्पी साधे हुए है। चुप, एकदम चुप। सरकार के तमाम मंत्रालय चुप्पी साधे रहे जबकि 100 दिनों का एजेंडा पेश करने के लिए मंत्रालयों और मंत्रियों में होड़ लगी हुई थी। मानो जल्दी ही सौ दिन में लिखी जाने वाली कोई कालजयी रचना स्टैंड पर आने वाली हो। ओबामा ने भी सौ दिन का टारगेट सेट किया था। कहां है किसी को पता नहीं। मुश्किल ये है कि इस चक्कर में इतने फैसले हो जाएंगे कि लागू ही नहीं हो पायेगा।
अब, जब इतना सब हो गया तो आखिर सोनिया गांधी कब तक खैर मनाती। जनता के प्रति उनकी जबावदेही भी है तो कुछ । सो, खुद ही कुर्सी थाम ली।
ये है होली स्पेशल