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शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

मनमोहन का इस्तीफा, सोनिया ने संभाली गद्दी

बहुत हुआ। अब नहीं चलेगा। पांच साल से अधिक का मौका दिया। दोबारा भी कुर्सी थमाई। फिर भी न देश सुधरा और न परिवार। एक ही तो बेटा था, जिसकी शादी भी नहीं करा पाए। तो भला क्यों बनाए 'रखवारÓ। ऐसे थोड़े ही होता है। लोग तो यही कहते हैं न कि सरकार का रिमोट जब हाथ में है तो खुद ही क्यों नहीं गद्दी पर बैठ जाते हैं। नया साल का बजट भी पेश हो गया तब भी आम आदमी को राहत नहीं मिला। इसी प्रकार की तमाम मुद्दों पर सरकार और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की होलियाड बैठक हुई, जिसमें फैसला लिया गया कि डा. मनमोहन सिंह को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार शेष नहीं रह गया है। सो, उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। ताजा घटनाक्रम में मनमोहन सिंह ने भरे मन से अपन पद और गोपनीयता से इस्तीफा दे दिया है और सोनिया गांधी ने रिमोट ही नहंी पूरी सरकार अपने हाथ में रख ली है।
दरअसल, देश को बजट मिल गया। सत्ता में बैठे नेताजी सब खुश हैं, उनके दोनों मंत्रियोंं ने एकदम धांसू इलेक्शन वाला बजट पेश किया है, तो विपक्षी नेताओं की परेशानी ई है कि बजट का पोस्टमार्टम कर ऊ जनता को जो उसका सड़ा-गला पार्ट दिखा रहे हैं, उसको देखकर जनता को हार्ट अटैक नहीं हो रहा। एक ठो विपक्षी नेताजी मिले, बोले, 'पब्लिक निकम्मी हो गई है। पहले लालू ने सब्जबाग दिखा दिया, ऊ खुश हो गई... इस दफा ममता ने दिखाया तब भी खुश। आज प्रणव दा ने भी खूब छकाया, कई ख्वाब दिखाया, ऊ खुश हो गई। हमरी तो कोयो सुनबे नहीं करता है। हम कह रहा हूं कि ई बोगस बजट है, इससे लोगों का भला नहीं होगा, लेकिन पब्लिक है कि समझने को तैयार नहीं है।Ó
दो दिन पहले ममता दी का दिन था...अब प्रणब दा का । प्रणब दा को फिक्र रही ..फिस्कल घाटे की...जीडीपी की...रुपया आएगा कहां से...रुपया जाएगा कहां...लेकिन आंकड़ों की बाज़ीगरी के इस वार्षिक अनुष्ठान से हमारा-आपका सिर्फ इतना वास्ता होता है कि क्या सस्ता और क्या महंगा...इनकम टैक्स में छूट की लिमिट बढ़ी या नहीं...होम लोन सस्ता होगा या नहीं...लेकिन इस देश में 77 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनका प्रणब दा से एक ही सवाल है...रोटी मिलेगी या नहीं...?
बजट से एक दिन पूर्व आर्थिक सर्वे में सुनहरी तस्वीर दिखाई गई कि भारत ने आर्थिक मंदी पर फतेह हासिल कर ली है...अगले दो साल में नौ फीसदी की दर से विकास का घोड़ा फिर सरपट दौडऩे लगेगा...लेकिन आम आदमी को इस घोड़े की सवारी से कोई मतलब नहीं...उसे सीधे खांटी शब्दों में एक ही बात समझ आती है कि दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए भी उसकी जेब में पैसे होंगे या नहीं...? दाल, चावल, आटे के दाम यूं ही बढ़ते रहे तो कहीं एक वक्त फ़ाके की ही नौबत न आ जाए...ये उसी आम आदमी का दर्द है जिसके दम पर यूपीए सरकार सत्ता में आने की दुहाई देते-देते नहीं थकती थी...चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस नारा लगाती थी...आम आदमी के बढ़ते कदम, हर कदम पर भारत बुलंद...लेकिन आठ महीने में ही आम आदमी की सबसे बुनियादी ज़रूरतों पर ही सरकार लाचार नजऱ आने लगी...।
इससे पूर्व बैठक में यह भी चर्चा हुई कि पंचवर्षीय योजनाओं के देश में 100 दिन की योजना बनी। हरेक मंत्रालय के लिए, वह भी प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर। तब किसी ने यह नहीं पूछा कि गरीबी कब दूर होगी? महंगाई कब खत्म होगी? भ्रष्टïाचार से कब छुटकारा मिलेगा? पीने के लिए जल लोगों को कब मुहैया होगा? बिजली कब आएगी? सब को रोजगार कब मिलेगी? आदि...आदि। संभव है जबाव मिलता - 100 दिन में। जबकि गुणा भाग का तात्कालिक हिसाब से मनमोहन सरकार के पास कोई 1825 दिन का जमा पूंजी था। लेकिन वे थे कि 100 दिन में ही सब निपटा देना चाहते थे। सारे मंत्री 100 दिन के टारगेट पर सेट कर दिए गए।
अब, जबकि टारगेट की सौ दिनी समय-सीमा कब की समाप्त हो चुकी है और दूसरा सौ दिन भी बीत चुका है, एक भी लक्ष्य पूरा नहीं कि या गया। सरकार ने क्या उपलब्ध्यिां हासिल की, इस पर हर कोई चुप्पी साधे हुए है। चुप, एकदम चुप। सरकार के तमाम मंत्रालय चुप्पी साधे रहे जबकि 100 दिनों का एजेंडा पेश करने के लिए मंत्रालयों और मंत्रियों में होड़ लगी हुई थी। मानो जल्दी ही सौ दिन में लिखी जाने वाली कोई कालजयी रचना स्टैंड पर आने वाली हो। ओबामा ने भी सौ दिन का टारगेट सेट किया था। कहां है किसी को पता नहीं। मुश्किल ये है कि इस चक्कर में इतने फैसले हो जाएंगे कि लागू ही नहीं हो पायेगा।
अब, जब इतना सब हो गया तो आखिर सोनिया गांधी कब तक खैर मनाती। जनता के प्रति उनकी जबावदेही भी है तो कुछ । सो, खुद ही कुर्सी थाम ली।
ये है होली स्पेशल

शनिवार, 16 मई 2009

मनमोहन का रिकार्ड

जनादे’श 2009 आने से पूर्व कयासबाजी हो रही थी कि क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री के सिंहासन पर बैठने में कामयाब हो पाएंगे। लोकसभा में मात्र एक वोट से अपनी 13 माह पुरानी सरकार गंवाने के बाद वाजपेयी ने 1998 में दोबारा शानदार वापसी की थी अ©र 1977 के बाद पहली बार किसी नेता ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया था। एक नई शुरूआत के साथ मनमोहन सिंह ने अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री का रिकार्ड दोहराई और भारतीय लोकतंत्र में जवाहर लाल नेहरू के बाद दूसरे प्रधानमंत्री बनें जो अपने पांच साल के कार्यकाल के बाद दोबारा प्रधानमंत्री बने हैं। कांग्रेस ने सपफतौर पर कह दिया कि मनमोहन ही पीएम हो गए। 76 वर्षीय सिंह पहले नेता हैं जिन्हें कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया है। यह वह पार्टी है जिसने आजादी के बाद के छह दशक में से देश पर 50 साल तक राज किया है। पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा महासचिव राहुल गांधी सिंह की उम्मीदवारी को लेकर जान लड़ाए हुए हैं अ©र कई बार घोषणा कर चुके थे कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा करने वाले गांधी नेहरू परिवार के बाहर के पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री होंगे। गठबंधन सरकार के मुखिया के तौर पर ऐसा कर पाना अपने आप में किसी करिश्मे से कम नहीं होता है।
काबिलेगौर है कि 1977 में जनता पार्टी के प्रयोग के बाद 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में आईं। अक्तूबर 1984 में उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल कर प्रधानमंत्री बने। लेकिन 1989 में वह भी दोबारा प्रधानमंत्री बनने का करिश्मा नहीं दोहरा सके अ©र कांग्रेस के सबसे बड़ी एकल पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद उन्हें विपक्ष में बैठना पड़ा। उसके बाद से संसद में बहुमत हासिल करना राजनीतिक दलों के लिए एक प्रकार से मृगमरिचिका ही साबित होता रहा है। 1989 के चुनावों के बाद वीपी सिंह 11 महीने तक प्रधानमंत्री पद पर रहे अ©र उसके बाद चंद्रशेखर की सरकार मात्र चार महीने ही चली। पीवी नरसिंह राव ने 1991 से लेकर 1996 तक पांच साल का प्रधानमंत्री का कार्यकाल पूरा किया। लेकिन उनके बाद प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी कुछ ही दिन इस पद पर रहे। विपक्षी कांग्रेस ने उनकी सरकार को 13 दिन का चमत्कार करार दिया। इसके बाद एचडी देवगौड़ा 11 महीने अ©र इंद्र कुमार गुजराल चार महीने तक प्रधानमंत्री रहे। 1998 अ©र 1999 में वाजपेयी ने सत्ता संभाली जबकि मनमोहन सिंह ने 2004 में उनकी जगह ले ली। नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री बनने के साथ सिंह ने राजनीति में कदम रखा था अ©र वह देश में आर्थिक सुधार प्रक्रिया के प्रणेता कहे गए।