एक ही खानदान के दो चिराग। गाॅधी - नेहरु के राजनीतिक विरासत केेेे दो वारिस। परंतु राजनीति के धरातल पर खड़े, उत्तर - दक्षिण। घोर विरोधी खेमे में अपने - अपने राजनीतिक वजूद की तलाश। एक की उग्र छवि दूसरे का सौम्य। अपने - अपने पिता की छवि के अनुरुप। पर माॅं से मिली प्रतिद्वन्द्विता भी विरासत का हिस्सा। मीडिया और जन मानस में संजय गाॅंधी जहाॅ खलनायक के रुप में प्रतिबिम्बित किये गये वहीं राजीव को मिली ‘मिस्टर क्लीन‘ की पहचान। उनके बेटों के लिए भी मीडिया मेें कमोवेश यही तस्वीर। पर राहुल को मिली फूलों के सेज की सौगात तो काॅंटों भरा वरुण का राजनीतिक सफर।
समान पारिवारिक पृष्ठभूमी के बाद भी अलग राजनीतिक मंच और विरासत से जुड़े होने का भी अपना ही अलग नफा नुकसान है जो गाॅधी परिवार के इन वारिसो को अनायास ही मिला है। अगर कालखंड को पीछे मुड़कर देखें तो महाभारत काल का कौरव - पांडव प्रकरण प्रासांगिक प्रतीत होता है। धृतराष्ट्र को सिर्फ लिए इस सत्ता से विमुख होना पड़ा क्योंकि जन्म से अंधे थे। विकल्प के तौर पर उनके अनुज पांडु को सत्ता की बागडोर सौंपी गई। बाद में सत्ता के ये तात्कालिक उत्तराधिकारी वैकल्पिक से आधिकारिक वारिस हो गये और सत्ता की विरासत पर उनके पुत्रों ने अपना दावा पेश कर दिया। चुॅंकि स्थितियाॅं बदल गई थी इसलिए न सिर्फ सत्ता का केन्द्र बदल गया बल्कि उत्तराधिकार का सवाल भी भाई - भाई के बीच असंतोष और विवाद का कारण बन गया। नतीजा रहा कि जोे कुछ कौरवों को नैसर्गिक रुप से मिलना था उससे वे वंचित कर दिये गये। कमोवेश यही स्थिति संजय और राजीव गाॅंधी के राजनीतिक सफर और उनके विरासत का रहा।
संजय गाॅंधी का राजनीतिक सफर अपनी माॅं और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाॅंधी के छत्रछाया में शुरु हुआ था। ईमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में काॅंग्रेस की करारी हार के बाद संजय के नेतृत्व में युवा काॅंग्रेस ने ढ़ाई साल के बाद ही काॅंग्रेस के दुबारा सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त किया था। भले ही उनका जीवन विवादों से घिरा रहा हो किन्तु पार्टी और देश की राजनीति में उनके असर और प्रभाव को स्पष्ट महसूस किया जा सकता था। आपातकाल के खलनायक माने गये संजय 1980 के चुनाव में पार्टी में नायक के तौर पर उभर कर सामने आये थे। यह अकारण नहीं था कि एक विमान दुर्घटना में उनके आकस्मिक मृत्यु के बाद इंदिरा गाॅंधी अपने राजनीतिक उत्तराधिकार को लेकर इतनी अधिक चिंतित हो गई थी कि वह राजनीति से दूर रहने वाले अपने पाइलट पुत्र राजीव को राजनीति में उतार ही लाई। राजनीति के ‘पप्पू‘ राजीव जल्दी ही ‘मिस्टर क्लीन‘ के नाम से जाने गये। इंदिरा गाॅंधी की हत्या के बाद राजीव प्रधानमंत्री बनाये गये। प्रधानमंत्री के रुप में काॅंग्रेस के बम्बई अधिवेशन में उन्होने सरकारी तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार और सरकारी मद का केवल 15 प्रतिशत आम जनता तक पहुॅंचने की स्वीकारोक्ति से देश में हलचल मचा दिया था। 1991 में उनकी हत्या के बाद पार्टी और नेहरु - गाॅंधी परिवार के वंश परम्परा के अनुसार सोनिया और उनकी संतान काॅंग्रेस के स्वाभाविक उत्तराधिकारी घोषित कर दिये गये और यहीं से राहुल और वरुण का फर्क देश के सामने आया।
सत्ता का केन्द्र बदलने से न सिर्फ राजनीतिक आस्था बदल जाता है बल्कि विरासत भी बदल जाता है। कई बार तो विरासत पर दावेदारी का अधिकार भी विवाद और राजनीतिक संघर्ष का रुप ले लेता है। महाभारत काल में भी यही हुआ था। आधुनिक राजनीति मेें भी ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं जब तात्कालिक कारणों से सत्ता में हुए कथित अल्पकालिक परिवर्तन ने वैकल्पिक प्रधान को ही बाद में वैधानिक और स्थायी घोषित कर पार्टी मे विवाद, गुटबाजी और संघर्ष की स्थिति बना दी। दिल्ली में मदनलाल खुराना और मध्य प्रदेश में उमा भारती इस तरह की स्थिति का बेहतरीन उदाहरण हैं। राजीव गाॅंधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संजय के सिपहसलारों की निष्ठा और स्वामी भक्ति बदल गई। जब काॅंग्रेस से उपेक्षित मेनका गाॅंधी ने ‘संजय विचार मंच‘ के नाम से अपना अलग राजनीतिक संगठन खड़ा किया तो अकबर अहमद डम्पी के अलावा संजय का एक भी वफादार चेहरा उनके साथ नहीं दिखा। 1977 में काॅंग्रेस पार्टी की करारी हार के बाद संजय के आभा मंडल के साथ जिन युवा शक्तियों ने अपने जीवटता भरे संघर्ष और आन्दोलन के बदौलत ढ़ाई साल में ही पार्टी को पुनः सत्ता में स्थापित कर दिया था वही अपने उर्जा और जुझारुपन को भूल राहुल और प्रियंका में ही देश और पार्टी का भविष्य देखने के आदी हो गये हैं।
इंदिरा गाॅंधी और सोनिया का मेनका से पारिवारिक विवाद इस हद तक बढ़ गया कि मेनका के लिए काॅंग्रेस में जगह की गुजाॅंइश ही खत्म कर दी गई। आज जहाॅं सोनिया और राहुल काॅंग्रेस के सर्वेसर्वा बन सरकार की कमान अपने हाथ में थामे हैं वहीं मेनका और वरुण प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के सांसद हैं। गाॅंधी - नेहरु परिवार की असली वारिस बन सोनिया ने वंश परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अपनी संतानो को न सिर्फ देश के भावी मुखिया के रुप में प्रस्तुत कर दिया बल्कि प्रियंका बढ़ेरा तो पार्टी में बिना किसी पद और प्रतिनिधित्व के भी पार्टी के दिग्गज नेताओं और मंत्रियों से ज्यादा अहमियत रखती हैं। यह सोनिया और मेनका के ‘परिवार‘ का अंतर है जो राहुल और वरुण तक लगातार बढ़ता ही गया है।
गत लोक सभा चुनाव में भाजपा के पीलीभीत से सांसद वरुण गाॅधी के कथित भड़काऊ भाषण पर काफी हंगामा मचा था। चुनाव का दौर था और भाषण में देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी पर कथित रुप से आपत्तिजनक टिप्पणी की गई थी इसलिए सियासी बवंडर उठना लाजिमी ही था। आखिर सबसे बड़े थोक वोट बैंक को अपने पक्ष में लाने के इस सुनहरे मौके से सेकुलर पार्टियाॅ कैसे चूक सकती थी ? केन्द्र और राज्य सरकार में ‘वोट बटोरने‘ की ऐसी होड़ लगी कि आनन फानन में वरुण पर रासुका लगा दिया गया। स्वघोषित सेकुलर दलों के अलावा अपने वैचारिक और आर्थिक हित पोषकों को खुश करने के मुहिम में कथित सेकुलर मीडिया भी जोर शोर से शामिल था। लगभग उसी समय कुछ अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी कथित ‘अल्पसंख्यक‘ मुसलमानों को खुश करने के लिए समान रुप से भड़काऊ भाषण दिया था किन्तु सेकुलर कुनबे के लिए न तो वह खास खबर थी न ही ऐतराज करने वाला प्रमुख एजेंडा। इसी मामले मेें एक हास्य प्रसंग तब जुड़ गया जब विदूषी प्रियंका गाॅंधी ने वरुण को गीता पढ़ने की सलाह दे डाली। देश की जनता को याद ही है कि प्रियंका के दादा फिरोज गाॅधी पारसी थे और पति राबर्ट और माॅं सोनिया ईसाई हैं। देश के इस सर्वोच्च राजनीतिक परिवार में धर्म कर्म और अध्यात्म की कितनी चर्चा होती होगी, यह सर्वविदित है। इसलिए भले ही वह गीता के किसी सांदर्भिक श्लोक या अध्याय को याद नहीं कर पाई हो पर देश के बुद्धिजीवियों को उस वैचारिक संकट के समय में भी मुस्कुराने का मौका जरुर दे दिया था। एक तरफ जहाॅं राजनीतिक दलो और मीडिया के अलावा समस्त सेकुलर समुदाय वरुण गाॅंधी को खलनायक के रुप में निरुपित करती रही वहीं भाजपा इस मुद्दे पर अन्तरद्वन्द की शिकार ही दिखी। न तो इसे जनता के बीच ले सकी न ही वरुण के साथ एकजुट खड़ी हो सकी। प्रतिपक्षी के तौर पर कार्य कर रहे सेकुलर मीडिया के बनाये छद्म दवाब में जहाॅं भाजपा वरुण को अकेले ही मंझधार में छोड़ अप्राप्य वोट बैंक में अपनी छवि सुधार के निरर्थक प्रयास में जुट गई वहीं काॅंग्रेस और मीडिया इस दौरान राहुलमय बनी रही। यह न सिर्फ दो पार्टियों की संस्कृति का अंतर है बल्कि राहुल और वरुण का अंतर भी है।
न्यायालय ने वरुण के कथित भाषण को भले ही रासुका लगाने लायक आपत्तिजनक नहीं माना हो पर सेकुलर जमात इसे सबसे घृणित अपराध के रुप में ही निरुपित करती आई है। इस पर जबरन मचाये गये हो हल्ले की वजह से वरुण गाॅंधी की जान को खतरा बढ़ गया है, इसमें कोई दो राय नहीं है। देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त संगठन से जुड़े लोग जो वरुण गाॅंधी को मारना चाहते थे, बेंगलुरु में पकड़े गये। उसके बाद दिल्ली में भी छह शूटर पकड़े गये जो कथित तौर पर वरुण गाॅंधी के वकील को मारने आये थे। वरुण की जान के खतरे की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार और पुलिस के बयान पर यकीन करना मुश्किल लगता है कि उन शूटरों के असली निशाने पर वरुण नहीं बल्कि उनके वकील थे। वैसे भी इस मामले मेें केन्द्र सरकार का रवैया बहुत ही गैर जिम्मेदाराना रहा है। अगर यह बात सही भी है तो यह और भी खतरनाक है क्योंकि हाल ही में मुम्बई पुलिस ने छोटा शकील गिरोह के ही चार शूटर को गिरफ्तार किया है जो साध्वी प्रज्ञा के वकील को मारना चाहते थे। यह आतंकियों की नई और खतरनाक रणनीति है जिसमें वकीलों के मन में भय व्याप्त कराया जा रहा है ताकि वे किसी हिन्दूवादी नेता का केेेेस अपने हाथ में ले ही न सके।
सम्भव है इतिहास पी. चिदम्बरम को देश के सबसे नकारा गृहमंत्री के रुप में शुमार करेगा। एक गृहमंत्री पर सरेआम जूता उछाला जाता है और वह उसे कानून को दरकिनार कर सिर्फ इसलिए क्षमा कर देते हैं कि जूता फेंकने वाला अल्पसंख्यक समुदाय का था और चुनावी चरमोत्कर्ष में उनकी पार्टी के वोट बैंक पर इसका विपरीत असर पड़ सकता था साथ ही अन्य अल्पसंख्यको को भी गलत संदेश जा सकता था। कहा भी जाता है कि काॅंग्रेस देश हित से जुड़े मुद्दे को तो नजरअंदाज कर सकती है किन्तु खास वोट बैंक को नहीं। चिदम्बरम के अक्षम गृहमंत्री के रुप में याद किए जाने की और भी ठोस वजह यह है कि अपने इस नकारेपन को स्वयम् स्वीकार करते उन्होने पिछले ही दिनो कहा है कि प्रत्येक भारतीय की रक्षा नहीं की जा सकती है। यह शायद दुनिया के सभ्य इतिहास का पहला उदाहरण होगा जिसमें किसी स्वयंप्रभु देश का गृहमंत्री यह ऐलान करता हो कि वह अपने ही देशवासी के सुरक्षा करने में असमर्थ हैं। संयोग से गृहमंत्री के इस अक्षमता के उजागर होने के केेेेन्द्र में एक बार फिर वरुण गाॅधी ही हैं। वरुण और उनके वकील की हत्या के संदर्भ में जब बेगलुरु और दिल्ली में छोटा शकील के शूटरों की गिरफ्तारी की गई तो स्वयम् वरुण सहित भाजपा सांसदों मेनका और सुषमा स्वराज ने गृहमंत्री चिदम्बरम से उनकीु सुरक्षा बढ़ाने की माॅंग की थी। कथित तौर पर उन्होने उसी वक्त अपनी इस असमर्थता का इजहार किया था। अब इसे पिछले संदर्भ से जोड़कर देखेेें तो अमेरिकी सरकार की वह चिन्ता बहुत जायज दिखेगी जिसमें उन्होने अपने नागरिकोें को भारत जाने के प्रति चेताया था। आखिर जो देश अपने नागरिकों की सुरक्षा नहीं कर सकता है वह विदेशी नागरिकों और पर्यटकों की सुरक्षा कैसे कर सकता है ? क्या हम अमेरिका, ब्रिटेन या किसी अन्य देशों के गृह मंत्री से ऐसे बयान की उम्मीद कर सकते है ? शायद राहुल और वरुण के बीच के अंतर ने ही सख्त माने जाने वाले गृहमंत्री की कलई खोलकर रख दी है।
राहुल और वरुण के बीच का अंतर उन्हें सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सुरक्षा व्यवस्था में भी स्पष्ट दिखता है। कहने को तो एक ही परिवार के चार सदस्य सोनिया, मेनका, राहुल और व्ररुण एक ही राज्य उत्तर प्रदेश से लोक सभा सांसद हैं पर उनके सुरक्षा इंतजामों में जमीन आसमान का अंतर है। मेनका गाॅधी ममता बनर्जी की तरह उन नेताओं में शामिल हैं जो अपनी सुरक्षा के लिए कभी भी चिंतित नहीं रही न ही सुरक्षा का भारी भरकम लाव लश्कर उन्हें ज्यादा रास आता है। वरुण गाॅंधी को वाई श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था प्राप्त है परन्तु उनकी जान पर बढ़ते खतरे को देखते हुए उनकी सुरक्षा और बढ़ाये जाने की माॅंग भाजपा ने किया जिसे ठुकराते हुए गुह मंत्री पी। चिदम्बरम ने कहा था कि सरकार प्रत्येक भारतीय को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती है। सोनिया और राहुल भी वरुण की तरह सामान्य सांसद ही हैं फिर भी उन्हें एस. पी. जी. (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) सुरक्षा प्राप्त है जिसका गठन नियमतः केवल प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए किया गया था। इतना ही नहीं एसपीजी सुरक्षा प्रियंका बढ़ेरा को भी प्राप्त है जो किसी सदन की सदस्य तक नहीं है। सोनिया गाॅंधी यूपीए की अध्यक्ष जरुर हैं किन्तु यह कोई संवैधानिक पद नहीं है और प्रियंका की एकमात्र किन्तु सर्वापरि पहचान उनका सोनिया पुत्री होना भर है। सवाल उठता है कि जब इन्हें विशिष्टतम और प्रधानमंत्री के बराबर का सुरक्षा दिया जा सकता है तो इसी वंश बेल की शाखा हत्या की आशंकाओं से लगातार जूझ रहे वरुण को यह सुरक्षा क्यों नहीं प्रदान की जा सकती है ?
एक तरफ प्रियंका और राहुल को बिना किसी प्रत्यक्ष खतरे के भी प्रधानमंत्री के समकक्ष सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है तो दूसरी तरफ वरुण के जान पर प्रत्यक्ष खतरे के बावजूद उनकी सुरक्षा बढ़ाने के लिए सरकार तैयार नहीं है।ं क्या यह भी एक कारण हो सकता है कि वरुण मेनका के पुत्र हैं जिन्हें सोनिया पसंद नहीं करती है ? या फिर गाॅंधी नेहरु परिवार की आधिकारिक वारिस सोनिया नहीं चाहती कि उनके ही खानदान या परिवार को कोई सदस्य राजनीति में इस हद तक उभरे कि उनकी संतानो को भविष्य मेें चुनौती दिया जा सके ? तो क्या राहुल की राजनीतिक राह निष्कंटक बनाने के लिए ही वरुण की जिन्दगी से खिलवाड़ किया जा रहा है ? इतना तो देश का हर ‘आम आदमी‘ जानता है कि सोनिया की ईच्छा के बगैर काॅंग्रेस या काॅंग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार पत्ते भी हिला नहीं सकती। वरना क्या कारण हो सकता है कि देश का प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी के एक ‘सांसद‘ को मंत्रीमंडल में शामिल करने का आग्रह करता दिखे और वह सांसद सरकार के मुखिया को उपकृत करने के मूड में नहीं दिखे। आखिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जिस शख्स का नैसर्गिक अधिकार माना जाता हो वह किसी और की प्रधानी में मंत्री बनने से तो हिचकेगा ही। इससेे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विवशता झलकती है या गाॅंधी परिवार के सामने सरकार की बेबसी यह तो इतिहास तय करेगा पर यह सवाल अपनी जगह अभी भी कायम है कि जब क्र्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी को जेड श्रेणी की सुरक्षा मिल सकती है तो वरुण गाॅधी की सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ायी जा सकती है ?
- बिपिन बादल
9810054378
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सोमवार, 20 जुलाई 2009
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